सत्रह अठारह साल गो बोछरड़ो छोरो ।ना घणों काळो, ना घणों गोरो ।जवानी गो जोर, होवै बड़ो दोरो ।दुनियादारी सयूं सफा कोरो।बांगी भींत मैं मोरो ।मोरै गै पार खाली नोरो ।दूर गे घर आलां गी छोरी।गन्ने गी पोरी।दूध गी कटोरी।रेशम गी डोरी।चांद या चकोरी।छोरे गो दिल हो ग्यो चोरी।रोज बा छोरी बाडै. मैं आंवती।सिर पर पोटां गो बठल ल्यावंती ।छोटी छोटी थेपड़ीयां बनांवती ।सुकी सुकी सागै ले जांवती।तीन चार गड़का लगांवती।छोरै गी मति मारी जांवती ।छोरो बीनै मोरै माखर तकांवतो।सपना गो संसार सजावंतो।मन गा लाडू पकांवतो।छोरी सागै व्याह रचांवतो।टाबरां गो डैडी बन जांवतो।वन वे ट्रैफिक चलांवतो।छोरी गे घर आळा जुल्म कमा दिया।सपना नै एडे लगा दिया ।लाडुआँ पर रेत बुरका दिया।फूलां पर टैंक चढ़ा दिया।नहाये धोये पर कूटला गिरा दिया ।दुष्टां भैंस तो बेची जकी बेची ,बाड़े मैं दादै गा कोठा चिणा दिया ।रूप सिंह राजपुरीरावतसर
एक दिन का शिक्षक सम्मानशिक्षक वो चिराग है जो खुद जल कर दूसरों को रोशनी देता है । उसके सम्मान के लिये समाज ने सिर्फ एक दिन पांच सितंबर निश्चित कर रखा है । उस दिन सरकार व विभिन्न संगठन उनमें से कुछ को प्रशंसा पत्र देते हैं । शाल कंधे पर रखकर फोटो खिंचाते हैं । पुराने चेले फेसबुक पर गुरूजी की फोटो लगाकर शाब्दिक सम्मान बिखेरते हुए सार्वजनिक करते हैं । अब तो नियति यह हो गयी है कि जिस दिन उसका अपमान न किया जाये उस दिन को वह सम्मान दिवस समझता है । तहसील से आया अदना अधिकारी भी उसे उसकी कुर्सी से खड़ा करके खुद बैठते समय अपने गुरुओं को याद नहीं रखता जिनकी बदौलत वह आज इस पद पर बैठा है । पहले जगत गुरु कहकर समाज शिक्षक की पूजा करता था । विभाग के अधिकारी ही नहीं मंत्री भी स्कूल में आने के बाद संस्था प्रधान की कुर्सी पर नहीं बैठते थे बल्कि उनके चरण स्पर्श करते थे। कुछ संस्था प्रधानों का भी मानखा मरा होता है वे डी ओ दफ्तर से आने वाले बाबू या हारे विधायक के लिये भी खड़े हो जाते हैं । कुर्सी छोड़ते हैं । एक जगह तहसीलदार व प्रिंसिपल के बीच कुर्सी छोड़ने के लिये द्वंद्व युद्ध हो गया था ।किसी प्रोटोकॉल में नहीं लिखा कि प्रिंसिपल आने वाले के लिये कुर्सी छोड़ेगा जैसे हरी स्याही केवल गजटेड अफसर ही इस्तेमाल कर सकता है की किवदन्ती चल रही है । कोई फालतू का काम जैसे कुत्ते बिल्ली की गिनती या सुबह खुले में शौच जाने वालों को रोकने की ड्यूटी लगानी हो तो तहसील का सहायक कर्मचारी भी शोर मचाकर कहने लगता है मास्टर है ना । सरकार ने भी उसके मूल काम पढ़ाना को दरकिनार कर रखा है और दुनिया भर के ऊल जलूल काम ओढ़ा दिये उस पर रिजल्ट भी उत्कृष्ट चाहिये । निर्धारित मानदंड से कम रहने पर सोलह सत्रह सी सी की तलवार सिर पर लटकती है ।पोषाहार की व्यवस्था अध्यापकों के गले डालने से सारा गुड़ गोबर हो गया । स्टाफ का सारा दिन इसी काम में निकल जाता है ।वे लसन छीलते रह जाते हैं मंत्री मलाई चाटते हैं । इन दिनों राज्य में सम्बंधित मंत्री पर जांच शुरू हो गयी है कि करोना काल में विद्यार्थियों के घर पहुचाने वाले राशन में कुंडी लगाई गयी । अपनी ही फेक्ट्री में पैकेजिंग करते समय कम व घटिया स्तर का सामान भेजा गया । अगर यह सत्य साबित हुआ तो डूब मरने वाली बात होगी ।गरीब घरों के बच्चे ही पोषाहार के लालच में सरकारी स्कूलों में आते हैं उन्हीं के राशन में घपला होना शर्मनाक बात है । वैसे सरकार की इतनी उदारता भी सवाल खड़े करती है कि जब स्कूल लग नहीं रहे । कोई घरों से बाहर निकल नहीं रहा तो घर पर राशन पहुचाने की जल्दी क्या थी । ग्रीष्मावकाश में तो देते नहीं । सब तामझाम फ्राड की तरफ उंगली उठाता है । शिक्षक का सम्मान सरकार की नजरों में कैसा है राज्य के पिछले शिक्षा मंत्री ने अपने घर पहुंचे शिक्षक संघ पदाधिकारियों के साथ जो सलूक किया था उससे सिद्ध हो गया । उस व्यवहार को कोई भी शिक्षक ताउम्र नहीं भूलेगा और वह मंत्री भविष्य में जहां से भी चुनावों में खड़ा होगा वहां उसे एहसास कराने में अपने स्तर पर कोई कोर कसर न छोड़ेगा । उस दिन वहां दो सौ लोग घूम रहे थे वे बुरे नहीं लगे क्योंकि वे तो कार्यकर्ता थे । बस पांच राष्ट्र निर्माता अध्यापक ही नहीं सुहाये । उन्हें कमरे में धकेल कर धमकाते और खुद ही वीडियो बनवाते समय सत्ता का गुरूर चरम सीमा पर था । वहीं वो जुमला दोहराया था मेरे घर को नाथी का बाड़ा समझ रखा है क्या? इन अपमानजनक हालातों के बीच कोई खबर रेगिस्तान में भटकते मुसाफिर को शीतल जल से भरी मटकी की तरह मिल जाती है । बांसबाड़ा के विज्ञान अध्यापक का तबादला जब बामणवास दौसा में हो जाता है तो चालीस छात्र टी सी कटवा कर गुरू जी के साथ ही नये स्कूल में आकर प्रवेश ले लेते हैं । बच्चे उनके पढ़ाने की विधियों के इतने कायल हैं कि उनसे दूर नहीं रहना चाहते । चुरू जिले के आबड़सर गांव के सरकारी सीनियर स्कूल में बोलांवाली तहसील सँगरिया का निवासी युवा विजय सिंह ज्याणी पी टी आई है । वह कितना अच्छा काम कर रहा होगा तभी तो उसे एक साल की सरकारी कोचिंग हेतु बेंगलुरु भेजा जा रहा है । उसे एक साल के लिये दी जा रही विदाई के समय का वीडियो आंखों में आंसू ला देता है वहीं हर शिक्षक की छाती गर्व से ऊंची उठ जाती है कि कोई करे ना करे कर्तव्यनिष्ठ अध्यापक का सम्मान शिष्य तो करते हैं ।
