Saturday, September 17, 2022

कोरी मटकी( कहानी) रूपसिंह राजपुरी उसके कई नाम प्रचलित थे। अनिंद्दय रूप राशि के कारण घरवालों ने उसका नाम फूलां रानी रखा था,सख्त और गुस्सैल स्वभाव होनेके कारण उसे फूलनदेवी भी कहा जाता था।उन दिनों डाकू फूलन देवी बीस बाईस मर्दों को बन्दूक से मार कर खूब चर्चा में थी ।फूलां भी बात बे बात किसी के भी थप्पड़ जड़ने में संकोच न करती थी ।गली मोहल्ले के बच्चे खेलते दिखते तो उनके खेल में जा टांग अड़ाती ।रस्सी कूद आती -पाती या छुपा छुपाई खेलते बिल्कुल अबोध बच्ची बन जाती ।धरती पर लोट कर हाथ पांव चलाती ,झूठमूठ रोती, जानबूझ हार जाती ,तब दुनिया भर की मासूमियत उसके चेहरे पर सिमट आती । बच्चों को तब वह बिना पंखों की परी लगती । लम्बरदार रणजीत सिंह के चार बेटे चार बेटियां हैं ।बड़े सातों बच्चों की शादियां कई साल पहले कर रखी हैं ,वे बाल बच्चेदार हैं।बस फूलां की शादी बाकी है। वह सबसे छोटी सन्तान होने के कारण लाडली भी बहुत है ।अगर उसकी भी शादी कर दी होती तो वह भी अब तक कई बच्चों की मां बन गयी होती ।उम्र के पच्चीसवें वर्ष में चल रही है। रिश्ता हुए पांच छह साल हो गये।शादी की योजना बनती है तब लम्बरदार जमीन का सौदा कर बैठता है अतः शादी अगले साल पर सरका दी जाती है ।इस तरह एक एक साल निकलने से उसकी उम्र काफी हो रही है । लम्बरदार ने भी निर्णय कर रखा है किआखिरी शादी है धूमधाम से करेंगे ,लेट होने की एवज में दहेज ज्यादा देंगे ।वैसे भी चेहरे मोहरे से पचीस की लगती भी नहीं ।गोरा रंग ,भरवां शरीर ,हाथ पांव लड़कों जैसे मजबूत हैं क्योंकि घर और खेत के काम में बराबर भाग लेती है ।खान पान खुला है ।दूध दही और खूब सारा घी भोजन में शामिल रहता है । अच्छी खुराक के साथ श्रम साध्य काम करने से शरीर गोले जैसा और फुर्तीला है।जिस बोरी को इधर उधर सरकाने के लिये चारों भाभियाँ जोर लगा बैठती हैं उसे वह अकेली ही उठाकर दूसरी जगह रख देती है ।तब भाभियाँ उसे पहलवान कह कर छेड़ती हैं , "ननदी,तुम्हें तो दंगल में जा कर कुश्ती करनी चाहिये।" "करूँगी न ,तुम्हारे छोटे ननदोई के साथ ,जाते ही चित कर दूंगी ।" कहकर वो आंख मारती और मुस्कराकर बाहर निकल जाती ,भाभियाँ उसका लोहा मान जातीं ।कई बार वह दो भाभियों के हाथ अपने हाथों से पकड़कर कहती ,छुड़वालो,भाभियाँ पसीनों पसीन हो जातीं पर छुड़वा न सकतीं । न तो लम्बरदार कभी स्कूल गया न उसका कोई बच्चा ।दो बहुएं दो चार क्लासें पढ़ी आ गयीं हैं ,उनसे फूलां ने घर पर ही नरमा तोलने का कांटा देखना ,सौ तक गिनती ,छोटा जोड़ बाकी और कॉपी में लिखना सीख लिया था ।अब लम्बरदारके छोटे पोते पोतियां स्कूल जाने लगे हैं ।नरमा कपास की चुगाई के दो महीने फूलां के लिए हर साल भारी रहते हैं ।सुबह होते ही चुगारी औरतों को खेत ले जाना ,उन्हें खाना ,चाय और बार बार पानी देने में ही दिन निकल जाता है ।बीच में फुर्सत मिलती तो खुद भी चुगती ।पीठ पीछे झोली बंधी ही रहती ।