Saturday, September 17, 2022

कुत्ता खस्सी करा लो सभी सरकारें रोनी सूरत बना कर बोलती रहतीं हैं -खजाना खाली है । जिन घाघ अफसरों के हाथ में सरकारी नकेल रहती है वे तब भी नए प्रपोजल बनाकर मंत्रियों के पास भेजते हैं । उनसे डिसकस करते हैं।नफा नुकसान समझाते हैं और फाइल पास करवाके ही लौटते हैं । बानगी के तौर पर शहरी कच्ची बस्तियों के घरों का मल जल बड़ी पाइपों द्वारा शहर से बाहर जल शोधन संयंत्र तक ले जाया जाये ,वहां पानी साफ करके सिंचाई के लिये किसानों को बेचा जाये । इससे स्वायत्तशासी संस्थाएं आत्म निर्भर होंगी । यह एक सब्जबाग था । फटाफट करोड़ों का बजट पास हुआ, ठेके छूटे, काम शुरू हुआ । गलियों को खोखली करके बड़ी बड़ी पाइपें धरती में दबाई गयीं । अभी ट्रीटमेंट संयंत्र तक पहुंची ही नहीं थीं कि किसी निरीक्षणकर्ता ने पाया कि पाइपों का लेबल सही नहीं है । शहर सड़ जाएंगे । नागरिक मारे बदबू के भाग खड़े होंगे ।योजना ठप्प हो गयी । सब को अपना हिस्सा जरूर मिल गया होगा । करोड़ों रुपयों का माल मिट्टी में दबा पड़ा है । पाइपों पर बनी सड़क अब भी ढोल सी बजती सुनी जा सकती हैं । शायद ही किसी शहर में योजना सफल हुई हो । ऐसी और बहुत योजनाएं मिल जाएंगी, जिनसे जनहित तनिक भी नहीं हुआ बजट ठिकाने लग गया । कितनी हास्यस्पद योजना है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिये नसबन्दी करवाने वाले को अनुग्रह राशि दी जाये । लेकिन बच्चा पैदा करने पर उससे ज्यादा रुपये दिये जाते हैं । इतना अंक गणित तो अपने यहां के लोग जानते ही हैं कि घाटा क्यों उठायें । नसबन्दी की बजाय जन्मदर बढ़ाये रखना ही फायदेमंद है । नसबन्दी से याद आया इन दिनों कुत्तों की नसबन्दी चर्चे बटोर रही है । दशकों पहले कभी कुत्ते मारने का अभियान चला था । आवारा कुत्ते सदा ही जी का जंजाल रहे हैं । रात विरात आना जाना खतरे से खाली नहीं रहता । झुंड के झुंड बैठे गुर्राते रहते हैं । पहली रोटी गाय की आखरी कुत्ते की कहने और विश्वास रखने वाले पुण्य कमाते हुए आवारा कुत्तों को ललचाए रखते हैं । पागल कुत्ते के काटने और नाभि में इंजेक्शन लगवाने की पीड़ा जिसने सही है वह जानता है टीके का उतना दर्द नहीं होता जितना सुंडी में सुई की कल्पना डराती है ।गांवों में हड्डा रोड़ी के कुत्ते बहुत खतरनाक होते हैं । अकेला आदमी देखकर हिंसक हो जाते हैं । उनके लहू मुंह लग चुका होता है जैसे भृष्ट अफसर के रिश्वत। शहरों में मोटरसाइकिल वाले के पीछे दूर तक दौड़ते है । वाहन तेज दौड़ाया जाता है रिले रेस के धावकों की तरह आगे और तैयार मिलते हैं । देवयोग ही माना जायेगा अगर दुर्घटना न हो ।कुत्ते मारने के अभियान में जहरीला गुलाब जामुन कुत्ते के आगे डाला जाता था । खाते ही मर जाता नगर पालिका की गाड़ी उन्हें दूर ले जाकर पटक देती । फिर कोर्ट और जानवर अधिकारों के संरक्षक जागे इस तरह मारना बंद करवाया । किसी ने कुत्तों की नसबन्दी का सुझाव दे दिया ।सुझाव कारगर है । न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी । धीरे धीरे कुत्ते कम हो जाएंगे ।नागालैंड की तरफ कुत्ते और बिल्लियां देखने को कम ही मिलती हैं वहां के लोग इन्हें मारकर खाते हैं ।वे कभी इधर आएं तो इतने कुत्ते देखकर 'हाबड़के' से खुद मर जायें । वैसे जनसंख्या नियंत्रण के लिये नसबन्दी पर जो काम हुआ उससे तो स्थिति काबू में आ जानी चाहिये थी । अफसोस हम देखते ही देखते एक सौ पैंतीस करोड़ से ज्यादा हो गये । जबकि इस काम के लिये जबरदस्ती भी कर ली और लालच भी दे लिये । कुत्तों पर काम चालू हुआ ही है भृष्टाचार की बदबू फैल भी गयी । सुना है गंगानगर में यह ठेका लाखों का है। ठेकेदार के कारिंदे घपलेबाजी पर उतर भी आये। वे कुत्ते पकड़ कर भी ले गये और वापिस पुरानी आबादी के पंचमुखी मंदिर के पास बाईज्जत वैसे के वैसे छोड़ भी गये । किसी अनुभवी पारखू को पता चल गया कि नसबन्दी नहीं हुई । शिकायत हुई । बयान दिये गये। ठेकेदार से पूछताछ होगी । अनुभव कहता है जांच रिपोर्ट में लिख दिया जायेगा उन कुत्तों की उम्र और वजन थोड़ा था इसलिये बंध्याकरण नहीं किया ।घपलेबाजी के आरोप निराधार हैं । आवारा कुत्ते इलाका बदलते रहते हैं । कौन रोज उन्हें पकड़ कर पेश करेगा । सभापति के मेज पर लिटा कर दिखायेगा भ्र्ष्टाचार आदि जुगादि है । यह फाइलों से शुरू होकर फाइलों में छुप जाता है । अगर इस योजना में पारदर्शिता रखी जाये, पूरी मॉनिटरिंग हो, समुदाय से भी निगरानी करवाई जाये तो यह समाज हित में बड़ा काम होगा । कमीशनखोर अफसर या बाबू भी कभी सुबह की सैर को निकलते होंगे किसी दिन उनकी पैंट फाड़ दी उस दिन लगेगा ईमानदारी से यह काम किया होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता । हो सकता है सुंडी में टीके लगवाने तक नौबत आ जाये । साधो ! जब तक दबंगों के आगे पूंछ हिलाने और कमजोर पर गुर्राने वाली दफ्तरी पीढी की नसबंदी नहीं होगी यह कुत्तेखाणी यूं ही चलती रहेगी ।

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