तूड़ी की जैड सुरक्षा जाते सीजन नरमे का आश्चर्यजनक भाव फिर सरसों की बम्पर पैदावार,इस बार भगवान ने कनक निकालने के लिये कई सालों बाद सहानुभूति पूर्वक अतिरिक्त समय दिया । अगर फिर भी किसी आलसी किसान के कनक खड़ी थी अंत अप्रैल तक उसे थोड़ा बहुत खड़का बड़का करके डराया और कहा चेत जा और खेत जा । इन हालातों को देखकर कोई नहीं कह सकता कि खेती अब घाटे का काम है ।अगर फिर भी कमी लगती है तो भादरा तहसील के किसी भी किसान से "खुल जा सिम सिम" का कोडवर्ड पूछा जा सकता है अर्थात फसल बीमा योजना की जानकारी ली जा सकती है । प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पूरे देश के किसानों के लिये है लेकिन पूरे देश में सर्वाधिक अरबों रुपये एक ही तहसील भादरा के किसानों के खातों में आये हैं । जिस रेतीले खेत में आज तक दो सेर दाने नहीं हुए उसका भी लाखों रुपये मुआवजा ले रहे हैं । जीवन स्तर सुधर गया । नोहर और भादरा को आम तौर पर बारानी माना जाता है जबकि इस योजना ने यहां के किसानों की किस्मत बदल दी । अन्य तहसीलों के किसान अभी भी किसान क्रेडिट कार्ड ,के सी सी और अन्य कर्जे लेने के लिये बैंकों की लाइनों में लगते हैं । इसके लिये जनप्रतिनिधि जागरूक होने चाहिये। बैंक या कंपनी जरा सी देर कर दे तो वहां के नेता के एक बुलावे पर दस बीस हजार किसान बैंक के आगे इकट्ठे होने में देर नहीं लगाते । भादरा विधायक हरियाणा में जाकर तूड़ी पर लगी रोक हटाने के लिये सिरसा के कलेक्टर को खरी खरी सुना आया । कह दिया हरियाणा से बाहर तूड़ी जाने पर जो रोक लगा रखी है उसे उठायें अन्यथा यहां धरना लगाया जायेगा । अगर ऐसा होता है तो यह अभूतपूर्व बात होगी । पर अगला कामरेड है । दूसरे स्टेट की मनमर्जी के खिलाफ भी बोलेगा । वहां से बाहर तूड़ी ले जाने पर तीस चालीस हजार रुपये का चालान किया जा रहा है जबकि पहले वहां की तूड़ी से राजस्थान के गौधन का पेट भर रहा था और वहां के किसानों को भी आमदन हो रही थी। अब सोचने की बात है तूड़ी के भाव आसमान पर जा टँगे हैं । तूड़ी मुहावरों में हल्की चीज के रूप में जानी जाती रही है "आज मेरी तूड़ी हो गई" या "तेरी तूड़ी कर दूंगा" कहने के पीछे तुच्छता का भाव होता था । वही तूड़ी राजस्थान के कुछ जिलों में बीस रुपये किलो अभी से हो गई । जबकि तंगी का समय तो आगे आना है । तूड़ी की मारामारी हो रही है लोग सोचने लगे हैं कि पशु रखें या छोड़ दें । पहले खेती के साथ पशुपालन सहायक धंधा था ।अब घाटे का सौदा है । खल भी कह रही है हाथ न लगा ।अस्सी के दशक तक किसान तूड़ी ,बनछटी दूसरों के घरों तक छोड़कर आते थे कि इतनी का हम क्या करें। यह चीजें मोल बिकने का तो सोचा भी न था । आगामी फसल के लिये खेत तैयार करने की जल्दी होती थी । दो चार बोरे तो कभी भी सम्भाली हुई में से मांगने पर दे देते थे । सरसों का गूना जी का जंजाल रहता था कि इसे खपायें कहां ।अब ईंटभट्टों पर बेचने से आम के आम गुठलियों के भी चोखे दाम मिल रहे हैं । सामाजिक समरसता भी टूट रही है ।अब कोई टोकरा तूड़ी मांग ले तो बहाने बाजी पर उतरना पड़ता है । सारा साल सड़कों पर विशालकाय तूड़ी लोडिड ट्रालियां परिवहन करती हैं । अगर संकड़ी सड़क पर चारों तरफ भूंग निकाले कमरे का कमरा चल रहा है तो पीछे साधनों वाले कितने भी हॉर्न बजायें कोई फायदा नहीं ।सोशल मीडिया पर चर्चा छिड़ गई है कि सरकार लगभग अठाइस तीस रुपये गेहूं खरीद कर हट्टे कट्टे लोगों को दो रुपये किलो बेच सकती है तो बेजुबान पशुओं के लिये दो रुपये किलो तूड़ी नहीं दे सकती? मजे लेने वाले कह रहे हैं अगर हरियाणा तूड़ी पर बेन कर रहा है तो राजस्थान वाले वहां प्याज न भेजें ।यूपी वाले गुड़ भेजना बंद करें और बिहार वाले 'रिश्तेदारी' न करें क्योंकि चालीस साल के छड़े रूंडे खूंडे वहीं मिलते हैं ।दिल्ली वाले पराली जलाने का दमघोटू प्रदूषण न सहेंगे अब कौन जलाएगा, सब तूड़ी बनाकर बेचेंगे । अगर तूड़ी का महत्व इसी तरह बढ़ता गया तो हो सकता है चाय नमक के पॉलिथीन पैकेट्स की तरह किलो तूड़ी भी इसी तरह न बिकने लग जाये ।


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