शाम को सबकी गठरियाँ तोल कर कॉपी में लिखना ,अंधेरा होने पर घर जाना ,आकर कई खास भैंसों को दूहना भी उसके जिम्मे था, क्योंकि वे भैंसें उसके बगैर किसी को नजदीक न लगने देतीं थीं ।कई बार ट्रैक्टर मंडी गया होता तो खेत से चुगा नरमा लाने में देर हो जाती ,चुगारियाँ इंतजार न करतीं वे पैदल ही गांव को चल पड़तीं ऐसे में फूलां रात तक 9खेत में बैठी रहती ,डरना तो वह जानती ही न थी । उस जमाने में अश्पृश्यता का बहुत चलन था ,स्थानीय भाषा में जिसे "भींट"कहते थे यानि जातिगत भेदभाव चरमोत्कर्ष पर था ।हीन कही जाने वाली दलित जातियों के लोगों को हेय कहकर छुआ न जाता था न ही उनकी छुई चीज के हाथ लगाया जाता ।उन्हें केवल खेत के कठिन कामों ,पशुओं की सार सम्भाल और गोबर बुहारी में ही लगाया जाता था ।चूल्हे चौके तक तो क्या उन्हें भीतरी आंगन पर चढ़ना भी मना था ।खुद मटके से पानी भरकर पी लेना अक्षम्य और दण्डनीयअपराध हो जाता था ।वे फसल ला कर आंगन में रख देते भीतर कोठयार में घर वाले ही भरते ।उन्हें पानी या खाना दूर से ही दिया जाता ,घर का बर्तन देने का तो सवाल ही न था ।दलितों ने भी सदियों से चले आ रहे इस अन्याय पूर्ण व्यवहार को नीयति मान रखा था ।वे भी धर्म पालन की तरह इन सामाजिक भेदभाव के बन्धनों का निर्वहन करने का भरसक प्रयास करते ।दासता उनकी मानसिकता में गहरे तक पैठ गयी थी । फूलां भींट के मामले में बहुत कट्टर थी ।भूल से भी किसी दलित का हाथ घड़े को लग जाता तो वह आग बबूला होकर घड़ा फोड़ देती । गाली गलौज के साथ वो व्यवहार करती कि "दोषी" माफी मांगता ही रह जाता ।नरमा चुगाई के समय उसका वास्ता दलित औरतों से पड़ता था जिन्हें वह डंडे के बल पर हांकती रहती ।उन्हें एक वक्त का खाना ,दो बार चाय और दिन भर पानी देते देते वह चिड़चिड़ी हो जाती ।सुबह ट्राली पर चुगारियाँ के साथ चार पांच घड़े पानी भी खेत में जाता ।जब भी उन्हें पानी देना होता उनके बर्तन में डालकर डंडे से परे सरका देती ,सुबह की रोटियां लम्बरदार साइकिल पर देकर जाता ।तन्दूर की बनी हर दो रोटियों के बीच प्याज की चटनी और अचार रहता ,सबको छाछ की एक बाटकी भी मिलती ।शाम की चाय के साथ भी सुबह की बची दो दो रोटियां दी जातीं।इन दिनों घर में बहुओं की भी फिरकी घूम जाती ,उन्हें खुद के लिये समय ही न मिलता ।सारा दिन चूल्हे चौके में ही लगी रहतीं ।अन्य खेतों में सरसों व गेहूं के लिए जमीन तैयार करने वाले आदमियों के लिए भी खाना जाता था ।लम्बरदार भी लाटू सा घूमता रहता जिस दिन पानी की लागत ज्यादा हो जाती और समय से पहले खत्म हो जाता तब सिर पर घड़ा उठाकर फूलां किसी चुगारी को साथ लेकर खेतों में बनी तलाई से पानी लेने निकल जाती ।उनके खेत से लगभग दो किलोमीटर दूर गोचर भूमि में वर्षों पूर्व एक छोटा जोहड़ खोदा गया था जो बीस आँगल बरसात से ही लबालब भर जाता,तब वह खेतों में काम करने वालों, गड़रियों, ग्वालों के लिए बेहतरीन जलस्रोत रहता ।फूलां बहुत बार यहां से पानी भरकर चुगारों को पिलाया करती थी ।