बिजली का झटका ,पानी की मार।वाह मेरी सरकार आदि जुगादि समय से रोटी कपड़ा और मकान ही मनुष्य की मूलभूत जरूरत मानी गई है बिजली का इसमें कहीं नाम नहीं ।सातों सुख यथा निरोगी काया,जेब में माया,सुलखनी नारी,पुत्र आज्ञाकारी,नीर निवासा,नगर में वासा, और राज में पासा में भी बिजली को सुख का कारक नहीं माना गया । लेकिन आधुनिक सुख घर में बल्कि कमरे में कुई ,रंगीन टीवी, कमाऊ बीवी ,उसका एटीएम अपने बटुए में , घर मैरिज पैलेस के पास, विधायक से यारी और बीपीएल में नाम होना आज के जमाने में सबसे बड़ा सुख है।नये सुखों में बिजली सबसे बड़ी देन है ।हफ्तों में होने वाले काम मिनटों में कर देती है ।लेकिन यही बिजली इन दिनों कोढ़ में खाज हो रही है । कोढ़ में खाज देखी नहीं तो सुनी जरूर होगी । स्पष्ट महसूस करनी है तो इसके लक्षण समझने होंगे । मई जून की तपती मौसमी गर्मी ऊपर से बिजली कट और पानी की नहरबंदी यही तो कोढ़ में खाज होती है । हम बिजली के अभिलम्भित हो गए, उसका नशा करने लगे, उसके बिना जीवन की कल्पना बेमानी है । बिजली की सुविधा ने जनजीवन सरल बना दिया । जो काम हमें हाथ से करने पड़ते थे बिजली करने लगी । कुए से पानी भरना ,बिलोना करना, पंखा चलाना, पानी ठंडा करना, घर में बर्फ बनाना और सिनेमा भी घर में टीवी पर चलने लगा । झाड़ू पोंछा व कपड़े धोना भी बिजली करने लगी ।और कितने ही छोटे बड़े काम इस सूची में जोड़े जा सकते हैं । तभी तो निहंग सिंह बिजली को सुखदेव कौर नाम से पुकारते हैं ।आजादी के बाद इस इलाके में बिजली भाखड़ा बांध पर बननी शुरू हुई और गांवों कस्बों तक पहुंची । नेहरू जी ने जिस दिन भाखड़ा गांव के पास इस पनबिजली संयंत्र का उद्घाटन किया वहां भीड़ में गायक ने गीत सुनाया 'भाखड़े तो औंदी मुटियार नचदी, चुन्नी ओदे सिर उत्ते सुचे कच दी ।' यह मुटियार बिजली ही थी जिसने पंजाब हरियाणा हिमाचल राजस्थान और दिल्ली तक को रोशन किया । बड़े कारखाने और उद्योग शुरू हुए । गांव शहर में आकर बसने लगे । गांव का होरी शहरी बाबू बनकर फख्र महसूस करने लगा । सब बिजली का पुण्यप्रताप था । शुरू शुरू में बिजली वंचित गांव का कोई भोला स्याना बिजली वाले गांव जाता तो आश्चर्य से अधपगला हो जाता कि यह कैसा दीपक बनाया है सरकार जिसमें न तेल है न बाती ,न जगाने को दियासलाई न बुझाने को फूंक मारने की जरूरत ।यही बिजली बड़ी दुर्घटनाओं का सबब बनी फिर भी इसका जादू चलता रहा । बिजली का मुरीद बनने के बाद बिल झटके मारता है । गरीब आदमी के बजट का अच्छा खासा हिस्सा बिल में जाता है । घरों से लालटेन चिमनी वर्षों पहले कूच कर गये । खाना खाते समय बिजली जाती है तो कोफ्त होती है ।जिनका हाथ फुरता है वे इन्वर्टर लगाते हैं सौर ऊर्जा का आनंद लेते हैं । गरीबआदमी कट के दौरान अमीर के घर लोटिया जलता देखकर अपना खून जला कर रह जाता है । सरकार कोयला खत्म है या दो दिन का ही बचा है कहकर डराती रहती है । बिजली फिर भी आंख मिचौली जारी रखती है ।नहरबंदी भी उन दिनों करवाई जाती है जब सर्वाधिक पानी चाहिये होता है । सावनी की बिजाई और घर गृहस्थी के लिये भी इन्हीं दिनों ज्यादा लागत बढ़ जाती है ।अफसर लोग इन्हीं दिनों बंदी मांग लेते हैं, उन्हें इस थ्योरी की ज्यादा समझ होगी ।जलदाय विभाग के जुम्मे पानी पिलाने का दायित्व है वे बंदी में नलकूपों का पानी सप्लाई करके हाय तौबा से बचे रहते है अन्यथा शहरों में हर साल औरतें उनके दफ्तर के आगे पहले से क्रेक घड़े ले जाकर पूरी एक्टिंग के साथ मटका फोड़ स्यापा करतीं थीं । मीडिया में खबरें बनतीं ।अफसरों की जान सांसत में आई रहती ।इस मटका फोड़ अभियान की अगुवाई करने वाले कई शख्स बाद में पार्षद बने।घरों में पानी की टँकी भरी दोपहरी कांड करने पर आमादा रहती है । भूल से कोई आदमी फुहारा छोड़ नहाने बैठ जाये तो फौरन अस्पताल ले जाना होगा । संडास की तूतरी छोड़ना भी भारी पड़ सकता है ।वो फफोले होंगे कि डॉक्टर देखना न चाहेगा मरीज दिखाना न चाहेगा । इस टँकी का पानी किसी भी मौसम में रास न आया । सर्दी में बर्फ से ठंडा और गर्मी में बाल्टी भर पानी में आलू छोड़ दें तो उबल जायें ।बिजली पानी के साथ अगर इंटरनेट भी बंद हो जाये तो लगता है जीवन ही व्यर्थ जा रहा है ।


0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home