कौन गटक रहा है आजादी का अमृत आज 15 अगस्त है । सब देश वासियों को इस राष्ट्रीय पर्व की शुभकामनाएं । पचास साल से बड़ों को आज भी स्कूल का वो जमाना याद होगा जब अलसुबह चार बजे स्कूल पहुंच जाते, फिर बड़े जोश के साथ गांव भर में गुरुजनों के मार्गदर्शन में प्रभात फेरी निकालते और 'आज क्या है?'- 'पन्द्रह अगस्त' ,'महात्मा गांधी' - 'अमर रहे' ,'चाचा नेहरू'- 'जिन्दावाद' के नारे लगा लगा कर गला बिठा लेते थे । मारे खुशी के पूरी रात नींद न आती थी। सुबह स्कूल में ग्रामवासी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने पहुंचते । बच्चों को इनाम और लड्डू मिलते । बाद में टीवी आया जोश ठंडा पड़ने लगा । घर के पास स्कूल होने के बावजूद लोग घर में बैठे रहते या गांव में ताश खेलते रहते । इस साल फिर वही पुराना जोश दिख रहा है । हमें अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए 75 वर्ष हो गए । इस अवसर को आजादी का अमृत महोत्सव मान कर बड़े जुनून के साथ मनाया जा रहा है । जिधर भी देखो तिरंगे ही तिरंगे नजर आ रहे हैं । महलों, कोठियों, बंगलों व गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से लेकर झोंपड़ियों तक आन, बाण और शान के साथ तिरंगा लहरा रहा है । महंगी गाड़ियों से लेकर साइकिल तक लगा है । लगता है देश वासियों में देश प्रेम हिलोरें ले रहा है । हम भारतवासी होने का गौरव पर्व मना रहे हैं । आम संगठन और राजनीतिक दल अपनी तरफ से झंडे बांट रहे हैं । सब धर्मों ,जातियों, सम्प्रदायों के लोग तिरंगा रैलियों में बढ़चढ़ कर भाग ले रहे हैं । हो भी क्यों न देश सबका है । बीच बीच में खीर में नमक की तरह कोई वीडियो आ जाता है जब गरीब तबके की औरतें बताती हैं कि राशन डिपो वाला हमें जबरदस्ती बीस रुपये का तिरंगा बेच रहा है जो पैसा नहीं दे रहा उसका राशन काट लेता है ।डिपो होल्डर साहब से दरयाफ्त किया गया तो उसने बताया ऊपर से मिले मौखिक आदेशों के कारण ऐसा किया जा रहा है । ये ऊपर से इशारे कर के देशभगति की भावना में भी मुनाफाखोरी की कुंडी लगाने वाले जयचंदों के कारण बाहर से आने वाले यहां कब्जा जमा लेते थे । कई वास्तविक गरीब मुफ्त झंडा बाटनेवालों से स्वभाविक सवाल करने लगते हैं कि झंडा लगाने का बहुत मन है साहब, लेकिन घर नहीं है । अपने घर का सपना लेकर हमारे पुरखे चले गए । लगता है हम भी चले जायेंगे । झन्डा कहां लगाएं ? तब उन्हें यही सुनने को मिलता है तुम्हारे पुरखों ने आजादी संग्राम में भाग लिया था क्या ? जिन्होंने लिया था उनमें से जो समझदार थे वे पदों पर काबिज हो गए । कुछ असली स्वतंत्रता सेनानी वाली कुछ सौ रुपयों की पेंशन पाकर घर बैठकर पोतों नातियों को जेलों के क्रूर किस्से सुनाते रहे । कुछ के हाथ देश की बागडोर लगी । जिनके भगतसिंह जैसे लाल फांसी के फंदे पर झूले वे सत्ता की मलाई से दूर रहे । जिनके कपड़े तब पेरिस से धुलकर आते थे आज भी उनके वारिसों के पास कई शहरों में इतनी बड़ी बड़ी इमारतें हैं कि एक भवन का किराया ही दो दो करोड़ रुपये माहवार आ रहा है। और तुम पिचत्तर साल गुजर जाने के बाद भी अपना झोंपड़ा नहीं खड़ा कर सके तो किसका कसूर है ? हम से भी बाद में कई देश अंग्रेजों के चंगुल से निकले हैं वे हर मामले में हम से आगे हैं । सिंगापुर 1965 में आजाद हुआ हमारी तरह वहां भी अंग्रेज विभाजन की चाल चल गये । जाते जाते मलेशिया को सिंगापुर से अलग कर गये । वे दोनों देश समझदार हैं ।आपस में लड़ते नहीं । एक दूसरे के यहां आतंकवादी व घुसपैठिये नहीं भेजते । सीमा पर तनाव नहीं रहता ।गोलीबारी नहीं होती । सीमा विवाद का झंझट नहीं । भारत पाकिस्तान अन्य मदों से काट कर जितना रक्षा बजट पारित करते हैं वे देश उतना पैसा विकास पर लगाते हैं ।अपने मूल निवासियों के खातों में सरकार हर साल बचत का पैसा डालती है जो लाखों में होता है।हमारे यहां जन्म लेने वाले हर बच्चे के सिर हजारों का कर्ज विरासत में होता है। हम व्याज उतारने के लिये लोन लेते हैं। वहां देश का पैसा खा कर कोई भागता नहीं । घर विहीन कोई है नहीं ।धार्मिक स्थानों पर भी राष्ट्रीय ध्वज फहरा रहता है ।धार्मिक आडम्बरों का कोई स्थान नहीं । साम्प्रदायिक दंगे वे जानते ही नहीं । दोनों देशों के बीच में समुंदर है । सिंगापुर एक द्वीप है । व्यापार व आवागमन के लिये समुंदर पर पुल बना लिया । मलेशिया के हजारों लोग नौकरी करने सिंगापुर अपनी गाड़ी या बसों से आते हैं, शाम को लौट जाते हैं । दोनों देशों की करंसी की कीमत हमसे बीस तीस गुना अधिक है । वहां लाखों भारतीय रहते हैं । वे विकसित देशों में शामिल हो गए हम आज भी विकासशील कहलाते हैं । हममें से बहुतेरों को तिरंगे से भी नफरत है उसे जलाते फाड़ते हैं । बाकि वार त्योंहार हम देश भगति के रेकार्ड खूब बजाते हैं । तिरंगों से देश अटा पड़ा है । देश की एकता दिखाने के लिये हमने कोरोना में बजा बजा कर थालियां फोड़ दी थीं ।


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