रुत आई रे पपीहा स्कूलों में तालाबंदी की जुलाई माह कहने को तो वर्ष के दूसरे हाफ का शुरुआती महीना होता है लेकिन होता बड़ा खास है । इसी महीने में वन विभाग की सक्रियता बढ़ जाती है, हर कार्मिक के चेहरे पर गुलाब के फूल सी लाली आ जाती है जंगलात महकमा बरसातें इसी महीने से शुरू होना मानता है और अपने कस्सी फावड़े सम्भालता है। नया बजट आता है ,नये पौधे लगाये जाते हैं लकड़ी बहुत कम रह गयी उसकी क्या कीमत है इस महकमे के अफसरों से ज्यादा कौन जानता है । बिहार बंगाल में इन्हीं दिनों नदियों में बाढ़ आती है । लोग बेघर हो जाते हैं। अफसर इस विपदा के समय प्रभावितों को बांटी जाने वाली राहत को रबी व खरीफ के बाद तीसरी फसल मानते हैं जो केवल अफसरों और नेताओं के हिस्से आती है । जुलाई में ही स्कूल खुलते हैं,खुलते ही सरकारी स्कूलों में तालाबंदी होने लगती है।एक तो स्टाफ को नया सत्र जमाने ,साफ सफाई ,प्रवेश की जल्दी और विभाग द्वारा छुट्टियों में मांगी गई बेसिर पैर की वे सूचनाएं जो पता नहीं कितनी बार पहले भेजी जा चुकी हैं , भेजने की उतावली होती है ऊपर से ताला बंदी वाले ताला और झंडा लेकर आ धमकते हैं, वे स्टाफ को ऐसे लगते हैं जैसे बीमार भैंस को झोटा तंग कर रहा हो । उन्हीं के बीच भंवरा टाइप शोहदों की पैदावार बढ़ जाती है । वे भी दो महीनों से बेरोजगार हुए बैठे होते हैं । शिक्षकगण एक दूसरे के हालचाल भी ढंग से नहीं पूछ पाते। मैडमें सूट साड़ियों की बात आधी अधूरी ही कर पाती हैं । कहां घूमकर आये यह भी बताना होता है, घूमे चाहे पीलीबंगा हों गोवा बताने पर किसी को क्या दिक्कत है ? दिक्कत मिटाने आते हैं तालाबंदी वाले आंदोलनकारी जो स्टाफ पूरा करवाने के लिये तालाबंदी करते हैं । जुलाई में कोई ताला खरीदने पहुंचता है तो दुकानदार एक बार ध्यान से देख कर पूछता है ताला घर के लिये चाहिए या स्कूल के लगाना है । जिनके बच्चे पढ़ते हैं वे हाय तौबा करें तो ठीक लेकिन कॉलेजों के छोरे जो अन्य गांवों से आते हैं उनके भाई बहिन या रिश्तेदार बच्चे भी यहां नहीं पढ़ते वे भी तपे तंदूर पर रोटी सेंकते हैं भावी नेता जो बनना है ।बच्चों को बाहर ही रोककर बैठा लिया जाता है । स्टाफ को कुछ नहीं कहा जाता वे पिछली मोरी से भीतर जाते हैं ।उच्चाधिकारियों को हालात गम्भीर होने की बढ़ाचढ़ा कर सूचना दी जाती है ।धरनार्थी पत्रकारों के सामने कलेक्टर से कम अधिकारी से वार्ता नहीं करने का अहद दोहराते हैं, कल बढ़िया सी खबर फोटो समेत लगाने की मिन्नत की जाती है।अधिकारी अगर एबीईओ भी आ गया ज्ञापन दिया जायेगा ।दो चार दिन से ज्यादा धरना चलता नहीं किसी अध्यापक को डेपुटेशन पर लगा दिया जाता है विजय जलूस भी निकलता है महीने बाद डेपुट टीचर मूल स्थान पर आ जाता है । किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता ।रोज रोज धरनार्थी भी कहां मिलते हैं ।अध्यापकों को परेशान करने वालों के तरीके गजब होते हैं झारखंड के गांव गढ़वा के लोग एक दिन स्कूल पहुंच कर बोले हम मुस्लिमों की आबादी गांव में पिचहत्तर परसेंट है स्कूल अब शरीयत कानून से चलेगा ।और ये भारत माता की जय या दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना वाली प्रार्थना अब नहीं चलेगी अब आप तुम्हीं राम हो तुम्हीं रहीम हो किस्म की प्रार्थना शुरू करो और बच्चे हाथ भी नहीं बांधेंगे अन्यथा तालाबंदी होगी । कई शिक्षण संस्थाएं खुद तालाबंदी की करतूत करती हैं एक दिल दहला देने वाला वीडियो वायरल है जिसमें अध्यापक छह साल के मासूम को डंडे से बेरहमी से पीटता है ।यह वीडियो मसौढी के धनरूआ थाने के महादेव नामक स्थान का है जहां जया क्लासेज की कोचिंग क्लास में बच्चे पर कहर टूटा और वह मानसिक संतुलन खो बैठा । बताया जाता है बच्चे ने राक्षस अध्यापक को एक लड़की के साथ गलत हरकत करते देख लिया था । तो इस तरह जुलाई माह ज्यादातर स्कूलों का तालाबंदी पर्व हो जाता है । स्टाफ पूरा करना या अन्य सुविधाओं को उपलब्ध करवाना न अध्यापकों के हाथ है न बच्चों के । नेता जो वोट मांगने आते हैं उनके दर पर यह अलख जगाई जाये तो फायदा हो सकता है नहीं तो रेत में घी ढोलने का कोई मतलब नहीं ।


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