रसिया निम्बू लयादे रे आम आदमी को महंगाई का पता तब चलता है जब खाने पीने की चीजें उसके बूते से बाहर होने लगती हैं । हवाई जहाज की टिकिट कितनी महंगी हो गई उसकी बला से, लेकिन जब एक निम्बू पन्द्रह रुपये का सुनने को मिलता है तब कानों पर विश्वास नहीं होता । कल परसों तक बीस तीस के भाव बिकने वाला निम्बू साढ़े तीन सौ से चार सौ तक किलो पहुंच जाए तो मुंह से यही निकलता है 'मर तेरी मा नै--- तू भी।' निम्बू की गिनती अब तक तीन में न तेरह में वाली ही रही थी । वह न कभी प्याज जैसा वी. आई. पी . रुतबा पा सका न घीया कद्दू सी मन से उतरी उपेक्षित सब्जी सा दुत्कारा गया । बस हरी मिर्च के साथ नजरबट्टू बनकर मकानों ,दुकानों,गाड़ियों पर लटकता रहा । अब इस पर महंगाई की नजर पड़ गयी तो गीदड़ की तरह पहाड़ पर बसेरा कर लिया । इसे रसीला होने और आयुर्वेद में विशेषताओं का वर्णन होने के कारण लोकगीतों में जगह मिली थी । निम्बूड़ा निम्बूड़ा और रसिया नींबू लयादे वे मेरे उठी कलेजे पीड़ वगैरा ।अब तो करोना से भी ज्यादा निम्बू का जिक्र हो रहा है । सोना चौबन हजारी हो रहा है उसकी इतनी इज्जत नहीं हो रही जितनी निम्बू की । डीजल पेट्रोल के नखरे के कारण आये दिन धीमा झटका जोर से लगता देखते हैं, कुछ पैसे बढ़ा कर न मारते हैं न रोने देते हैं। लेकिन क्या पिद्दी क्या पिद्दी का शोरबा निम्बू आंख दिखाये तो चर्चा करनी लाज़िमी हो जाती है । प्याज ने सब्जियों के साम्राज्य में जो धाक जमायी और अपने अस्तित्व का एहसास करवाया वैसा न सेब संतरे कर सके न फलों का राजा आम । फलों के भाव हमेशा आम आदमी की जेब के लिये भारी ही रहे । उनके अंगूर खट्टे से मीठे हुए ही नहीं । लेकिन प्याज और पिछले दिनों टमाटर ने जब शतक पार किया तब लगा सेब सस्ता है इससे यारी गाँठनी चाहिये । केले दर्जन के भाव मिला करते थे उन्होंने किलो में तुलना शुरू कर दिया फिर भी आम आदमी के बजट में ही रहे हैं । तीस रुपये पर काफी समय से भाव टिका है । परिवार के लिये एक किलो ही खरीदा जाता है जिसमें छह सात आ जाते हैं । सबको एक एक मिल जाता है। रिश्तेदारों के यहां जाते समय भी केले ही फायदेमंद रहते हैं । कुछ ले कर जाने की फारमल्टी भी पूरी हो जाती है और अधिक खर्च का गिरगिराट भी नहीं रहता । यूं घर फूंक तमाशा देखना हो तो काजू बादाम और बर्फी कतली ले जाने से कौन मना करता है । निम्बू भोजन की थाली की अनिवार्यता कभी नहीं रहा । यह स्वाद बढ़ाने वाला गैर जरूरी आइटम रहा है । दही जमाने के लिये जावण न मिले तो दो बूंद नींबू चाहिए होता है बस । गर्मी में सकंजी पीने की इच्छा हो तो इसकी याद आती है । अनेक घरों में महीनों तक निम्बू का प्रवेश नहीं होता । इसकी खटास भी कई लोगों को नहीं सुहाती । पैदावार में कमी आई तो निम्बू के भाव ने राकेट गति पकड़ ली । जिन दिनों फसलों पर कीटनाशक छिड़काव किया जाता है स्थानीय स्तर पर निम्बू का भाव कुछ ऊंचा उठता रहा है अभी वह सीजन भी नहीं बस मनमर्जी से भाव बढा कर आसमान में टांग दिया । पैदावार में कमी अन्य फसलों में भी होती आईं है उनके भाव आसमान क्यों नहीं छूते । जिस फ्रिज में दो चार निम्बू पड़े होते हैं वह आजकल खुद को रईस समझने लगता है । यूपी के शाहजहांपुर से खबर आई है कि सब्जी मंडी की एक दुकान से कोई चोर साठ किलो निम्बू चुरा कर ले गया। पुलिस मुस्तैदी के साथ चोर की तलाश में जुटी है ।शायद पर्चे में पहली बार निम्बू का मुख्य वस्तु के रूप में उल्लेख हुआ होगा । आज से पहले तेजी के दौर में प्याज और ग्वार के ट्रक चोरी होने के समाचार ही सुना करते थे। पहली बार निम्बू चोरी सुनी है । निम्बू पहलवान की मूंछ पर जा टिका है । भाव बढाने वाले भी कमाल के अर्थ शास्त्री होते हैं दैनिक उपयोग की किसी ऐसी वस्तु का महत्व बढ़ा देते हैं जिसके बारे में सोचा भी नहीं होता । दालें,चीनी,गुड़, खाद्य तेल आदि के रेट बढ़ते हैं तो मन दुखता है । दालचीनी या लोंग इलायची का भाव नहीं अखरता । नमक सौ रुपये किलो हो जाये तो कम इस्तेमाल करके संतुलन बनाया जा सकता है । वैसे भी डॉक्टर कम खाने की सलाह देते हैं । कभी चाय पत्ती चालीस रुपये से कुछ ही दिनों में एक सौ बीस रुपये हुई और बाद में साढ़े तीन सौ । जब कोई ग्राहक चाय की तेजी का रोना रोता है तो दुकानदार पुराना अखबार निकाल कर दिखाता है 'लो पढ़ लो भाई जी,अपने देश में ही अमीर लोग अस्सी हजार रुपये किलो की चाय भी पीते हैं । 'पढ़कर ग्राहक की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती है वह सौदा लेकर जाने में ही भलाई समझता है । एक बूझबुझाकड़ ने निम्बू महंगा होने के पीछे रहस्यवादी कारण खोजा है कि निम्बू तस्करी के जरिये पाकिस्तान चले गये हैं ,वहां एक निम्बू सौ का मिल रहा है ,कारण वहां सरकार की डावांडोल स्थिति के बीच लोगों को अजीब डर सताने लगा है कि जैसे पुतिन ने यूक्रेन पर हमला बोल रखा है कहीं मोदी जी पाकिस्तान पर न चढ़ दौड़ें । इस भय के कारण उन्हें दस्त लग रहे हैं ।वैद्य हकीमों के पास इसी मर्ज के मरीज पहुंच रहे हैं । गांव का अनपढ़ मरीज एक परिचित हकीम के पास आया । चेहरा देखते ही हकीम बोला 'निम्बु इस्तेमाल करो ।' दो घण्टे बाद हकीम ने खुद मरीज को फोन करके पूछा 'मीयां वशीर हुण तेरे दस्तां दा की हाल ए ।'अग्गों मरीज बोल्या 'दस्त नूं ते अराम ए पर हिक मुसीबत डाढी आण खलोती ए ,जदों नेम्बू कढ़ लैना वां दोबारा शुरू हो जांदे ने ।'


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