माणस खाणी लखूवाली नहर हाल ही में मेरे पास सरदारशहर के युवा मित्रों का फोन आया कि हमारे यहां बहता पानी नहीं होता ,और जिस आपणी योजना का पानी हम पीते हैं उस नहर को देखना चाहते हैं । लखूवाली की नहर दिखाने में आप मार्गदर्शक बनें । पिकनिक मूड में आयेंगे, गाड़ी नहर किनारे रोक कर डिक्की खोलकर डैक पर गाना बजायेंगे 'लाके तिन पैग बलिए' ,खुद भी जाम छलकायेंगे ट्विस्ट करेंगे, भंगड़ा होगा । नहर के पार भाटा उछालने की कोशिश होगी, अंत में नहाएंगे। मैंने उन्हें कहा अगर नहाने के नाम पर खुदकुशी करने का इरादा है तो मैं आपकी मदद नहीं कर सकता । यहां नहाते हुए हमने तो किसी को देखा नहीं । आपने नहाना है तो इसके लिये यहाँ पुलिस चौकी को सूचना करनी होगी,सूरेवाला के गोताखोर पहले बुक करने पड़ेंगे । पहने हुए कपड़े ,बटुआ मोबाइल किसी जानकार के पास छोड़कर आने होंगे बाद में तो मिलेंगे नहीं । लखूवाली की नहर नहाने के नहीं अकाल मृत्यु के काम ज्यादा आ रही है । जब मैंने डरावनी सी तस्वीर पेश की तो वे बोले हम आपको बाद में फोन करते हैं।यह नहर जिसे पुराने लोग आज भी राज केनाल कहते हैं साठ के दशक में बनते हुए यहां तक पहुंची । हरी के पत्तन से निकला हिमालय का पानी सतलुज नदी से होता हुआ हमारे यहां पहुंचता है । पहला हैड हरियाणा के गांव लोहगढ़ के पास बना है जिसे इसी नाम से पुकारा जाता है । इस हैड पर तथाकथित नेता आये दिन सफेद कपड़े पहनकर गाड़ियों के काफिले व पत्रकारों के साथ पहुंचते रहते हैं । वहां काम करवा रहे पंजाब सिंचाई विभाग के अधिकारियों के साथ धौंस पट्टी किस्म की बहस करते हैं जबकि पानी के गणित का ज्यादातर को कुछ पता नहीं होता। इस हैड पर आवागमन लगा ही रहता है । जबकि वहां से थोड़ा सा आगे पंजाब के लम्बी, पँजाबा गांवों के किसान नहर से हमारा पानी ट्रेक्टरों पर बरमा लगा कर सरेआम उठा रहे होते हैं । इस हैड पर डूब कर मरने वालों के आंकड़े कमजोर ही हैं । यहां सुदूर से आई लाशें ही आती हैं जिन्हें बेलदार आगे सरकाने में देर नहीं लगाते । दूसरा हैड मसीतांवाली गांव के पास है, जहां आत्महत्या के आंकड़े अलग प्रकार के हैं। प्रेमी जोड़े वहां ज्यादा गिरने आते हैं, जिनमें अक्सर प्रेमी कुंवारा और प्रेमिका दो चार बच्चों की मां होती है । हरियाणा तक के प्रेमी जीवन से हताश होकर यहां खिंचे चले आते हैं । घर से भागने का मकसद पूरा होने की गर्मी उतर जाने के बाद भविष्य की चिंता सताती है । बदनामी ,पुलिस ,वकील जज, हवालात व शरीके की अपमानित करती नजरें साफ दिखने लगती हैं । दुर्खीम का सिद्धांत कहता है तब मरना ही एक मात्र मार्ग दीखता है । नहर में छलांग लगाना आसान मौत लगती है । इस हैड ने भी बहुत जानें ली हैं । 1983 में तो पूरी की पूरी बस इसमें समा गई थी । इसी के लिये पुलिस चौकी बनानी पड़ी और सी सी टी वी कैमरे लगाये गए हैं जिनके माध्यम से चौकी में बैठे पुलिस वाले हैड पर होने वाली गतिविधियां देखते परखते रहते हैं । संदिग्ध दीखने पर झट पहुंच जाते हैं । मरने वाले कैमरे की जद में नहीं मरना चाहते वे कुछ दूर जाकर सफलता प्राप्त करते हैं । सरकार इस जगह को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है । शायद तब बेमौत मरने वालों की दर कम हो जाये। इसी हैड पर उद्धघाटन हेतु 1962 में तात्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी,उप राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, बिना किसी पद के इंदिरा जी,पधारे । मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया अपनी पूरी कैबिनेट के साथ कई दिनों तक यहीं डेरा डाले पड़े रहे । लखूवाली हैड आगे रह जाता है। हाइवे पर पुल है जिसकी ढाल में गांव बसा है लखूवाली । नहर बनाने वाले ठेकेदार तब भी थे । उनसे केवल सेवाभाव की उम्मीद बेमानी तब भी थी । तब सीमेंट के थैले का रेट पांच रुपये था। मुश्किलों से भरा जमाना था । कच्चे घरों में रहने वालों ने सीमेंट क्या करना था सो उनसे कौन खरीदता । बताया जाता है तब उन्होंने दिहाड़ी बचाने के लिये खदानों में ट्रकों के ट्रक सीमेंट दबाकर ऊपर मिट्टी डाल दी। वर्षों बाद पत्थर रूप में सैट हुए सीमेंट के छोटे पहाड़ धरती से बाहर आये। पूरा माल लगा नहीं सो नहर से दशकों बाद पानी रिसने लगा स्थानीय भाषा में उसे पानी का सिमना कहते है जो सेम नाम से जाना जाता है यही बदबूदार पानी यहां की बर्बादी का कारण बना । लखूवाली नहर में मरने वाले जीवन से अघाये या दुर्घटना वश गिरने वालों की तादाद ज्यादा रहती है । साजिशवश गाड़ी समेत धक्का देकर गिराने या अन्यत्र मारकर यहां लाकर फेंकने की घटनाएं भी हो चुकी हैं।नहर अब इतनी बदनाम हो चुकी है कि रात विरात अकेले ड्राइवर से लूटपाट ही नहीं गाड़ी तक छीन लेती है । गांव से बाहर भी वारदातें करने लगी है । अतः नहाने की बात करना ही बेमानी है ।


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