राजस्थानी भाषा को समर्पित एक सरदार :रूपसिंह राजपुरीरूपसिंह राजपुरी इस अंचल में ही नहीं देशभर में राजस्थानी भाषा के एकमात्र सिख कवि हैं जो विदेश में भी कवि सम्मेलनों के दौरान राजस्थानी का परचम फैलाते हैं ।अब तक सिंगापुर,मलेशिया हांगकांग,थाईलैंड दुबई,शारजाह व आबूधाबी सहित अरब अमीरात के सभी राज्यों सहित ग्यारह देशों की यात्रा कर चुके है ।वे बताते हैं विदेशों में रह रहे राजस्थानी अपनी मातृभाषा के लिये तरसते हैं जब कोई कवि उनकी भाषा में काव्यपाठ करता है तो वे दूर दूर से उसे सुनने पहुंचते हैं ।चालीस वर्ष की सरकारी सेवा से सेवानिवृत होकर रावतसर में रहकर साहित्य साधना कर रहे हैं । अखबारों में व्यंग्य लेखों के कॉलम सहित देश भर की साहित्य पत्रिकाओं में छप रहे हैं ।कविता हास्य में व कहानी मार्मिक अंदाज में लिखकर बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दे रहे हैं ।अब तक हिंदी ,राजस्थानी व पंजाबी भाषा में विभिन्न विधाओं की बीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन राजस्थानी हास्य व्यंग्य कवि के रूप में विशेष पहचान बनी है । टीवी के विभिन्न चैनलों व आकाशवाणी से भी काव्यपाठ करते हैं ।कुछ विडिओज में ख्याली सहारण के साथ अभिनय भी सराहनीय रहा है ।स्काउटिंग गाइडिंग आंदोलन के साथ गहरे तक जुड़े हैं अब भी स्काउट शिविरों में वर्दी पहनकर सेवाएं देते हैं ।ख़ुद ने इस विषय में उच्चतम योग्यता हिमालय बुड वैज हासिल किया है ।रोटरी क्लब ,भारत विकास परिषद सहित अनेक समाजसेवी संस्थाओं से जुड़ाव है ।रावतसर में स्थित वर्द्धाश्रम के संचालक मंडल में रहते हुए समाज के तिरस्कृत व्यक्तियों की सेवा करते हैं ।सेवा निवृत्ति के बाद भी विभिन्न सरकारी विधालयों की प्रबन्ध समिति में विधायक कोटे से सदस्य रहते हुए अपने अनुभवों का फायदा शिक्षा क्षेत्र में दे रहे हैं ।जिला शांति समिति व पुलिस की सी एल जी का सदस्य होने के कारण कानून व्यवस्था के सम्बन्ध में दिए सुझावों को जिला प्रशासन भी ध्यान से सुनता है । साहित्यिक योग्यता के कारण जिला प्रशासन द्वारा प्रकाशित किये जा रहे जिला गजेटियर के सम्पादक मंडल में रूपसिंह राजपुरी को स्थान दिया है और उनकी अनेक रचनाएं उसमें सम्मलित की गई हैं । रावतसर में शहीद स्मारक समिति के अध्यक्ष हैं और शहीद भगत सिंह की विशाल आदमकद मूर्ति नगर के ह्रदय स्थल पर लगवाने में इनकी विशेष भूमिका रही ।हर वर्ष तेईस मार्च को वहां विशाल मेला लगता है और तिरंगा यात्रा निकलती है । 15 अगस्त 1954 को संगरिया तहसील के गांव मोरजंड सिक्खान में जन्में रुपसिंह राजपुरी का बाल्यकाल घोर अभावों में बीता ।अपनी मेहनत के बलबूते समाज में सम्मानजनक स्थान बनाया और काव्य पाठ हेतु राजघरानों से आमंत्रण भी मिले ।
हर इच्छा मेरी सपना बनके, रही अधूरी बाला जी ।इच्छा पूर्ण नाम तिहारो कर दो पूरी बाला जी ।भक्तों के तुम रक्षक बनकर सदा सहाई होते हो ।सच्चे की तुम बांह पकड़ते पाप की नाव डुबोते हो।संकट मोचक बन कर आओ क्या मजबूरी बाला जी------हर इच्छा मेरीतुम तो सब के मन की जानों तुम से बात छुपाएं क्या ।तेरे दर को छोड़ पवनसुत और के दर पे जाएं क्या ।अपनी शरण में ले लो हमको अब क्यों दूरी बाला जी ----हर इच्छा मेरीमन का पंछी भटकन में है उसे सहारा मिल जाये ।उजड़ा चमन उम्मीदों का है, अब यह बगिया खिल जाये।आस अधूरी, प्यास अधूरी, मिले सबूरी बाला जी____हर इच्छा मेरीतेरे होते एक बेचारा, कितने दुखड़े सहता है।रावतसर में राजपुरी तेरा भगत निराला रहता है ।तन मन उसका फीका पड़ गया, करो सिंधुरी बाला जी ।।।।।।।।।16-4-2022
बेटीबेटी भेजी राम ने, बेटी है वरदान ।बेटी पगड़ी बाप री,मूछां रो अभिमान।बेटी खेलै आंगणै,मुलकै कुल परिवार।बेटी बूंटो खुसी रो,बेटी तीज तियोंहार ।बेटी कम ना पूत सयूँ,रोशन करती नाम।बेटी जो ना कर सके ,ऐड़ो कुनसो काम ।बेटी सुख रा धाम है ,बरकत रो भंडार।मत मारो रै कोख मैं, रुसै लो करतार ।। -----रूप सिंह राजपुरी
कौन गटक रहा है आजादी का अमृत आज 15 अगस्त है । सब देश वासियों को इस राष्ट्रीय पर्व की शुभकामनाएं । पचास साल से बड़ों को आज भी स्कूल का वो जमाना याद होगा जब अलसुबह चार बजे स्कूल पहुंच जाते, फिर बड़े जोश के साथ गांव भर में गुरुजनों के मार्गदर्शन में प्रभात फेरी निकालते और 'आज क्या है?'