साथ में किसी औरत को तो ले आती थी परन्तु घड़ा खुद ही उठाकर सिर पर बड़ी फुर्ती से रख लेती थी ,भींट मुख्य कारण था। वैसे भी उसमें अथाह शक्ति थी ।उसका रिश्ता भी उसकी ताकत और कर्मठता के कारण हुआ था ।हुआ यह कि उनके गांव बारात आयी हुई थी। रिवाज था ,अलग अलग घरों में बाराती ठहराये जाते थे ।उनके नहाने धोने ,चाय पानी,चारपाई ,बिस्तर,हुक्का आदि की व्यवस्था घरवालों के जिम्मे रहती ।लम्बरदार के दूर के भतीजे की बेटी की शादी थी ।वह लड़की फूलां से सात साल छोटी थी ।दस बाराती इनके घर ठहरे थे ।वे सुबह नहा कर चाय के बाद हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे ,सभी अधेड़ उम्र के थे ।फूलां नें वहीं भैंस दूहने के लिये पाडा छोड़ा।पाडा तीन चार महीने का था ।इतने बड़े काटडू को भैंस के थनों से छुड़ा कर दूर ले जाकर बांधना खाला के बाड़े से खरबूजे तोड़ने जितना आसान नहीं होता ,वो शान ले लेता है ।ऐसी स्थिति में कमजोर औरतें रोने लग जाती हैं ।बाराती देख रहे थे ,फूलां ने पाडे की बूथी में हाथ डाला और ताकत के साथ खींच कर दूर बांध दिया और झमाझम दस सेर पक्का दूध निकाल बाल्टी भीतर ले गयी ।एक बाराती सब माजरा बड़े गौर से देख रहा था, वह अपने साथियों से बोला,"यारो,ऐसी लड़की बहु के रूप में मिल जाये तो घर के सोए भाग जाग जाएं ।""तो ले चलते हैं तेरे बेटे कुलदीप के लिये,लड़की तो हमने देख ही ली है ।"एक दूसरा बाराती बोला ।"यह लड़की मिल जाये तो बिना दहेज एक रुपये नारियल में ही ले जाने को तैयार हूं।"वह फूलां के रूप में पुत्रबधु का सपना देखने लगा था ।"दहेज की इस घर में क्या कमी है ।लम्बरदारजी के पास छह मुरब्बे जमीन है पानीवाली ।"दूसरा बाराती भूमिका बांधने में जुट गया था ।"तो बन जा बिचौला,तेरे लिये सोने की अंगूठी पक्की ,चाहे आज ही ले ले ।मेरे बेटे को भी साठ बीघा आती है झोटे के सिर जैसी ।"पहले बाराती ने मन बना लिया था ।"लम्बरदार मेरी रिश्तेदारी में है ,मेरी बात नहीं टालेगा ,बात पक्की समझो ।"दूसरा बाराती निश्चित था ।उसने एक महीने में ही रिश्ता करवा दिया ।तबसे ही लड़के वाले विवाह मांग रहे हैं,लम्बरदार मोहलत मांग रहा है ।लड़के के बाप ने फूलां को ही बहू बनाने की ठान रखी है वरना उसके लड़के को रिश्तों की क्या कमी?दो तीन दिन से चुगारियाँ के साथ एक लड़का भी आने लगा था ,उसे नरमा चुगने का अभ्यास न था ,बस अपनी मां की कुछ सहायता कर रहा था ।खाने के समय उसकी मां से फूलां ने पूछा,"चूना भाभी यह लड़का कौन है ?""तेरा भतीजा है बाईसा,यानि मेरा बेटा,अब तक ननिहाल में रहकर पढ़ रहा था ,आठवीं पास है अब नौवीं में देखते हैं पढ़ाना है या आप जैसे घरों में सीरी लगा दें ।"लड़के की मां ने रोटी का कोर तोड़ते हुए कहा ।"आठवीं?देखने में तो बड़ा लगता है ।"फूलां ने लड़के को गौर से निहारा ।ऊपर वाले होंठ पर कालिमा छा रही थी ।दाढ़ी भी निकलने वाली थी ।"हां बाईजी ,अठारहवां लगा है इसे ।