Saturday, September 17, 2022

कोझली कीकर जैसे आदमीलोक मानस में एक पुरानी लोकोक्ति अभी भी अस्तित्व से जूझ रही है - मकोड़ा, टांटिया अर जूं ,भूल हुई करतार सयूँ ,ऐ बनाया क्यूं ? इस सूची में और बहुत कुछ जोड़ा जा सकता है जिनकी किसी को भी जरूरत नहीं । सांप, बिच्छु,गोयरा कौन मांगता है कि घर की शोभा बढ़ाएं।मच्छर, मक्खी, कसारी, घुन,फंफून्द किसे पसंद हैं। हिड़के कुत्ते को रोटी खिलाने के पुण्य प्रताप से भी सब बचना चाहते हैं ।कौन चाहता है पागल या खाऊ यार पड़ोसी से पाला पड़े । आंधी, तूफान, अतिवृष्टि, ओला वृष्टि, भूकम्प, अकाल,खेती में सुंडी , बीमारी या करजाऊ होने की मांग भगवान जी को ज्ञापन दे कर कौन करता है । कोई नहीं चाहता जलदाय विभाग हमारे घरों में बदबूदार पानी भेजे या पुलिस व कोर्ट कचहरी से वास्ता पड़े। फिर भी ये मारक अनसर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा जाते हैं । सर्दी की आधी रात को पांच चार दूर के रिश्तेदार आ जायें तो शहरदारी में कैसा महसूस होता है ? हर शहरी बन्दा इस बिन मांगी मुराद से कन्नी काटना चाहता है । अब आप कोझली कीकर को ले लें किसने चाहा था कि यह जी का जंजाल हमारे पर्यावरण में घी खिचड़ी सा एक मेक हो जाये । कहीं भी चले जाओ यह आपको आगे तैयार मिलेगी । गांव, शहर, खेत, मैदान, सड़क, पहाड़, नदी, नहर किनारे आपके स्वागत में पलक पावड़े बिछाये दिखती है ।अलग अलग जगह इसके नाम भी अलग हो सकते हैं पर पहाड़ी कीकर और गुण के आधार पर स्थानीय लोग इसे कोझली कीकर कहते हैं, यानी गन्दी, बेकार, बदसूरत, और दुःखदेनी कह कर इससे नफरत करते हैं, क्योंकि यह किसी भी काम नहीं आती ।काटते हैं तो जहरीले कांटे बलत लगा देते हैं । हाथ लगाते हैं तो बदबू आती है ।दातुन मंजन इससे कोई करता नहीं । जलाऊ ईंधन भी इसे नहीं कहा जा सकता ।जब तक सूखती है तब तक दीमक लग जाती है । इमारती लकड़ी तो इसे कहा ही नहीं जा सकता । कस्सी कुल्हाड़ी के डंडा डालने के काम भी नहीं आती । इसकी छाया में भी कोई नहीं बैठता । सत्तर के दशक तक हमारे यहां देसी बबूल की चौधर हुआ करती थी। सब उसी की दातुन करते । दोपहर को उसके नीचे चारपाई ढालकर सोया जाता ।लड़कियां सावन के झूले उन्हीं कीकरों पर झूलतीं ।यहीं पशु बंधते । किशोर लड़के खेल खेलते । पक्की लकड़ी होने के कारण खेजड़ी के बाद कीकर ही खेती किसानी के व घरेलू औजार बनाने के काम आती थी ।घर की छत और किवाड़, खिड़कियां, बच्चों के पालने खिलोने इसे से बनते थे । इसकी पातड़ी यानी तुक्कों का अचार बड़ा गुणकारी होता था । लग गया तीर नहीं तो तुक्का कीकर बिना यह कहावत कैसे बनती । हथकढ़ के शौकीन इसकी छाल का इस्तेमाल करते और पीले फूलों को अर्क निकालते समय ड्रम में डालते तो स्वाद में इजाफा हो जाता था । कीकर की गोंद से किताबें कॉपियां चिपकाई जातीं । अब देसी कीकर समूल नष्ट होने के कगार पर है । वजूद बचाने की जद्दोजहद में लगी है जैसे टीवी और मोबाइल आने के बाद पुरातन संस्कृति के पांव उखड़े पड़े हैं । बताया जाता है हरियाली दिखाने के लिये हैलीकॉप्टरों से कोझली कीकर के बीज पूरे देश में बिखरा दीये जो शीघ्र ही अपने कांटों के साथ उग गये और जीवन का हिस्सा बन गये ।इन्हें न ट्री गार्ड लगा कर बचाया गया न किसी जानवर ने खाया । इन्हें पानी से सींचा भी नहीं गया फिर भी दिन दुगनी बढ़वार हुई आज सर्वत्र इसी का बोलबाला है ,जड़ से खोदने पर भी उग आती है । न चाहते हुए भी इसे झेलना पड़ रहा है ।अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो बहुत सारे आदमी भी कोझली कीकर जैसे दिखेंगे जो किसी के काम तो आते नहीं बाधा जरूर बनते हैं । दूसरों की तरक्की देखकर जलते हैं । रास्ते का कांटा बनते हैं ।

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