- 'पन्द्रह अगस्त' ,'महात्मा गांधी' - 'अमर रहे' ,'चाचा नेहरू'- 'जिन्दावाद' के नारे लगा लगा कर गला बिठा लेते थे । मारे खुशी के पूरी रात नींद न आती थी। सुबह स्कूल में ग्रामवासी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने पहुंचते । बच्चों को इनाम और लड्डू मिलते । बाद में टीवी आया जोश ठंडा पड़ने लगा । घर के पास स्कूल होने के बावजूद लोग घर में बैठे रहते या गांव में ताश खेलते रहते । इस साल फिर वही पुराना जोश दिख रहा है । हमें अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए 75 वर्ष हो गए । इस अवसर को आजादी का अमृत महोत्सव मान कर बड़े जुनून के साथ मनाया जा रहा है । जिधर भी देखो तिरंगे ही तिरंगे नजर आ रहे हैं । महलों, कोठियों, बंगलों व गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से लेकर झोंपड़ियों तक आन, बाण और शान के साथ तिरंगा लहरा रहा है । महंगी गाड़ियों से लेकर साइकिल तक लगा है । लगता है देश वासियों में देश प्रेम हिलोरें ले रहा है । हम भारतवासी होने का गौरव पर्व मना रहे हैं । आम संगठन और राजनीतिक दल अपनी तरफ से झंडे बांट रहे हैं । सब धर्मों ,जातियों, सम्प्रदायों के लोग तिरंगा रैलियों में बढ़चढ़ कर भाग ले रहे हैं । हो भी क्यों न देश सबका है । बीच बीच में खीर में नमक की तरह कोई वीडियो आ जाता है जब गरीब तबके की औरतें बताती हैं कि राशन डिपो वाला हमें जबरदस्ती बीस रुपये का तिरंगा बेच रहा है जो पैसा नहीं दे रहा उसका राशन काट लेता है ।डिपो होल्डर साहब से दरयाफ्त किया गया तो उसने बताया ऊपर से मिले मौखिक आदेशों के कारण ऐसा किया जा रहा है । ये ऊपर से इशारे कर के देशभगति की भावना में भी मुनाफाखोरी की कुंडी लगाने वाले जयचंदों के कारण बाहर से आने वाले यहां कब्जा जमा लेते थे । कई वास्तविक गरीब मुफ्त झंडा बाटनेवालों से स्वभाविक सवाल करने लगते हैं कि झंडा लगाने का बहुत मन है साहब, लेकिन घर नहीं है । अपने घर का सपना लेकर हमारे पुरखे चले गए । लगता है हम भी चले जायेंगे । झन्डा कहां लगाएं ? तब उन्हें यही सुनने को मिलता है तुम्हारे पुरखों ने आजादी संग्राम में भाग लिया था क्या ? जिन्होंने लिया था उनमें से जो समझदार थे वे पदों पर काबिज हो गए । कुछ असली स्वतंत्रता सेनानी वाली कुछ सौ रुपयों की पेंशन पाकर घर बैठकर पोतों नातियों को जेलों के क्रूर किस्से सुनाते रहे । कुछ के हाथ देश की बागडोर लगी । जिनके भगतसिंह जैसे लाल फांसी के फंदे पर झूले वे सत्ता की मलाई से दूर रहे । जिनके कपड़े तब पेरिस से धुलकर आते थे आज भी उनके वारिसों के पास कई शहरों में इतनी बड़ी बड़ी इमारतें हैं कि एक भवन का किराया ही दो दो करोड़ रुपये माहवार आ रहा है। और तुम पिचत्तर साल गुजर जाने के बाद भी अपना झोंपड़ा नहीं खड़ा कर सके तो किसका कसूर है ? हम से भी बाद में कई देश अंग्रेजों के चंगुल से निकले हैं वे हर मामले में हम से आगे हैं । सिंगापुर 1965 में आजाद हुआ हमारी तरह वहां भी अंग्रेज विभाजन की चाल चल गये । जाते जाते मलेशिया को सिंगापुर से अलग कर गये । वे दोनों देश समझदार हैं ।आपस में लड़ते नहीं । एक दूसरे के यहां आतंकवादी व घुसपैठिये नहीं भेजते । सीमा पर तनाव नहीं रहता ।गोलीबारी नहीं होती । सीमा विवाद का झंझट नहीं । भारत पाकिस्तान अन्य मदों से काट कर जितना रक्षा बजट पारित करते हैं वे देश उतना पैसा विकास पर लगाते हैं ।अपने मूल निवासियों के खातों में सरकार हर साल बचत का पैसा डालती है जो लाखों में होता है।हमारे यहां जन्म लेने वाले हर बच्चे के सिर हजारों का कर्ज विरासत में होता है। हम व्याज उतारने के लिये लोन लेते हैं। वहां देश का पैसा खा कर कोई भागता नहीं । घर विहीन कोई है नहीं ।धार्मिक स्थानों पर भी राष्ट्रीय ध्वज फहरा रहता है ।धार्मिक आडम्बरों का कोई स्थान नहीं । साम्प्रदायिक दंगे वे जानते ही नहीं । दोनों देशों के बीच में समुंदर है । सिंगापुर एक द्वीप है । व्यापार व आवागमन के लिये समुंदर पर पुल बना लिया । मलेशिया के हजारों लोग नौकरी करने सिंगापुर अपनी गाड़ी या बसों से आते हैं, शाम को लौट जाते हैं । दोनों देशों की करंसी की कीमत हमसे बीस तीस गुना अधिक है । वहां लाखों भारतीय रहते हैं । वे विकसित देशों में शामिल हो गए हम आज भी विकासशील कहलाते हैं । हममें से बहुतेरों को तिरंगे से भी नफरत है उसे जलाते फाड़ते हैं । बाकि वार त्योंहार हम देश भगति के रेकार्ड खूब बजाते हैं । तिरंगों से देश अटा पड़ा है । देश की एकता दिखाने के लिये हमने कोरोना में बजा बजा कर थालियां फोड़ दी थीं ।
ਮੁਢ ਕਦੀਮ ਤੋਂ ਮਨੁੱਖ ਸੁੱਖ ਦੀ ਭਾਲ ਵਿਚ ਰਿਹਾ ਹੈ । ਸੱਤ ਸੁਖਾਂ ਦੀ ਗੱਲ ਸਦਾ ਤੋਂ ਚਲਦੀ ਆ ਰਹੀ ਹੈ । ਨਿਰੋਗੀ ਕਾਇਆ ,ਜੇਬ ਚ ਮਾਇਆ ,ਸੁਲੱਖਣੀ ਨਾਰੀ ,ਪੁੱਤਰ ਆਗਿਆਕਾਰੀ ,ਨੀਰ ਨਿਵਾਸਾ,ਨਗਰ ਚ ਵਾਸਾ ਅਤੇ ਰਾਜ ਚ ਪਾਸਾ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੱਤ ਸੁੱਖਾਂ ਦੇ ਇਰਦ ਗਿਰਦ ਹੀ ਜੀਵਨ ਚੱਕਰੀ ਘੁੰਮਦੀ ਰਹੀ ਹੈ। ਰਾਜ ਚ ਪਾਸਾ ਦਾ ਅਰਥ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਸਮੇਂ ਦੀ ਹਕੂਮਤ ਤੁਹਾਡੇ ਪੱਖ ਵਿਚ ਹੋਵੇ।ਰਾਜ ਹੀ ਖਿਲਾਫ ਹੋ ਗਿਆ ਤਾਂ ਜਿਉਣਾ ਮੁਹਾਲ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ ਬਾਗੀ ਹੋਕੇ ਕਿੰਨ੍ਹੇ ਦਿਨ ਜੀ ਸਕਦੇ ਹੋਂ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੱਤਾਂ ਸੁੱਖਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਨੀਰ ਨਿਵਾਸਾ ਅਤੇ ਨਗਰ ਚ ਵਾਸਾ ਬੜੇ ਅਹਿਮ ਤੱਤ ਹਨ।