Saturday, September 17, 2022

काले कपड़े से बिदकते नेता काला रंग पता नहीं क्यों बुराई और बदी का प्रतीक मान लिया गया है । रावण काले कपड़े पहनता था शायद इसलिये ।बाकी यह रंग इतना बुरा नहीं है । काली कम्बली वाले की कितनी महिमा है । दरवेश सन्त काले कपड़े ही पहनते हैं । काले पर कोई दूजा रंग नहीं चढ़ता । हमारे धार्मिक ग्रन्थों की स्याही काली ही है ,मूंछ काली सबको पसंद है । काले बाल जवानी का सबूत हैं । शायर काली आंखों और जुल्फों के बेशुमार कसीदे लिख चुके हैं ,लोगों ने कहा मजनू को 'तेरी लैला रंग दी काली । मजनू ने फिर हंसके कहा तेरी अख ना देखन वाली ।।' उदाहरण के तौर पर नेताओं को ही ले लें । उन्हें जनता का हर विरोध स्वीकार्य होता है चाहे गाली निकाले, भृष्ट कहे, निकम्मा बोले । यह भी कहे कि अगले चुनाव में वोट नहीं देगें तो भी वह मुस्करा कर सुनता है । वह जानता है जनता विरोध करना ही जानती है और मेरा क्या बिगाड़ लेगी । वोट तो उसे झख मराकर देना ही पड़ेगा । घर पर रख कर क्या अचार डालेगी । ले दे कर एक वोट ही तो जनता के पास है उसे देने में हमेशा की तरह जल्दबाजी करेगी ही । नेता को कोफ्त तब होती है जब जनता मुर्दाबाद के नारों से आगे बढ़कर पुतला जलाने तक चली जाती है , तब उसे लगता है यह जनता का काम नहीं यह हमारे विरोधियों की कारस्तानी है ।कोई मुझसे जलने वाला नेता यह सब करवा रहा है वरना आग से खेलने का काम जनता का थोड़ी ना है । नेता से भी ज्यादा उसका पुतला जलाना उसके चमचों को अखरता है वे जानते हैं अगर सचमुच भैयाजी की अंत्येष्ठि हो गई तो हम किसकी जेब में रहेंगे । उनके साथ हाइवे के ढाबों पर मुर्ग मुसल्लम का जो भोग लगाते रहे हैं वह कहां से लगाया करेंगे । उनके नाम पर अधिकारियों को धमका लेते हैं ,कई भृष्ट अधिकारी तो हमें ही बंद लिफाफे में नकद नारायण थमा देते हैं कि भैया जी की कृपा दृष्टि बनवाने में सहायता करना । वे लिफाफे हजम करने को कहां से मिलेंगे ।पुतला जलाना सबसे ज्यादा उसकी पत्नी को नागवार गुजरता है कितना भी काइंया है, है तो उस भारतीय नारी का सुहाग । जीते जी उसका पुतला जलाया जाये पत्नी कैसे बर्दाश्त कर सकती है । आजकल नेता जी पुतला जलाऊ कार्यवाही से भी ज्यादा आतंकित हैं काले झंडों से । उन्हें लगता है नारेबाजी से हमारी मोटी चमड़ी का कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन काले झंडों से वोटों की फसल को पाला मार जायेगा । हमें हैरानी होती है भीतरघात से न डरने वाले मुख्यमंत्री जी भी काले कपड़ों से भयभीत रहते हैं जैसे किसी जमाने में हथोड़ा मार या काले कच्छे वालों से डर लगता था। कामरेड लाल झंडे दिखा कर सत्ता की झाग गिरा देते हैं उनके एक अदद विधायक की सत्ताधारियों से ज्यादा चलने लगती है । मुख्यमंत्री पिछले दिनों ब्लॉक स्तरीय खेल ओलंपिक का उद्घाटन करने आये तो काला कपड़ा फोबिया सामने आ गया । कोई विरोध नहीं था झंडे नहीं थे बस वहम खोपड़ी में घुस गया था । जब आका किसी बात पर थोड़ा सा भी नापसंदगी का इशारा करदे तो उसके मुख्य सहायक अधिकारियों को उस बात का मुद्दा ही खत्म कर देने का आदेश दे देते हैं । आदेश को इम्प्लीमेंट करने वाली चेन आगे से आगे जल्दी पूरा करने और श्रेय लेने के चक्कर में अति करने तक उतर आती है । वहां उपस्थित बच्चों तक की काली टी शर्ट,टोपी, काली जिल्द वाली कॉपी -किताब, बैग, रुमाल, पेन तक को हटवाया गया । काले अंडरवियर वालों को वहां से भगा दिया । लड़कों को डर सताया कि हमारे सिर पर काले बाल हैं कहीं पुलिस वाले झींटे न खोस लें । स्वयं भीड़ कम करवा ली लेकिन काले कपड़े वाले सहन नहीं हुए । अभिनेता देवानन्द पर मुम्बई में काले कपड़े पहनने पर बेन लग गया था वे उन कपड़ों में जानलेवा लगते थे उन्हें जाता देख कर कई बेवकूफ लड़कियां छतों से कूद जाती थीं ।पहले वाले नेता काले कपड़े से नहीं डरते थे । शायद भैंस खुद का रंग नहीं देखती काले कपड़े से बिदकती है । जो अपने काले कारनामों से नहीं डरते, जिन्हें काली कमाई और काला धन हजम हो रहा है उन्हें काले रुमाल से पसीना आ जाता है । हरियाणा के एक पुराने दबंग नेता के आगे काले झंडे लहरा कर विरोध किया गया तो वे बोले मेरी मां बीस गज का काला घाघरा पहना करती थी काले झंडों से मुझे क्या डराओगे। कुछ इस तरह का बेइज्जती प्रूफ नेता बना जाये तो डर कुछ कम होगा वरना हर नेता को हर जगह काले झंडे मिलेंगे । हारने के बाद लगने वाले ऐसे नारों से तो काले झंडे ही अच्छे है कि "काली कुतिया कान कटी ,नेता तेरी रान्द कटी।"

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home