गांवों में खेल, खेल में खिलवाड़हमारी उम्र के लोग उन दिनों को याद करके खुश हो लेते होंगे जब उनके बचपन में आधी रात तक गांव के बाहर खेल होते रहते थे । कोई कबड्डी तो कोई कुश्ती खेल रहा होता,कोई ऊठक बैठक कर पसीना निकाल रहा होता । बीस बीस साल की लड़कियां भी लड़कों के साथ आती पाती या लुका मीची खेलती थीं किसी के मन में बुराई सिर न उठाती न घरवालों को एतराज होता । छोटे बच्चे लालालिगतर खेलते । कहीं सक्कर भीजी और लूनिया घाटी हो रही होती दूसरी तरफ आंधा झोटा खेलकर चतुराई का परिचय दिया जा रहा होता। बदमाश लड़के मुर्चा पीछाण भी खेलते । दिन में कांच की गोलियां और मारदड़ी में हाथ आजमाते । स्कूल की छुटियों में वहां के नीम और टालियों पर क्रां डंडा का रोमांच खत्म ही न होता । स्कूल के खेल अलग होते पशु चराते खेलने वाले अलग । देवर भाभी वाली ताश छिप कर खेलने का आनंद शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता । होली पर गांव में मेहरी का नाच कई मजे देता । गांव में राम लीला आ जाती तो कई दिनों का मनोरंजन साथ लाती । किसे मलाल होता कि गांव में बिजली नहीं है। पढ़े लिखे बॉलीवाल खेलते, जो साइकिल चलाना जानता वो तो सुपर हीरो होता । हाड़ी की फसल में ज्यादा पान्त लगाना भी कम्पीटीशन हो जाता । वजन उठाना,चिटकी खाना या घी पीने का मुकाबला कितना रोचक होता होगा । इन दिनों फिर से गांवों में खेलों की चहल पहल हो रही है । राजीव गांधी ग्रामीण ओलम्पिक खेल महाकुंभ चल रहा है ।प्रतिक्रियावादी पूछते हैं राजीव गांधी किस खेल के खिलाड़ी थे जो उनके नाम से इतना बड़ा आयोजन हो रहा है । कहने को कहा जा सकता है इंदिरा रसोई में सस्ता खाना मिलता है इंदिरा जी कब रसोई में गई होंगी । महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन से यह सरकारी सिलसिला शुरू हुआ है तो उन्हीं के नाम पर रख देते। ध्यानचंद जैसा समर्पित खिलाड़ी दोबारा नहीं जन्मा । वे हॉकी के जादूगर थे । खेल उनकी नस नस में बसा था । हॉकी खेलते हुए उनके कौशल के जादू और हिटलर द्वारा उन्हें अपने देश में बसने का आग्रह करने के किस्से आज भी किवदन्ती हैं । नीयती यह रही वे जीवन की अंतिम बेला में आंखों से अंधे हो गए थे और उसी बुरी अवस्था में नश्वर संसार को अलविदा कह गए । अब उनके नाम पर खेल रत्न पुरस्कार दिए जाते हैं । अभी अभी पंचायत स्तर पर खेल सम्पन्न हुए हैं ब्लॉक, जिला, राज्य फिर राष्ट्रीय स्तर पर चलेंगे । खेल प्रतिभाऐं सामने आयेंगीं । जैसा कि गांवों का स्वरूप बदला है खेल भी अब प्रीति बढाने का साधन नहीं रहे बल्कि कटुता बढ़ रही है । अब त्योंहार पर बच्चों को घर में ही रोक कर रखा जाता है कहीं बाहर जा कर कहीं लड़ाई न कर लें । खेल खेल में कोई जानबूझ कर चोट न मार दे । बच्चे शारीरिक मानसिक उन्नयन व खेल भावना हेतु कम और प्रमाण पत्र हासिल करने के उद्देश्य से ज्यादा खेलने लगे हैं । क्रिकेट खिलाड़ियों की विलासता और ग्लैमर को अनुकरणीय व आदर्श मानकर चलते हैं । खेलों से नौकरी और पैसा ध्येय हो गया । प्रतिस्पर्धा बढ़ गयी । खिलाड़ी बेईमानी करके भी जीतना चाहते हैं, खेलकर जीतना नहीं । शक्तिवर्धक दवाइयों का सेवन कतिपय बड़े खिलाड़ी करते रहे हैं लेकिन छोटे खिलाड़ियों की भी नशे की डोज लेकर खेलने की खबरें आती रहती हैं । चिंता जनक बात है अच्छे खिलाड़ी बाद में नशेड़ी और असमाजिक तत्व बनते देखे गए हैं । ग्रामीण खेलों के दौरान हमारे जिले में ही खुइयां थाने में खिलवाड़ का वाद आया है । सरदारगढ़िया गांव के स्कूल में ढाणी बेरवाल के खिलाड़ियों ने मेजवान गांव को हरा दिया तो गांव के लोगों को हार हजम नहीं हुई जीतने वालों को पीट दिया । मामला थाने आ गया । चारणवासी गांव व मलवानी गांव के बीच मैच के दौरान विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों गांवों ने भविष्य में साथ न खेलने की कसम खा ली । वहीं 25 आर डब्ल्यू डी गांधीनगर व लालपुरा के बीच हुए महिला खो खो के मैच पर भी विवाद एस डी एम तक पहुंचा । होना यह चाहिए था- "खेल खिलाड़ी खेल जीत सके तो जीत। हार में मत हार मान, पाल खेल की प्रीत।"


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