ਪਾਣੀ ਦੇ ਵੱਡੇ ਸਰੋਤ ਕੋਲ ਬਸਤੀ ਵਸਾਉਣੀ ਸਮਝਦਾਰੀ ਹੁੰਦੀ ਸੀ । ਪਾਣੀ ਜੀਣ ਲਈ ਮੁਢਲੀ ਜਰੂਰਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਸਮੂਹ ਵਿੱਚ ਵਸਣਾ ਭੀ ਸੁਰਖਿਆ ਦਾ ਪਹਿਲਾ ਅਸੂਲ ਹੈ ।ਵੱਡੇ ਪਰਿਵਾਰਾਂ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਭੀ ਬਜ਼ੁਰਗਾਂ ਦੇ ਦਿਮਾਗ ਵਿੱਚ ਹਰ ਤਰਾਂ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਅਤੇ ਹਰ ਕੰਮ ਦੀ ਸੁਖਾਲੀ ਕਰਕੇ ਹੀ ਆਇਆ ਹੋਵੇਗਾ । ਮਸ਼ੀਨੀ ਜੁੱਗ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਖਾਨਾਵਦੋਸ਼, ਕਬੀਲੇ ਅਤੇ ਜਾਤੀਆਂ ਦੇ ਮਨੁੱਖੀ ਝੁੰਡ ਹਮੇਸ਼ਾ ਨਦੀਆਂ ਕਿਨਾਰੇ, ਝੀਲਾਂ, ਝਰਨਿਆਂ ਦੇ ਕੋਲ ਹੀ ਵਸੇ। ਸ਼ਿਕਾਰ ਆਦਿ ਕਰਨ ਲਈ ਦੂਰ ਜਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ਪਰ ਪਾਣੀ ਹੱਥ ਦੇ ਹੇਠ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ । ਸਮਾਂ ਪਾਕੇ ਚਿਰ ਸਥਾਈ ਰੂਪ ਵਿਚ ਇਕੋ ਥਾਂ ਵਸਣ ਦਾ ਖਿਆਲ ਆਉਂਦਾ ਗਿਆ ਅਤੇ ਨਗਰ ਵੱਸਦੇ ਗਏ । ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਸਿੰਧੂ ਘਾਟੀ ,ਨੀਲ ਜਾਂ ਚੀਨੀ ਸਭਿਅਤਾ ਦੇ ਸਬੂਤ ਨਦੀਆਂ ਕਿਨਾਰੇ ਹੀ ਮਿਲੇ ਹਨ । ਛੋਟੇ ਪੱਧਰ ਤੇ ਪਿੰਡ ਭੀ ਇੱਸੇ ਖਿਆਲ ਕਰਕੇ ਵਸੇ ਹੋਣਗੇ। ਸਾਲਾਂ ਵੱਧੀ ਪਏ ਵੱਡੇ ਮਾਰੂ ਅਕਾਲ ,ਪਾਣੀ ਖਤਮ ਹੋਣ , ਕੁਦਰਤੀ ਕਹਿਰ ਜਾਂ ਹਕੂਮਤ ਦੀ ਕਰੋਪੀ ਕਰਕੇ ਇੱਕ ਜਗ੍ਹਾ ਤੋਂ ਉੱਠ ਕੇ ਦੂਜੀ ਜਗ੍ਹਾ ਹਿਜਰਤ ਕਰਕੇ ਵਸਣਾ ਪੈਂਦਾ ਸੀ । ਤਦ ਭੀ ਕਿਸੇ ਢੁੱਕਮੀ ਰਾਖਵੀਂ ਥਾਂ ਤੇ ਜਿੱਥੇ ਖੁਦ ਲਈ ਅਤੇ ਸਹੁਲੀਅਤ ਲਈ ਰੱਖੇ ਪਸ਼ੂਆਂ ਦੇ ਢਿੱਡ ਭਰਨ ਲਈ ਕੁਦਰਤੀ ਭੰਡਾਰ ਅਖੁਟ ਹੋਣ ਉੱਥੇ ਹੀ ਦੁਬਾਰਾ ਵਸਿਆ ਜਾਂਦਾ ਸੀ । ਜਿੱਥੇ ਨਦੀਆਂ ਝੀਲਾਂ ਸੋਮੇ ਨਹੀਂ ਸਨ ਜਿਵੇਂ ਮਾਰੂਥਲ ਓਥੇ ਪਾਣੀ ਲਈ ਖੁਦੇ ਖੂਹ ਤਲਾਅ, ਛੱਪੜ,ਢਾਬ,ਬਾਵੜੇ, ਟਾਂਕੇ, ਆਦਿਕ ਸਬੂਤ ਦੇ ਤੌਰ ਤੇ ਅੱਜ ਭੀ ਖੜੇ ਹਨ । ਪਿੰਡ ਵਸਾਉਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਜਿਥੇ ਕੁਦਰਤੀ ਜਲ ਵਸੀਲਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਸੀ ਉੱਥੇ ਖੂਹ ਜਾਂ ਪੱਕੀ ਮਿੱਟੀ ਦੇਖਕੇ ਛੱਪੜ ਤਿਆਰ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਤਾਂ ਜੋ ਮੀਂਹ ਨਾਲ ਸਾਲ ਭਰ ਦਾ ਜਲ ਜ਼ਖੀਰਾ ਰਾਖਵਾਂ ਹੋ ਜਾਵੇ । ਕਈ ਕਈ ਪਿੰਡਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਬਣੇ ਇੱਕੋ ਇੱਕ ਛੱਪੜ ਸਾਂਝੇ ਸਹਿਕਾਰ ਜੀਵਨ ਦੇ ਝੰਡੇ ਬੁਲੰਦ ਕਰਦੇ ਅੱਜ ਭੀ ਦਿਖਾਈ ਦੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ।ਪਿੰਡ ਮੋਰਜੰਡ ਸਿਖਾਂ ਜਦੋਂ ਵਜੂਦ ਚ ਆਇਆ ਓਦੋਂ ਪਾਣੀ ਦੀ ਬਹੁਤ ਘਾਟ ਸੀ । ਆਸੇ ਪਾਸੇ ਟਿੱਬੇ ਬਹੁਤ ਸਨ ਅਤੇ ਆਏ ਦਿਨ ਰੇਤਲੀਆਂ ਹਨੇਰੀਆਂ ਆਉਂਦੀਆਂ ਰਹਿੰਦੀਆਂ ਸਨ, ਜੋ ਕਈ ਕਈ ਦਿਨ ਚਲਦੀਆਂ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਨਾਮ ਭੀ ਪ੍ਰਚੰਡਤਾ ਮੁਤਾਬਕ ਕਾਲੀ ਬੋਲ਼ੀ ,ਲਾਲ ਜਾਂ ਪੀਲੀ ਹਨੇਰੀ ਰੱਖੇ ਗਏ ਸਨ । ਵਾ ਵਰੋਲੇ ਧੁਰ ਅਸਮਾਨੀ ਘੁੱਮ ਘੁੰਮੇਰੀਆਂ ਪਾਉਂਦੇ । ਰੇਤਲੀ ਖੱਖ ਤਾਂ ਚੜੀ ਹੀ ਰਹਿੰਦੀ । ਕਈ ਦਿਨ ਲਗਾਤਾਰ ਹਨੇਰੀ ਚਲਦੀ ਤਾਂ ਜਨ ਜੀਵਨ ਠਹਿਰ ਜਾਂਦਾ । ਰੇਤਲੀ ਮਾਰੂਥਲ ਧਰਤੀ ਪਾਣੀ ਨੂੰ ਸੋਖ ਜਾਂਦੀ ਸੀ।ਹਰਿਆਲੀ ਦੇਖਣ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਮਿਲਦੀ ਸੀ ।ਰਾਜਪੁਤਾਨੇ ਵਿੱਚ ਜੰਡ ਦਰਖਤ ਬਹੁਤ ਹੁੰਦੇ ਰਹੇ ਹਨ ਉਹ ਇੱਥੇ ਭੀ ਸਨ । ਪਿੰਡ ਦਾ ਨਾਉਂ ਭੀ ਇੱਸੇ ਦਰਖਤ ਕਾਰਨ ਰਖਿਆ ਗਿਆ ਹੈ । ਇੱਥੇ ਹੇਠਲਾ ਪਾਣੀ ਬਹੁਤ ਖਾਰਾ ਸੀ । ਪਿੰਡ ਦੀ ਮਿੱਠੀ ਹੇਠਾਂ ਤਕ ਰੇਤਲੀ ਸੀ ।ਟੋਬਾ ਬਣਾਉਣਾ ਅਕਲਮੰਦੀ ਨਹੀਂ ਸੀ । ਖੂਹ ਪੁੱਟ ਕੇ ਦੇਖ ਲਿਆ ਸੀ ਜਿਸ ਵਿਚੋਂ ਜਹਿਰ ਵਰਗਾ ਖਾਰਾ ਪਾਣੀ ਨਿਕਲਿਆ ਸੀ । ਅੱਜ ਭੀ ਪਿੰਡ ਦੇ ਪਹਾੜ ਵਾਲੇ ਪਾਸੇ ਖੜਾ ਹੈ ਅਤੇ ਖਾਰਾ ਖੂਹ ਦੇ ਨਾਂਓਂ ਤੋਂ ਜਾਣਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਆਸੇ ਪਾਸੇ ਕਈ ਪਿੰਡ ਵਸ ਚੁੱਕੇ ਸਨ ।ਸੰਗਰੀਆਂ,ਧੌਲੀਪਾਲ,ਲੀਲਾਂਵਾਲੀ,ਬੋਲਾਂਵਾਲੀ, ਨੁਕੇਰਾ ਆਦਿਕ ਪਿੰਡ ਪੁਰਾਣੇ ਹਨ । ਪਰ ਖੂਹ ਕਾਮਯਾਬ ਨਹੀਂ ਹੋਏ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਪਿੰਡਾਂ ਦੀ ਪਾਂਡੋ ਮਿੱਟੀ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਛੱਪਡਾਂ ਦਾ ਪਾਣੀ ਵਧੀਆ ਕੰਮ ਸਾਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਬਹੁਤ ਸਾਲਾਂ ਤਾਈਂ ਦੂਜੇ ਪਿੰਡਾਂ ਤੋਂ ਪਾਣੀ ਮਿਲਦਾ ਰਿਹਾ ।ਸਿਰ ਤੇ ਘੜੇ ਰੱਖ ਸੁਆਣੀਆਂ ਮੀਲਾਂ ਦੂਰ ਤੋੰ ਪਾਣੀ ਲਿਆਉਂਦੀਆਂ ।ਊਠਾਂ ਤੇ ਚੌਕੜ ਪਾਕੇ ਜਾਂ ਬੋਰੇ ਚ ਦੋ ਤੌੜੇ ਰੱਖ ਕੇ ਭੀ ਪਾਣੀ ਢੋਇਆ ਜਾਂਦਾ ।ਇਹ ਉਹ ਜਮਾਨਾ ਸੀ ਜਦੋਂ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ਘਿਓ ਸਸਤਾ ਤੇ ਮਹਿੰਗਾ ਪਾਣੀ ।
लाउडस्पीकर हाजिर होलगता है जल्दी ही धार्मिक स्थलों पर बोलते लाउड स्पीकरों की बोलती बंद होने वाली है ।सरकार के हाथ उनके गले तक पहुंच गए हैं । यूपी ,दिल्ली और महाराष्ट्र में स्थानीय स्तर पर प्रशासन इन्हें उतारने भी लगा है ।साम्प्रदायिक दंगों का ठीकरा इन्हीं लाउडस्पीकरों के सिर फोड़ा जा रहा है ।लगातार दंगों के बाद सरकारों का मानना है कि अगर ये न होते तो इतने बलवाई इकट्ठे न होते और आगजनी व फसाद को हवा न मिलती । जब एक आस्था केंद्र से धार्मिक उद्यघोष होता है उसके प्रतिउत्तर में दूसरे धार्मिक स्थल से दुगने जोश के साथ अपना धार्मिक नारा बुलंद किया जाता है इसी को खुद के धर्म पर हमला मानने से उन्माद फैलता है । यह विरोध की आवाज इन स्पीकरों की सवारी करके ही दूसरे समुदाय तक पहुंचती है। लगता है धर्मों की मुठभेड़ हो रही है । इस लिये चोर की मां यही लाउडस्पीकर हैं पहले इन्हें उतारा जाये । सरकारों की खुद की नाकामी इन दंगों को रोकने में किस हद तक रहती है उस पर कभी विचार नहीं होता । नानी खसम करे दोहिता चट्टी भरे। रेल गाड़ी के आगे कूद कर कोई जान दे दे तो कसूर रेलगाड़ी का कहां होता है ? लाउडस्पीकर को माध्यम बना कर कोई शरारत करता है तो दोषी वह है ।