ननिहाल में मामियों की सेवा में लगा रहा ,एक क्लास दो साल में पास करता रहा है ।"चूना चुगारी ने कहा तो सब हंसे ।लड़का गर्दन नीचे करके रोटी खाता रहा ।"ले रे भतीज एक रोटी और ले ले ।ननिहाल में रहकर शर्माना ही सीखकर आया है ।"फूलां नें रोटी उसकी तरफ फेंकनी चाही ।"बस भुआ जी ।"गर्दन झुकाये वह इतना ही बोल पाया ।"तू तो बस स्कूलिया ही रह गया ।तेरी उम्र के लड़के तो रोटियों की रेल बना देते हैं ।"फूलां ने रोटी उसके आगे पड़ी कटोरी पर रखदी ।"क्या नाम है तेरा ?"फूलां अब उसमें दिलचस्पी लेने लगी थी ।"राकेश।"लड़का धीमी सी आवाज में बोला ।"सुंदर नाम है हमारे लड़कों जैसा ,तुम्हारे तो ननकू,मनकू,कोझिया या मंगतू वगैरा रखते हैं ।"फूलां ने बिना मांगे उसकी कटोरी में पानी डाल दिया ।उसके बाद फूलां जब भी उस लड़के को बुलाती "स्कूलिया "ही कहती ।वह भी शाम को गठरियाँ तुलवानेऔर कांटा देखने में मदद करने लगा था ।एक दिन खेत जाने से पहले नहाने के लिये रात को धो कर सुखाये कपड़े खूंटी से उतारने लगी तो फूलां को उसकी मां ने टोका ,"कभी तो ढंग के कपड़े पहन लिया कर बेटा ?इन कपड़ों में काम वाली बाई लगती है ।""मां मैं खेत जा रही हूं ,मुकलावे नहीं ।"फूलां ने हंसकर मां को कहा ।"जवान जहान बेटियों पर तो गहरे रंग के कपड़े ही अच्छे लगते हैं ।"कहकर उसकी मां अंदर चली गयी और सन्दूक से उसके ससुराल से सिंधारे में आया गूढ़े येलो कलर का सूट लेकर आयी।"आज यह पहन ।"मुस्काते हुए फूलां ने सूट ले लिया ,उसपर हाथ फिराया और लेकर बाथरूम में घुस गयी ।जब वह तैयार हुई तो उसकी मां एकटक देखती रह गयी ।"तू इतनी सुंदर है रे फूलो।"कहकर मां ने उसे छाती से लगा लिया ।उसकी आंख से उंगली छुआ कर काजल का एक टीका उसकी गाल पर लगा दिया ।"मां की भी नजर लग जाती बच्चों को ।" उसकी बलईयां लीं।उसकी भाभियों ने भी उसकी सुंदरता की तारीफ की ।ज्यादा पढ़ी लिखी भाभी बोली ,"आज तो ननदी ऐसी लग रही है जैसे ब्यूटी कम्पीटीशन में जा रही है।"जब तक वह तैयार हुई उसका बड़ा भाई चुगारियों को ट्राली में चढ़ा कर ले आया था ।वह चढ़ी तो खुशबू की लपट सबको महसूस हुई ।औरतें देखती रह गयीं ।वह अपने निर्धारित स्थान पर रखे मूढ़े पर बैठ गयी ।पानी के घड़े उसके पास ही रखे थे ।स्कूलिया एक कोने में बैठा उसे कनखियों से देख रहा था ।वहां से चलने के बाद कुम्हारों का घर आया तो वह ट्रैक्टर रुकवाकर उतरी ।वहां से उसने एक कोरी मटकी खरीदी ।"यह सिर्फ मेरे लिये,घड़ों का पानी अब ठंडा नहीं रहता ।"मटकी अपनी गोदी में लेकर बैठते हुए फूलां ने कहा ।"मटकी का रंग भी तुम्हारे सूट जैसा है बाई सा ।" एक चुगारी ने कहा,लेकिन कोई समझ न पाया ,प्रशंसा सूट की की है या मटकी की । खेत में जाकर सब अपने अपने काम से लग गए ।फूलां खाली खाले में चक्कर लगा कर आती और घड़े में मूंह देख कर बाल सँवार लेती ।खाने के बाद गर्मी ज्यादा ही बढ़ गयी थी ।आसोज के दिन गर्म और रातें ठंडी हो जाती हैं ।नरमा चुगते समय हवा नहीं लगती ।पसीना बहुत आता है।