चला चला रे डलेवर गाड़ी होले होलेयात्रा करने का भी अपना अनुभव होता है ।अनदेखे नये स्थान रोमांच और जिज्ञासा पैदा करते हैं । पुराने जमाने में पैदल ही चलना पड़ता था । एक से दूसरे देश तक पैदल जाया जाता था । गुरु नानक देव जी ने चारों दिशाओं में कई देशों की पैदल यात्रा की जिसे उदासियाँ कहा जाता है । महात्मा बुद्ध, महावीर, ईसा सब पैदल घूमें । चीनी यात्री फाह्यान और हुवानसांग की पैदल भारत यात्रा इतिहास की किताबों में पढ़ना भी मजबूरी रही । घोड़ों, गधों या ऊंठ पर भी यात्रा की जाती थी । पहाड़ी लोग खच्चर रखते हैं जो सवारी और सामान दोनों ढोते हैं । याक नामक पशु भी बर्फीले पहाड़ों पर दूध देने के साथ बोझा ढोता है । पहले घोड़े या रथ होते थे वे भी सबको कहां नसीब थे । अब घोड़े शौक और व्यापार के लिये पाले जाते हैं । मारवाड़ी या नुकरा किस्म के घोड़ों की कीमत जानकर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है। बैल गाड़ी और ऊंट गाड़ा का अपना मजा था । हमारे बचपन में हाड़ी की फसल निकालने के समय स्कूल से खेत जाते तो घर वाले ऊंठों के पीछे बंधे फले पर बैठा देते। वे झूटे स्वर्गीय आनन्द से ज्यादा नजारा देते थे । आज महंगी कारों में भी वो स्वाद नहीं आता ।आज के बच्चे ही नहीं युवा भी फला नहीं जानते । आजकल जीप, कार, बस, रेल आदि में हर किसी ने सफर किया है । कुछ खुशनसीब हवाई जहाज में भी बैठे होंगे । जिन्होंने कभी पिकअप वालों से लिफ्ट ली होगी वे उस समय को याद करके आज तक पछता रहे होंगे, क्यों कि पिकअप वाले उसे हवाई जहाज की तरह उड़ाने का प्रयोग करने बैठ जाते हैं । ओवर स्पीड का मीटर उनके आगे पानी मांगने लगता है । मैंने तो ट्रकों में भी बहुत यात्रा की है । पल्लू क्षेत्र से चूने से भरे ट्रक जंक्शन आया करते थे , वे बस किराए से आधे में ही चढ़ा लेते थे । मैं पंजाबी ड्राइवरों के साथ बैठकर खुशमिजाजी,गहरी जिजीविषा ,अलमस्त व्यवहार,भाषा में गाली के तड़के के साथ ठरका, नये नये शब्दों का भंडार,औरत के लिये अलग ललचाया नजरिया , सजगता,होशियारी और निडरता के दर्शन करता । अनपढ़ होने के बावजूद दुनियादारी का ज्ञान उनसे ज्यादा किसे हो सकता है । वे सामने पुलिस नाका देखकर घबराते नहीं, न पीछे घूम कर वापिस मुड़ते हैं । वे डंडा घुमाते सिपाही के लिये सौ पचास का फटा पुराना नोट खलासी को पकड़ाते हुए कहते हैं 'मार साले दे सिर च ।' और मौके का अफ़सर बिना नोट देखे पेंट की जेब में ठूंस कर जल्दी आगे जाने का इशारा करता है । अकेली लेडीज सवारी उनके साथ न तब चढ़ती थी न अब चढ़ती है। गायक चमकीले के चक्कमें गीतों की कैसेट अब भी उनकी पुरानी डैक में बजती रहती है ।हेमामालिनी के पोज वाली फोटो उन्हें आज भी प्यारी लगती है । केबिन में स्लोगन लिखा मिलता है 'चल बिल्लो रानी तेरा रब राखा ।' यह वाक्य ही उनकी अलमस्ती का परिचायक बन जाता है । वे नींद लेते हुए भी मस्त रहते हैं कि अपनी गाड़ी को कुछ नहीं हो सकता इसका रब्ब राखा है । जंक्शन में चूना फाटक नाम तभी पड़ा था । जहां जिप्सम के पहाड़ खड़े हो जाते थे । माल गाड़ियों में भर कर उसे देश भर में भेजा जाता था । तब छह टायरों के ट्रक होते थे जो आजकल कम ही दिखते हैं । मैंने विदेश में सौ से ज्यादा टायरों वाले ट्रक भी देखे हैं, लेकिन वहां ड्राइविंग लाइसेंस लेने के लिये अपने यहां की तरह लचीलापन नहीं है कि एजेंट महोदय को निर्धारित से तिगनी फीस दे दी और मिल गया लाइसेंस ।