Saturday, September 17, 2022

सत्रह अठारह साल गो बोछरड़ो छोरो ।ना घणों काळो, ना घणों गोरो ।जवानी गो जोर, होवै बड़ो दोरो ।दुनियादारी सयूं सफा कोरो।बांगी भींत मैं मोरो ।मोरै गै पार खाली नोरो ।दूर गे घर आलां गी छोरी।गन्ने गी पोरी।दूध गी कटोरी।रेशम गी डोरी।चांद या चकोरी।छोरे गो दिल हो ग्यो चोरी।रोज बा छोरी बाडै. मैं आंवती।सिर पर पोटां गो बठल ल्यावंती ।छोटी छोटी थेपड़ीयां बनांवती ।सुकी सुकी सागै ले जांवती।तीन चार गड़का लगांवती।छोरै गी मति मारी जांवती ।छोरो बीनै मोरै माखर तकांवतो।सपना गो संसार सजावंतो।मन गा लाडू पकांवतो।छोरी सागै व्याह रचांवतो।टाबरां गो डैडी बन जांवतो।वन वे ट्रैफिक चलांवतो।छोरी गे घर आळा जुल्म कमा दिया।सपना नै एडे लगा दिया ।लाडुआँ पर रेत बुरका दिया।फूलां पर टैंक चढ़ा दिया।नहाये धोये पर कूटला गिरा दिया ।दुष्टां भैंस तो बेची जकी बेची ,बाड़े मैं दादै गा कोठा चिणा दिया ।रूप सिंह राजपुरीरावतसर

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