जिनका जीना किसी के मरने पर टिका है जब सरकारी कार्यालयों में जाना होता है तो वहां तख्ती पर एक वाक्य अनिवार्य रूप से लिखा मिलता है कि रिश्वत लेना व देना कानूनी अपराध है । उस पर सजा आदि के प्राबधान का उल्लेख भी रहता है तब खुलकर नहीं तो दबे होंठों हंसी निकल ही जाती है कि यह हाथी के दिखाने वाले दांत हैं और आने वाले 'ग्राहक' को कुछ याद कर लेने में सहायता की जा रही है। वैसे अब रिश्वत पाप पुण्य, करनी भरनी, मर्यादा, नैतिकता, गरिमा, हाय, दुराशीष ,देश के प्रति कर्तव्य भाव आदि फालतू शब्दाडम्बरों के सांकल तुड़वा कर सुविधा शुल्क के सर्व स्वीकार्य आंगन की तुलसी हो गई है । लोग मानने लगे हैं कि पैसे देकर भी काम हो जाये तो जान बची लाखों पाये के बराबर है अन्यथा मींगनी घुला दूध पीना पड़ सकता है ।खज्जल खुआर होकर आखिर में झख मराकर भी रिश्वत ही देनी है तो पहले बोल ही दे दो, नहीं तो देवता रूठ जायेंगे । जनमानस में यह बात घर कर चुकी है जो रिश्वत लेता पकड़ा गया वो रिश्वत देकर छूट जायेगा । लेकिन सरकारी कारिंदे जब माथे पर बूक मांड लें तो उनकी प्यास इंद्र देव भी नहीं बुझा सकते । रिश्वत की सीमा, फिक्स रेट और ओर छोर ही नहीं । मांगने वाला अपने घर की जरूरत ध्यान में रखता है सायल की मजबूरी नहीं । जिला स्तर का सक्षम अधिकारी पूर्व में एक चर्चित जमीन रजिस्ट्री के नाम पर सौ बीघा के सौ लाख मांगता पाया गया था । सुनने वालों ने तब दांतों तले उंगली दबा ली थी कि इतनी भी रिश्वत होती है ।जिला कलेक्ट्रेट पूरे जिले के सरकारी कामकाज का रिमोट अपने हाथ में रखता है ।सभी विभागों की मॉनिटरिंग , दिशानिर्देश और निरीक्षण भी वहीं से होते हैं ।आमजन काम न होने की स्थिति में अधिकारियों की शिकायत आदि लेकर वहीं जाता है । उसे उम्मीद रहती है वहीं से न्याय मिलेगा । अगर वहां काम कर रहे किसी कार्मिक को रिश्वत लेने जैसा घृणित कार्य करते गिरफ्तार किया जाये तो बात अफसोस नाक ही नहीं चिंतनीय हो जाती है । ए सी बी ने कलेक्ट्रेट में सहायता विभाग में निजी सहायक दो लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए दलाल मित्र के साथ रंगे हाथों पकड़ा है । यह घूस कोई मुरब्बे अलॉटमेंट करने में सहयोग के बदले नहीं ली जा रही थी न ही रिवाल्वर या गन का लाइसेंस बनवाया जा रहा था । बस कोरोना कहर के समय घर के मुखिया की मृत्यु पर मिलने वाली सरकारी सहायता में से पांच परसेंट की कुंडी लगाने की गिरी हुई हरकत की जा रही थी । मृतक का राशन डिपो था नियमानुसार उसे कोरोना वारियर माना गया । कोरोना से हुई मौत के कारण उसके घर वालों को पचास लाख रुपये की राशि मंजूर हो गई । जिन बाबू लोगों के हाथ से ये कागज निकले हों वे 'सुक्का खूड' कैसे निकलने दें । खबर के अनुसार राशि मंजूर होने से पहले ही पांच परसेंट का गाना बजना शुरू हो गया था । वे समझ रहे थे पानी पुलों के नीचे से ही जायेगा। हमारे बिना पत्ता भी कैसे हिलेगा। लेकिन पैसा ऑन लाइन पीड़ित आवेदक के खाते में आ गया । तब भी बेसुरा राग अलापना बंद नहीं किया और फोन करके पांच परसेंट यानि अढाई लाख देकर जाने का दबाब बराबर रखा । जबकि चाहिये यह था कि इंतजार करते । कभी मिलता तो एहसान जताते ।उसे दोबारा अड़ीक्के चढ़ाने का चक्कर चलाते लेकिन सब्र नहीं हुआ ।बताया जाता है आरोपी चार साल पहले ही नौकरी लगा था और चढ़ते ही ढांण घाळ चुका था । जिले में अढाई साल में बाइस आरोपी रिश्वत मामले में धरे जा चुके हैं,इन आंकड़ों से भी सबक नहीं लिया । पता नहीं क्यों रुपये की हबस आदमी की सोचने की शक्ति भी कुंद कर देती है । सरकारी पद पर कार्यरत मुलाजिम यह क्यों भूल गया कि फोन पर रिश्वत मांगना मुसीबत को बुलावा देना है । आजकल लल्लु पंजू के दो हजार के फोन में भी रिकॉर्डिंग की सुविधा रहती है । यह भी नहीं सोचा मरे हुए की राशि में से काट काटनी राध में छुरी मारने के बराबर है ।दफ्तरों में रिश्वत चाय पानी और आटे में नमक समान तो आदि जुगादि काल से सुनते आये हैं लेकिन बाबू ग्रेड का आदमी एक झटके में अढाई लाख के थूक लगा सकता है तो अधिकारी तो कितने ही वारे न्यारे कर सकते हैं । मृतक को नियमानुसार कोरोना वारियर माना गया है उसे सहायता राशि किसी प्रकार की घोचेबाजी से भी नहीं रुकनी थी । क्यों न दुखी परिवार की कागजी सहायता करके आशीष ली जाती। वहीं अब कैरियर दांव पर लग गया । दो लाख से मिसिज के टूम टल्ले बनवाने की जगह जेल की हवा खानी पड़े तो ग्रह नक्षत्रों का दोष नहीं खुद ईश्वर का नाशुक्रा होने का सबूत है जिसने बढ़िया नौकरी और इज्जत दे रखी थी ।


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