आजादी के बाद लाउडस्पीकर हमारी आधुनिक संस्कृति का अहम हिस्सा हो गया है। उससे पहले ग्रामोफोन होता था जिसे आज की पीढी नहीं जानती । कमरे भर के लिये आवाज काफी होती थी । बिजली या बैटरी का झंझट न था । चाबी भर कर सुई लगा हाथ -यंत्र कोलतार के रिकार्ड पर रखा जाता था और साथ ही जुड़े पीतल के धत्तू से मधुर आवाज गूंजती । यह अमीर और शौकीन लोगों का प्रिय होता था । मेड इन इंगलैंड इस यंत्र को रखने वाले को गांव के लोग इज्जत की दृष्टि से न देखते थे । वह अपने जमाने का परिष्कृत म्यूजिक सिस्टम था। बाद में आये बड़ी बैटरी से चलने वाले बड़े और जोरदार आवाज वाले जिन्हें लाउडस्पीकर कहा जाता है । धार्मिक और मांगलिक कार्यक्रमों में इनकी उपस्थिति अनिवार्य हुई है। पंजाबी विवाहों में छत पर चारपाइयाँ खड़ी करके बांधा जाता और पहला गीत यमला जट्ट का 'सतगुर नानक तेरी लीला न्यारी' गूंजता तो पड़ोस के गांव वाले भी सुनने के लिये दौड़े आते । गुरुद्वारों में गुरबाणी का पाठ,मंदिरों से चौपाइयों,गायत्री मंत्र व हनुमान चालीसा का जाप और मस्जिदों से अजान व तिलावते पाक सुनने को मिलती रही है। अजान में कहा जाता है 'हय्या अल फला'अर्थात अंधेरे से रोशनी की ओर आओ । यह सनातन धर्म के श्लोक 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' से अलग कहां है ? यही स्पीकर अनाउंसमेंट के साधन भी बने।किसी की बकरी गुम हो जाती तो गुरुद्वारे के स्पीकर से 'बेनती 'की जाती । सांझा खाला साफ करना,किसी के कोई मर गया तो अंत्येष्ठि की सूचना, विवाह में दूध पहुंचाने का आग्रह इसी स्पीकर के माध्यम से होता रहा है । पोलियो की दवाई पिलाने और पटवारी साहब के गांव में पधारने की सरकारी घोषणा यही स्पीकर करता रहा है ।अब इसका रूप बदला है । अब यह डी जे हो गया । जो कान फोड़ू आवाज करता है । नई पीढ़ी इसी की दीवानी है । बारात लड़की वालों के घर कितनी लेट पहुंच पायेगी डी जे पर निर्भर करता है । जो लड़का कभी बाथ रूम में भी नहीं नाचा होता वो डी जे की धुन पर नागिन सा नाचता है। नए गीतों गानों और डांस की जान इसी स्पीकर में बसी होती है । गीत संगीत का अरबों रुपयों का बिजनेस इसी पर अभिलम्बित है ।अफसोस इसी स्पीकर को धार्मिक कटुता का जनक मान लिया उसे छुट्टी पर भेजने की तैयारी की जा रही है ।जिस गंगा जमुनी सभ्यता का हम हिंदुस्तानी दुनिया के सामने दम भरते और गर्व करते रहे हैं वही गंगा और जमुना देश के कई हिस्सों में सौतियाडाह से भयंकर रूप से ग्रस्त हैं । अपने अपने धार्मिक झंडे उठा रखे हैं । तलवारें खींच ली हैं । महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से कहा है जब अजान होगी तो मस्जिदों के बाहर दुगनी आवाज में हनुमान चालीसा बजाया जायेगा । बताइये यहां कसूर स्पीकरों का है या छिछली राजनीति का । सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद वहां की सरकार बैमनस्य फैलाने के एक्ट में उन पर कार्यवाही नहीं कर रही । आखिर विचारधारा अलग होने के बावजूद राज और उद्धव ठाकरे हैं तो चचेरे भाई ही । जिस राजस्थान में बंटवारे के समय एक भी लाश नहीं बिछाई गई वहां करोली में और अब अपनी मस्ती में मस्त रहने वाले शहर जोधपुर में दो समुदायों के आमने सामने होने की नौबत आ गयी ।पत्थर बरसे ,लाठीचार्ज हुआ । पंजाब में हिन्दू सिख सांझ को ललकारा गया । पटियाला में जो कुछ हुआ वह भविष्य में घातक नासूर न बन जाये। दिल्ली यूपी में धार्मिक यात्रा निकालना खतरे का काम हो गया । आम शहरी डरने लगा है क्या पता कब पत्थर बरसने शुरू हो जायें । गोली न चल जाये। पुलिस वाले लाठीचार्ज के समय दोषी व निर्दोष को धक्के चढ़ने पर एक नजर से ही देखते हैं । उन्होंने मार मार कर कानून व्यवस्था लागू व शांति बहाली करनी होती है । लेकिन मजे की बात यह है कि दंगे के बाद परिस्थितियां बिगड़ने पर कर्फ्यू लगाने की सूचना क्या कानों कान दी जाएगी उसके लिये लाउडस्पीकर ही काम में लिया जायेगा। चुनावों में नेता गला फाड़ सार्वजनिक सभाएं करने के लिये स्पीकर में नहीं बोलेंगे का ? वोट लेने के लिये हिन्दू मुस्लिम भाई भाई बोल सकते हैं तो बाद में दूसरे सम्प्रदाय के लोगों से बू क्यों आने लगती है । उनके तीज त्योंहारों के समय वे शत्रु क्यों दिखने लगते हैं । उनके त्योंहार पर उनके वहां जाकर लाउडस्पीकर पर नाच गाना करें 'जिंदगी चार दिनां दी 'और माहौल खुशनुमा बना दें ।