दोपहर को उसके याद आया नई मटकी में भी पानी भरना है ।उसने बूढ़ी चुगारी को साथ चलने का कहा तो वह हाथ बांध गयी ,साथ में सुझाव दे गयी कि स्कूलियाकोई काम नहीं कर रहा उसे ले जाओ ।उसकी मां ने भी सहमति दे दी तो वह पीठ पर बंधी झोली खोलकर साथ चलने को तैयार हो गया ।सिर पर मटकी,उसपर ढक्कन के रूप में बाटकी रखकर फूलां मजाजन अंदाज में पगडण्डी पर चल पड़ी ।लड़का उसके पीछे पीछे चप्पल फटकारता चला जा रहा था ।पाजेब की रुनझुन और चप्पल की फटक फटक में कहीं सुर ताल नहीं बैठ रहा था ।फूलां के दोनों हाथ मटकी पर थे ,उसकी बगलें पसीनें से भीगी पड़ी थीं ।गर्दन और पीठ पर से कुर्ती गीली हो रही थी।फिट सूट में उसकी कमर के नीचे की गोलाइयाँ ऊपर नीचे हो रही थीं ।लम्बी चोटी कभी इधर तो कभी उधर दस्तक दे रही थी ।नयी जूतियां चर्र चूं चर्र चूं कर रही थीं।धूप से बचने के लिये उसने थोड़ा घूंघट निकाल रखा था ,जो आंखों को ढके हुए था ।गालों को भी दोनों तरफ से ढककर दुपट्टा मुंह में दबा रखा था ।मटक मटक चलते हुए वह लड़के से बातें भी करती जा रही थी ।उसके ननिहाल ,स्कूल,अध्यापक,मामियांऔर किताबों की बातें ।जब कभी रुक कर उसकी तरफ देख कर उत्तर पूछती तो लड़का उसे देखता ही रह जाता ।चेहरा ऐसे लगता जैसे गुलाबों के गुलदस्ते में दो मोमबत्तियां जग रही हों ।छाती के उभार और भी स्पष्ट हो जाते ।कुछदेर बाद वे तलाई की पाल से पानी की तरफ उतर रहे थे ।फूलां ने तो यहां का चप्पा चप्पा देख रखा था ,लड़का पहली बार आया था सो वह प्राकृतिक छटा फटी आंखों से देख रहा था ।सघन पेड़ों की हरियाली युक्त छाया चारों ओर थी लेकिन उनके नीचे कांटे ,सूखे पत्ते और भेड़ बकरियों की मींगनीयों की गन्दगी थी ।फूलां जानती थी पेड़ों के झुंड के नीचे गड़रियों ने कपास की बनछटियों से एक शानदार झोंपड़ी बना रखी है ,जहां वे दोपहर को आराम करते हैं ।पास में ही एक कच्चा चूल्हा है जिस पर चाय आदि बनाते हैं और चौथे पहर फिर भेड़ बकरियां चराने निकल जाते हैं ।आज इधर कोई रेवड़ नहीं आया था ।वह चलती हुई झोंपड़ी के पास आ गयी ।सामने तलाई नीले जल से भरी छोटी झील सी प्रतीत हो रही थी ,जो दो माह पहले सावन की बरसात में ऊपर तक भर गयी थी ।उसने मटकी बाहर रखी और झोंपड़ी के भीतर जा कर लेट गयी ।वहां ठंडक महसूस हुई ।कमर सीधी करते ही उसे आराम मिला ।लड़का बाहर एक पत्थर पर बैठ गया ।थोड़ी देर बाद उठकर बाहर आई तो गर्म हवा का झोंका गुलाब के फूलों को झुलसा गया ।उसने अंगड़ाई ली।सलवार को घुटनों तक ऊपर खींचकर खोंस लिया।फिर मटकी उठाकर पानी की तरफ चली ।लड़के को उसकी गोरी मांसल पिंडलियां सोने जैसी प्रतीत हुईं ।उसे लगा चन्दन के तनों के बाहर पाजेब रूपी सपोलिये लिपटे हैं ।वह पानी के भीतर चली गयी ।मटकी को धोया तो मटियाली महक बिखर गयी ।पानी का संसर्ग पाकर आग में तपी मिट्टी सां सां करने लगी ।मटकी भरकर बाहर आ गयी ।भीगी पिंडलियों का सोना और भी चमकदार हो गया ।मटकी रखकर वह पुनः झोंपड़ी में लेट गयी।उसे चैन न आ रहा था ।