Saturday, September 17, 2022

लाउडस्पीकर हाजिर होलगता है जल्दी ही धार्मिक स्थलों पर बोलते लाउड स्पीकरों की बोलती बंद होने वाली है ।सरकार के हाथ उनके गले तक पहुंच गए हैं । यूपी ,दिल्ली और महाराष्ट्र में स्थानीय स्तर पर प्रशासन इन्हें उतारने भी लगा है ।साम्प्रदायिक दंगों का ठीकरा इन्हीं लाउडस्पीकरों के सिर फोड़ा जा रहा है ।लगातार दंगों के बाद सरकारों का मानना है कि अगर ये न होते तो इतने बलवाई इकट्ठे न होते और आगजनी व फसाद को हवा न मिलती । जब एक आस्था केंद्र से धार्मिक उद्यघोष होता है उसके प्रतिउत्तर में दूसरे धार्मिक स्थल से दुगने जोश के साथ अपना धार्मिक नारा बुलंद किया जाता है इसी को खुद के धर्म पर हमला मानने से उन्माद फैलता है । यह विरोध की आवाज इन स्पीकरों की सवारी करके ही दूसरे समुदाय तक पहुंचती है। लगता है धर्मों की मुठभेड़ हो रही है । इस लिये चोर की मां यही लाउडस्पीकर हैं पहले इन्हें उतारा जाये । सरकारों की खुद की नाकामी इन दंगों को रोकने में किस हद तक रहती है उस पर कभी विचार नहीं होता । नानी खसम करे दोहिता चट्टी भरे। रेल गाड़ी के आगे कूद कर कोई जान दे दे तो कसूर रेलगाड़ी का कहां होता है ? लाउडस्पीकर को माध्यम बना कर कोई शरारत करता है तो दोषी वह है ।आजादी के बाद लाउडस्पीकर हमारी आधुनिक संस्कृति का अहम हिस्सा हो गया है। उससे पहले ग्रामोफोन होता था जिसे आज की पीढी नहीं जानती । कमरे भर के लिये आवाज काफी होती थी । बिजली या बैटरी का झंझट न था । चाबी भर कर सुई लगा हाथ -यंत्र कोलतार के रिकार्ड पर रखा जाता था और साथ ही जुड़े पीतल के धत्तू से मधुर आवाज गूंजती । यह अमीर और शौकीन लोगों का प्रिय होता था । मेड इन इंगलैंड इस यंत्र को रखने वाले को गांव के लोग इज्जत की दृष्टि से न देखते थे । वह अपने जमाने का परिष्कृत म्यूजिक सिस्टम था। बाद में आये बड़ी बैटरी से चलने वाले बड़े और जोरदार आवाज वाले जिन्हें लाउडस्पीकर कहा जाता है । धार्मिक और मांगलिक कार्यक्रमों में इनकी उपस्थिति अनिवार्य हुई है। पंजाबी विवाहों में छत पर चारपाइयाँ खड़ी करके बांधा जाता और पहला गीत यमला जट्ट का 'सतगुर नानक तेरी लीला न्यारी' गूंजता तो पड़ोस के गांव वाले भी सुनने के लिये दौड़े आते । गुरुद्वारों में गुरबाणी का पाठ,मंदिरों से चौपाइयों,गायत्री मंत्र व हनुमान चालीसा का जाप और मस्जिदों से अजान व तिलावते पाक सुनने को मिलती रही है। अजान में कहा जाता है 'हय्या अल फला'अर्थात अंधेरे से रोशनी की ओर आओ । यह सनातन धर्म के श्लोक 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' से अलग कहां है ? यही स्पीकर अनाउंसमेंट के साधन भी बने।किसी की बकरी गुम हो जाती तो गुरुद्वारे के स्पीकर से 'बेनती 'की जाती । सांझा खाला साफ करना,किसी के कोई मर गया तो अंत्येष्ठि की सूचना, विवाह में दूध पहुंचाने का आग्रह इसी स्पीकर के माध्यम से होता रहा है । पोलियो की दवाई पिलाने और पटवारी साहब के गांव में पधारने की सरकारी घोषणा यही स्पीकर करता रहा है ।अब इसका रूप बदला है । अब यह डी जे हो गया । जो कान फोड़ू आवाज करता है । नई पीढ़ी इसी की दीवानी है । बारात लड़की वालों के घर कितनी लेट पहुंच पायेगी डी जे पर निर्भर करता है । जो लड़का कभी बाथ रूम में भी नहीं नाचा होता वो डी जे की धुन पर नागिन सा नाचता है। नए गीतों गानों और डांस की जान इसी स्पीकर में बसी होती है । गीत संगीत का अरबों रुपयों का बिजनेस इसी पर अभिलम्बित है ।अफसोस इसी स्पीकर को धार्मिक कटुता का जनक मान लिया उसे छुट्टी पर भेजने की तैयारी की जा रही है ।जिस गंगा जमुनी सभ्यता का हम हिंदुस्तानी दुनिया के सामने दम भरते और गर्व करते रहे हैं वही गंगा और जमुना देश के कई हिस्सों में सौतियाडाह से भयंकर रूप से ग्रस्त हैं । अपने अपने धार्मिक झंडे उठा रखे हैं । तलवारें खींच ली हैं । महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से कहा है जब अजान होगी तो मस्जिदों के बाहर दुगनी आवाज में हनुमान चालीसा बजाया जायेगा । बताइये यहां कसूर स्पीकरों का है या छिछली राजनीति का । सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद वहां की सरकार बैमनस्य फैलाने के एक्ट में उन पर कार्यवाही नहीं कर रही । आखिर विचारधारा अलग होने के बावजूद राज और उद्धव ठाकरे हैं तो चचेरे भाई ही । जिस राजस्थान में बंटवारे के समय एक भी लाश नहीं बिछाई गई वहां करोली में और अब अपनी मस्ती में मस्त रहने वाले शहर जोधपुर में दो समुदायों के आमने सामने होने की नौबत आ गयी ।पत्थर बरसे ,लाठीचार्ज हुआ । पंजाब में हिन्दू सिख सांझ को ललकारा गया । पटियाला में जो कुछ हुआ वह भविष्य में घातक नासूर न बन जाये। दिल्ली यूपी में धार्मिक यात्रा निकालना खतरे का काम हो गया । आम शहरी डरने लगा है क्या पता कब पत्थर बरसने शुरू हो जायें । गोली न चल जाये। पुलिस वाले लाठीचार्ज के समय दोषी व निर्दोष को धक्के चढ़ने पर एक नजर से ही देखते हैं । उन्होंने मार मार कर कानून व्यवस्था लागू व शांति बहाली करनी होती है । लेकिन मजे की बात यह है कि दंगे के बाद परिस्थितियां बिगड़ने पर कर्फ्यू लगाने की सूचना क्या कानों कान दी जाएगी उसके लिये लाउडस्पीकर ही काम में लिया जायेगा। चुनावों में नेता गला फाड़ सार्वजनिक सभाएं करने के लिये स्पीकर में नहीं बोलेंगे का ? वोट लेने के लिये हिन्दू मुस्लिम भाई भाई बोल सकते हैं तो बाद में दूसरे सम्प्रदाय के लोगों से बू क्यों आने लगती है । उनके तीज त्योंहारों के समय वे शत्रु क्यों दिखने लगते हैं । उनके त्योंहार पर उनके वहां जाकर लाउडस्पीकर पर नाच गाना करें 'जिंदगी चार दिनां दी 'और माहौल खुशनुमा बना दें ।

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