कुत्ता खस्सी करा लो सभी सरकारें रोनी सूरत बना कर बोलती रहतीं हैं -खजाना खाली है । जिन घाघ अफसरों के हाथ में सरकारी नकेल रहती है वे तब भी नए प्रपोजल बनाकर मंत्रियों के पास भेजते हैं । उनसे डिसकस करते हैं।नफा नुकसान समझाते हैं और फाइल पास करवाके ही लौटते हैं । बानगी के तौर पर शहरी कच्ची बस्तियों के घरों का मल जल बड़ी पाइपों द्वारा शहर से बाहर जल शोधन संयंत्र तक ले जाया जाये ,वहां पानी साफ करके सिंचाई के लिये किसानों को बेचा जाये । इससे स्वायत्तशासी संस्थाएं आत्म निर्भर होंगी । यह एक सब्जबाग था । फटाफट करोड़ों का बजट पास हुआ, ठेके छूटे, काम शुरू हुआ । गलियों को खोखली करके बड़ी बड़ी पाइपें धरती में दबाई गयीं । अभी ट्रीटमेंट संयंत्र तक पहुंची ही नहीं थीं कि किसी निरीक्षणकर्ता ने पाया कि पाइपों का लेबल सही नहीं है । शहर सड़ जाएंगे । नागरिक मारे बदबू के भाग खड़े होंगे ।योजना ठप्प हो गयी । सब को अपना हिस्सा जरूर मिल गया होगा । करोड़ों रुपयों का माल मिट्टी में दबा पड़ा है । पाइपों पर बनी सड़क अब भी ढोल सी बजती सुनी जा सकती हैं । शायद ही किसी शहर में योजना सफल हुई हो । ऐसी और बहुत योजनाएं मिल जाएंगी, जिनसे जनहित तनिक भी नहीं हुआ बजट ठिकाने लग गया । कितनी हास्यस्पद योजना है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिये नसबन्दी करवाने वाले को अनुग्रह राशि दी जाये । लेकिन बच्चा पैदा करने पर उससे ज्यादा रुपये दिये जाते हैं । इतना अंक गणित तो अपने यहां के लोग जानते ही हैं कि घाटा क्यों उठायें । नसबन्दी की बजाय जन्मदर बढ़ाये रखना ही फायदेमंद है । नसबन्दी से याद आया इन दिनों कुत्तों की नसबन्दी चर्चे बटोर रही है । दशकों पहले कभी कुत्ते मारने का अभियान चला था । आवारा कुत्ते सदा ही जी का जंजाल रहे हैं । रात विरात आना जाना खतरे से खाली नहीं रहता । झुंड के झुंड बैठे गुर्राते रहते हैं । पहली रोटी गाय की आखरी कुत्ते की कहने और विश्वास रखने वाले पुण्य कमाते हुए आवारा कुत्तों को ललचाए रखते हैं । पागल कुत्ते के काटने और नाभि में इंजेक्शन लगवाने की पीड़ा जिसने सही है वह जानता है टीके का उतना दर्द नहीं होता जितना सुंडी में सुई की कल्पना डराती है ।गांवों में हड्डा रोड़ी के कुत्ते बहुत खतरनाक होते हैं । अकेला आदमी देखकर हिंसक हो जाते हैं । उनके लहू मुंह लग चुका होता है जैसे भृष्ट अफसर के रिश्वत। शहरों में मोटरसाइकिल वाले के पीछे दूर तक दौड़ते है । वाहन तेज दौड़ाया जाता है रिले रेस के धावकों की तरह आगे और तैयार मिलते हैं । देवयोग ही माना जायेगा अगर दुर्घटना न हो ।कुत्ते मारने के अभियान में जहरीला गुलाब जामुन कुत्ते के आगे डाला जाता था । खाते ही मर जाता नगर पालिका की गाड़ी उन्हें दूर ले जाकर पटक देती । फिर कोर्ट और जानवर अधिकारों के संरक्षक जागे इस तरह मारना बंद करवाया । किसी ने कुत्तों की नसबन्दी का सुझाव दे दिया ।सुझाव कारगर है । न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी । धीरे धीरे कुत्ते कम हो जाएंगे ।नागालैंड की तरफ कुत्ते और बिल्लियां देखने को कम ही मिलती हैं वहां के लोग इन्हें मारकर खाते हैं ।वे कभी इधर आएं तो इतने कुत्ते देखकर 'हाबड़के' से खुद मर जायें । वैसे जनसंख्या नियंत्रण के लिये नसबन्दी पर जो काम हुआ उससे तो स्थिति काबू में आ जानी चाहिये थी । अफसोस हम देखते ही देखते एक सौ पैंतीस करोड़ से ज्यादा हो गये । जबकि इस काम के लिये जबरदस्ती भी कर ली और लालच भी दे लिये । कुत्तों पर काम चालू हुआ ही है भृष्टाचार की बदबू फैल भी गयी । सुना है गंगानगर में यह ठेका लाखों का है। ठेकेदार के कारिंदे घपलेबाजी पर उतर भी आये। वे कुत्ते पकड़ कर भी ले गये और वापिस पुरानी आबादी के पंचमुखी मंदिर के पास बाईज्जत वैसे के वैसे छोड़ भी गये । किसी अनुभवी पारखू को पता चल गया कि नसबन्दी नहीं हुई । शिकायत हुई । बयान दिये गये। ठेकेदार से पूछताछ होगी । अनुभव कहता है जांच रिपोर्ट में लिख दिया जायेगा उन कुत्तों की उम्र और वजन थोड़ा था इसलिये बंध्याकरण नहीं किया ।घपलेबाजी के आरोप निराधार हैं । आवारा कुत्ते इलाका बदलते रहते हैं । कौन रोज उन्हें पकड़ कर पेश करेगा । सभापति के मेज पर लिटा कर दिखायेगा भ्र्ष्टाचार आदि जुगादि है । यह फाइलों से शुरू होकर फाइलों में छुप जाता है । अगर इस योजना में पारदर्शिता रखी जाये, पूरी मॉनिटरिंग हो, समुदाय से भी निगरानी करवाई जाये तो यह समाज हित में बड़ा काम होगा । कमीशनखोर अफसर या बाबू भी कभी सुबह की सैर को निकलते होंगे किसी दिन उनकी पैंट फाड़ दी उस दिन लगेगा ईमानदारी से यह काम किया होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता । हो सकता है सुंडी में टीके लगवाने तक नौबत आ जाये । साधो ! जब तक दबंगों के आगे पूंछ हिलाने और कमजोर पर गुर्राने वाली दफ्तरी पीढी की नसबंदी नहीं होगी यह कुत्तेखाणी यूं ही चलती रहेगी ।