अलवर में एक जन्म से अंधे आदमी का ड्राइविंग लाइसेंस बना देने का कारनामा काफी चर्चित रहा था । विदेश में बाकायदा ट्रेनिग लेकर परीक्षा देनी पडती है जिसमें पहली बार कोई भाग्यशाली ही पास होता है। वहां के अधिकारी मानवीय जानों की कीमत जानते हैं । अब हमारे यहां ए. सी., कम्प्यूटर व जी. पी. एस. लगे ट्रक भी चलते हैं जिनका मालिक घर बैठे स्पीड, ठहराव और लोकेशन देख लेता है । मालिक ड्राइवरों की जन्मजात चालाकियों को नजरअंदाज भी करता रहता है । उसे पता होता है रास्ते की सवारियों का हिसाब वे उसे नहीं देंगे । पुलिस इंट्री आदि का खर्च बढाकर बताएंगे । तू डाल डाल मैं पात पात का सिद्धांत वे भली भांति जानते हैं । ट्रक ड्राइवरों पर पुलिस का सरकारी सर्वे सामने आया है जबकि आम आदमी तो इसे पहले से जानता था। सर्वे कहता है कि इकतीस परसेंट ट्रक ड्राइवर शराब पीकर गाड़ी चलाते हैं । नब्बे परसेंट को गुटका और धूम्रपान की लत होती है । आधे ड्राइवर चार से छह घण्टे ही नींद लेते हैं । उनमें से बाइस प्रतिशत का बीपी खतरनाक स्तर तक बढ़ा होता है । इन्ही कारणों से लाखों लोग सड़क पर बेमौत मारे जाते हैं । ड्राइवरों पर बहुत चुटकले बने हैं जैसे वे आंखों की जांच करवाते हुए डॉक्टर से कहते हैं कि सामने से आती बस जीप आदि दिखनी चाहिए मोटरसाइकिल सवार या पैदल की कोई परवाह नहीं । हाइवे के ढाबों पर दाल फ्राई इन्हीं ड्राइवरों के कारण चल रही है । श्रीनगर से कन्याकुमारी और जोधपुर से अगरतला तक की मंजिल तय करना इन्हीं के दिल गुर्दे का सबूत है । रास्ते में डाकू और संगठित गिरोह मिलते हैं ,उनसे कैसे निबटना है ये ही जानते हैं। एक ड्राइवर साहब ने किस्सा सुनाया कि 'एक जगह का आर टी ओ बहुत परेशान करता था । गरीब चालकों की पगार तक छीन लेता । एक बार मैं उस रुट पर ट्रक लेकर जा रहा था । सिपाही ने दूर ही रोक कर कहा सामने जीप में आर टी ओ साहब बैठे हैं साथ में मेम साहिबा भी हैं वे कहीं जाते समय दिहाड़ी बनाने को रुक गये । मेम साहब के सामने जरा सलीके से पेश आना । ड्राइवर ने अपने सारे कपड़े उतार कर ट्रक में छुपा दिये और अल्फ नँगा होकर साहब की ओर चल पड़ा ।देखते ही अफ़सरनी ने मुंह छुपा लिया और साहब चिल्लाया ,अरे यह क्या कर रहा है । मैंने कहा, साहब थोड़ी दूर पीछे डाकू मिल गये थे सब कुछ लूटकर ले गये सारे कपड़े भी उतरवा कर ले गये भैंण दे यार । साहब ने अपनी सीट पर रखा तौलिया मेरी तरफ फेंक कर कहा लपेटो और भागो यहां से । मैंने कहा साहब एक रुपया भी पास नहीं, खर्चा भी दो । साहब ने दो हजार के नोट मेरी तरफ और फेंके और जल्दी दफा होने का इशारा किया । मैंने नोट उठाये और आराम से गाड़ी में आकर बैठा । जब तक वहां से निकल नहीं गया मेम साहब ने सिर नहीं उठाया । कुछ भी है ड्राइवरों की दुनिया है बड़ी रंगीन । लेकिन चलते ट्रक में आग लगने के कारण जब निकलने का मौका नहीं मिलता या भयंकर एक्सीडेंट के कारण पिचकी गाड़ी से कटर से काटकर लाश निकाली जाती है तो उसकी घरवाली का रूदन हजार कोस दूर भी सुनता है ।दुर्घटना से देर भली । हम तो यही कहेंगे "चला चला रे डलेवर गाड़ी होले होले ।"


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