वह फिर से बाहर आ गयी ।लड़का चुपचाप ठुड्डी पर हथेलियां रखे उसे देख रहा था ।फूलां ने दुप्पटा झोंपड़ी पर टांग दिया ,बाल खोल लिये और तलाई की तरफ चल दी , गहरे पानी में जा कर डुबकी लगा दी ।मल मल कर नहायी ।फिर झोंपड़ी में आकर खड़ी रह गयी ।बाहर आ कर मटकी उठाई और हंसते हुए लड़के पर उंडेल दी"कितनी गर्मी है तू भी नहा ले ।"वह कुछ नहीं बोला बस भीगे कपड़ों को देखता रहा ।अब दोनों भीग चुके थे ।फूलां के तन पर कपड़े चिपके पड़े थे ।पारदर्शी कपड़ों में बदन झांक रहा था ।वह शीघ्रता से गयी एक मटकी और भर लाई ,तब तक लड़का कमीज उतार कर निचोड़ रहा था ।कपड़ों में वह मरियल दिखता था ,अब उसकी चौड़ी छाती,मजबूत कन्धे और बलिष्ठ भुजाएं साफ दिख रही थीं ।अब वह पहले से ज्यादा गोरा लगने लगा था ।एक मटकी उस पर धार बांधकर और गिरा दी साथ में गुदगुदी भी करने लगी फूलां।दोनों हंस भी रहे थे ,एक दूसरे को छेड़ भी रहे थे । झोंपड़ी तक जाने की तो उन्हें सुध रही उसके बाद बेसुधि का आलम छा गया।उन्हें लगा कुछ पलों के लिए समय की घोड़ी बेलगाम होकर एक अंतहीन गुफा में तेज और तेज दौड़ रही है ।उन्माद उसे ऐड लगा रहा है चाबुक मार रहा है ।घोड़ी थमने का नाम नहीं ले रही ।उत्तेजना उसे उकसा रही है । अंधड़ तूफान के बाद जैसे बरसात हुई हो।नदी ,नाले,तालाब उफ़न कर बह रहे हों ।तपते रेगिस्तान में कायनात तृप्त होकर हरी भरी हो गयी हो ।चारों तरफ आनंद ही आनंद व्याप्त हो ।लड़का पत्थर पर बैठकर पसीना पोंछने और सांसों को संयमित करने का प्रयास कर रहा था ।भीतर फूलां गहरे सन्तोष से सराबोर किसी भी नियंत्रण से मुक्त पसरी पड़ी थी ।बाल चेहरे पर बिखरे थे ।छाती धौंकनी सी बज रही थी ।बन्द आंखों से अभी भी सपना देख रही थी जैसे कुछ समय पहले वह एक पतंग थी और नीले अंतरिक्ष में लहरा रही थी ।लड़के के हाथ में डोर थी।वही उसे नियन्त्रित कर ऊंचा चढ़ा रहा था ।अभी भी वह तितली बन कर फूलों की घाटी में उड़ रही है ,चारों ओर से फूलों की बरसात हो रही है । लड़का उठा ,उसने मटकी से बाटकी भर कर गटागट पानी पीया ।एक और बाटकी भरकर वह वह फूलां के पास आया,उसे देखता रहा ।मुस्कान जैसे फूलां के चेहरे पर छप चुकी थी ।पपड़ाये होंठों से कुछ बोलना चाहती थी पर बोल न पा रही थी ।लड़के ने उसकी गर्दन के नीचे हाथ डाल कर उसे उठाया और अंक में भर ली।फूलां ने अपनी बाहें उसकी गर्दन से लपेट लीं । भारी पलकें खोलने का प्रयास किया जैसे उन पर मनों वजन लदा हो ।लड़के ने बाटकी उसके अधरों से लगाई, "पानी पीलो भुआ ।" फूलां ने एकदम आंखें खोलीं,आग्नेय नेत्रों से लड़के को घूरा। "तुम तो हीन जात हो न ,मेरी मटकी को छूने की हिम्मत कैसे की?" बाटकी दस कदम दूर जा गिरी ।वह अस्त व्यस्त कपड़ों को सम्भालती खड़ी हुई ।सिंधारे में आया नया सूट कीचड़ से सना पड़ा था ।खुले बाल भी मिट्टी में नहाये हुए थे ।उसने लात के एक ही प्रहार से मटकी चकनाचूर कर दी ।

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home