तूड़ी की जैड सुरक्षा जाते सीजन नरमे का आश्चर्यजनक भाव फिर सरसों की बम्पर पैदावार,इस बार भगवान ने कनक निकालने के लिये कई सालों बाद सहानुभूति पूर्वक अतिरिक्त समय दिया । अगर फिर भी किसी आलसी किसान के कनक खड़ी थी अंत अप्रैल तक उसे थोड़ा बहुत खड़का बड़का करके डराया और कहा चेत जा और खेत जा । इन हालातों को देखकर कोई नहीं कह सकता कि खेती अब घाटे का काम है ।अगर फिर भी कमी लगती है तो भादरा तहसील के किसी भी किसान से "खुल जा सिम सिम" का कोडवर्ड पूछा जा सकता है अर्थात फसल बीमा योजना की जानकारी ली जा सकती है । प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पूरे देश के किसानों के लिये है लेकिन पूरे देश में सर्वाधिक अरबों रुपये एक ही तहसील भादरा के किसानों के खातों में आये हैं । जिस रेतीले खेत में आज तक दो सेर दाने नहीं हुए उसका भी लाखों रुपये मुआवजा ले रहे हैं । जीवन स्तर सुधर गया । नोहर और भादरा को आम तौर पर बारानी माना जाता है जबकि इस योजना ने यहां के किसानों की किस्मत बदल दी । अन्य तहसीलों के किसान अभी भी किसान क्रेडिट कार्ड ,के सी सी और अन्य कर्जे लेने के लिये बैंकों की लाइनों में लगते हैं । इसके लिये जनप्रतिनिधि जागरूक होने चाहिये। बैंक या कंपनी जरा सी देर कर दे तो वहां के नेता के एक बुलावे पर दस बीस हजार किसान बैंक के आगे इकट्ठे होने में देर नहीं लगाते । भादरा विधायक हरियाणा में जाकर तूड़ी पर लगी रोक हटाने के लिये सिरसा के कलेक्टर को खरी खरी सुना आया । कह दिया हरियाणा से बाहर तूड़ी जाने पर जो रोक लगा रखी है उसे उठायें अन्यथा यहां धरना लगाया जायेगा । अगर ऐसा होता है तो यह अभूतपूर्व बात होगी । पर अगला कामरेड है । दूसरे स्टेट की मनमर्जी के खिलाफ भी बोलेगा । वहां से बाहर तूड़ी ले जाने पर तीस चालीस हजार रुपये का चालान किया जा रहा है जबकि पहले वहां की तूड़ी से राजस्थान के गौधन का पेट भर रहा था और वहां के किसानों को भी आमदन हो रही थी। अब सोचने की बात है तूड़ी के भाव आसमान पर जा टँगे हैं । तूड़ी मुहावरों में हल्की चीज के रूप में जानी जाती रही है "आज मेरी तूड़ी हो गई" या "तेरी तूड़ी कर दूंगा" कहने के पीछे तुच्छता का भाव होता था । वही तूड़ी राजस्थान के कुछ जिलों में बीस रुपये किलो अभी से हो गई । जबकि तंगी का समय तो आगे आना है । तूड़ी की मारामारी हो रही है लोग सोचने लगे हैं कि पशु रखें या छोड़ दें । पहले खेती के साथ पशुपालन सहायक धंधा था ।अब घाटे का सौदा है । खल भी कह रही है हाथ न लगा ।अस्सी के दशक तक किसान तूड़ी ,बनछटी दूसरों के घरों तक छोड़कर आते थे कि इतनी का हम क्या करें। यह चीजें मोल बिकने का तो सोचा भी न था । आगामी फसल के लिये खेत तैयार करने की जल्दी होती थी । दो चार बोरे तो कभी भी सम्भाली हुई में से मांगने पर दे देते थे । सरसों का गूना जी का जंजाल रहता था कि इसे खपायें कहां ।अब ईंटभट्टों पर बेचने से आम के आम गुठलियों के भी चोखे दाम मिल रहे हैं । सामाजिक समरसता भी टूट रही है ।अब कोई टोकरा तूड़ी मांग ले तो बहाने बाजी पर उतरना पड़ता है । सारा साल सड़कों पर विशालकाय तूड़ी लोडिड ट्रालियां परिवहन करती हैं । अगर संकड़ी सड़क पर चारों तरफ भूंग निकाले कमरे का कमरा चल रहा है तो पीछे साधनों वाले कितने भी हॉर्न बजायें कोई फायदा नहीं ।सोशल मीडिया पर चर्चा छिड़ गई है कि सरकार लगभग अठाइस तीस रुपये गेहूं खरीद कर हट्टे कट्टे लोगों को दो रुपये किलो बेच सकती है तो बेजुबान पशुओं के लिये दो रुपये किलो तूड़ी नहीं दे सकती? मजे लेने वाले कह रहे हैं अगर हरियाणा तूड़ी पर बेन कर रहा है तो राजस्थान वाले वहां प्याज न भेजें ।यूपी वाले गुड़ भेजना बंद करें और बिहार वाले 'रिश्तेदारी' न करें क्योंकि चालीस साल के छड़े रूंडे खूंडे वहीं मिलते हैं ।दिल्ली वाले पराली जलाने का दमघोटू प्रदूषण न सहेंगे अब कौन जलाएगा, सब तूड़ी बनाकर बेचेंगे । अगर तूड़ी का महत्व इसी तरह बढ़ता गया तो हो सकता है चाय नमक के पॉलिथीन पैकेट्स की तरह किलो तूड़ी भी इसी तरह न बिकने लग जाये ।
गैंगस्टर तो यूं ही बदनाम हैं हमारे सार्वजनिक पड़ोसी गिरधारीलाल जी डिप्रेशन के मरीज सा बड़बड़ाते हुए हमारे गरीब खाने में तशरीफ़ लाये और आते ही शुरू हो गये, बोले 'अब तो कश्मीरी पंडितों की तरह पलायन करना पड़ेगा लेकिन जायें तो किस जम्मू में जायें? यहां रहना अब दूबर हो रहा है ।' मैंने जब पूछा कि 'क्या हुआ, क्यों फिक्रमंद हो रहे हो ' तो बोले 'यह पूछो क्या नहीं हुआ ? अरे राजस्थान की पावन पवित्र धरा का हर आम आदमी सीधा-सादा , सरल और मेहनती है जो किसी तरह दो जून की रोटी का मुश्किल से जुगाड़ करता है । यहां भी गैंगस्टर पैदा हो गये जो सीधे मंत्री से ही 75 लाख रुपये फिरौती मांग रहे हैं अन्यथा उनके परिवार को मारने की धमकी दे रहे हैं ।आम बन्दे का क्या होगा?' 'आप चिंता क्यों करते हैं।' मैंने कहा 'हमारे विधायक के रूप में चुन कर भेजे दो सौ बब्बर शेर अब खूब खा पीकर,मोटे ताजे होकर, ऐश आराम करके बाहर आये हैं वे सब सम्भाल लेंगे । जरा राज्य सभा चुनावों की जीत हार का विश्लेषण कर लेने दो ।'अब गिरधारी लाल जी ने बात का रुख मोड़ लिया, ढीले पड़ते हुए बोले ,'बाड़ाबंदी के भी क्या ठाठ होते हैं । सुना है एक विधायक एक दिन में चार हजार का तो भोजन खा जाता था जबकि उनमें से कितने बुढऊ शुगर,बी. पी. और अन्य बीमारियों के मरीज होंगे। बाकि ऐशो आराम का एक विधायक पर बीस हजार रुपये प्रतिदिन खर्च आ जाता था । जो मांगो हाजिर होता था । हम तुम तो फाइव स्टार होटल की केवल फोटो देख लिया करो भीतर जाने के लिये किसी बाहरी श्रोत से आया पैसा जेब में होना चाहिये अन्यथा कोई दीवार के भी हाथ न लगाने देगा । मेहनत मजदूरी करने वाला वहां के सुइट, मसाज पार्लर ,पलंग,तौलिये ,बाथ रूम ,तरणताल और खाने की वैरायटियां सपने में भी नहीं देख सकता । भाग्य से मिलता है ऐसा अवसर । जब पैसे की चिंता न हो और नौ दिन फाइव स्टार होटल में जवाई जैसी सेवा,और हर तरह का मनोरंजन मिलता हो , जेब किसी की, हाथ किसी का, वाह क्या किस्मत पाई है । जिन विधायकों के पुरखे उड़ते हवाई जहाज को देख कर उसे चील गाड़ी बताया करते थे उन्होंने विमान को बिना भाड़े की चिंता के ऑटो रिक्शा की तरह इस्तेमाल किया । आते समय बड़े हवाई जहाज में जयपुर आये वहां भी महंगा होटल मिला । भाग्य हो तो विधायकों जैसा । भाजपा ने भी टूट के डर से अपने विधायकों को जयपुर के होटल में ठहराया बस नाम बाड़ाबंदी की जगह ट्रेनिग कैम्प रखा, जनता इतनी बेवकूफ भी नहीं जो शब्दों की हेर फेर न समझे ।'मैंने भी बात आगे बढ़ाई 'शुरू में लगता था हॉर्स ट्रेडिंग हो जायेगी । भीतर घात टी वी चैनल मालिक सुभाष चंद्रा की डगमगाती नैया पार लगा देगी । जब उदयपुर से आते समय फाइनल रिहर्सल करते हुए मॉक पोलिंग करवा कर देखी तो कांग्रेस के चार विधायक गलत वोट कर गये थे, तब लगा भाजपा को फायदा मिलने वाला है । इनके कुछ विधायक कड्डी ढोळेंगे । कुछ निर्दलीय कोप भवन में जा बैठेंगे, पूर्व में उन्हें कोरी झांसे बाजी का झुनझुना ही दिया गया था, कोई मलाईदार ओहदा नहीं मिला ,लगा वे जादूगर को अब पिदकायेंगे, लेकिन उन्होंने आंख की किरकिरी बने कुछ अधिकारियों के हाथों हाथ ट्रांसफर करवाने को ही मोर्चा मार लेना मान लिया और झोला उठा कर बाड़ा बंदी में चले आये । सब विरोध फुस्स हो गये । भीतर ही भीतर क्या पता क्या खिचड़ी पकी और राजस्थान से बाहर से आये तीनों उम्मीदवार सिट्टा सेक गये । वे इतने ही तीसमार खां हैं तो लोक सभा के लिये खड़े होने की रिस्क भी कभी उठाते। वे राजस्थान का राज्य सभा में कितना हित साधन करेंगे, पहले के अनुभव तो अच्छे नहीं । लेकिन पांच साल के लिये चिंतामुक्त हो गये । राज्यसभा कभी भंग नहीं होती । भाजपा की विधायक चंद्रकांता के गिरफ्तारी वारंट ऐन मौके पर निकलवाये ताकि वोट न दे पाये । यह मोहल्ला स्तरीय खुंदक थी, बड़े माननीयों के स्तर का आचरण तो बिल्कुल न था जबकि मामला पांच साल पुराना था । वोटिंग में एक कांग्रेसी विधायक परस राम मोरदिया अपना वोट कैंसिल करवा गये और भाजपा को जो अनुशासित पार्टी होने का मुगालता था वह भी टूट गया । धौलपुर से विधायक शोभा रानी क्रॉस वोटिंग करते हुए अपना मत कांग्रेस के प्रमोद तिवाड़ी को दे गयी।''यह सब तो जनता ने देखा है। हाईकमान ने कह रखा था येनकेन प्रकारेण अपने ये आदमी राज्यसभा में पहुचने चाहिये।संख्या बल के आंकड़ों का गणित साफ था कि तीन कांग्रेस के एक भाजपा का जीतेगा पांचवें की फाचर तो यूं ही फंसाई थी ,इसी पांचवें के कारण बाड़ा बंदी का खेला हुआ और करोड़ों रुपयों को तंगली लगी ।' गिरधारीलाल जी ने मेरी बात बीच में काटते हुए कहा 'आप पढ़े लिखे हैं यह बताओ होटल और विमानों का लगभग तीन करोड़ रुपये का खर्च कौन उठायेगा ?और मन्त्री को मिली धमकी का क्या होगा ? वह रिजर्व सीट पर विधायक जीता है और कम महत्व के महकमे का वजीर है, बस अर्जुन राम मेघवाल के कद को छांगने के लिये उसे महत्व दिया है । वह कहां से इतनी रकम देगा ?''मंत्री का क्या छोटा और क्या बड़ा होता है गिरधारी लाल जी!' मैंने ज्ञान बघारा 'मंत्री चाहे तो स्विमिंग पूल से भी मोती बटोर सकता है, वैसे भी उसका बेटा पंचायत समिति का प्रधान,बेटी जिला परिषद सदस्य है, वो तो देर से मंत्री बने हैं अन्यथा बेटी सीधे जिला प्रमुख बनती । पहले भी एक मंत्री की बेटी जिला प्रमुख रही है । ट्रांसफर करवाने के लिये आने वालों से वही बात करती थी । खर्च की बात तो हम जैसों के लिये ही बड़ी होती है कि चार मेहमान चार दिन रह जायें तो बजट डगमगा जाता है । पहले भी यही विधायक महीना भर फाइव स्टारी मजे लूट चुके हैं, जबकि तब करोना का मंझ था आम आदमी सड़क पर नहीं निकल सकता था ये होटल दर होटल घूम रहे थे । इन्हें जिसने चकरी चढ़ाया था अब वही कह रहा है बाड़ा बंदी की परंपरा अच्छी नहीं । तब खर्च किसने भरा था बात फूटी क्या ? जिसने पहले भरा वही अब भर देगा । मार्बल की खानों से समझ लो सोना निकलता है उनके ठेकेदार छोटी मोटी सेवा को धर्म मानते हैं । हम पर टेक्स जरा और बढ़ जाएंगे । बेरोजगार युवा चार हजार की नौकरी को भी मोहताज हैं और ये एक दिन में चार हजार रुपये भोजन में चट कर जाते थे वो भी खुद के नहीं । आप धमका कर रंगदारी वसूलने वालों को ही गैंगस्टर कहेंगे इनके लिये भी कोई नाम सुझाइये ।विधानसभा में जनहित के मुद्दे यथा बेरोजगारी,बड़ी भर्तियों के समय ही पेपर आऊट क्यों होते हैं,महिलाओं पर ज्यादती सर्वाधिक यहां ही क्यों, सी एच ए का शहीद चौक जयपुर में धरना कितने दिन से चल रहा है उन्हें कोई आश्वाशन क्यों नहीं,राज्य में सब प्रांतों से डीजल पेट्रोल महंगा क्यों, अधिकारी कर्मचारी रिश्वत लेते आये दिन पकड़े जाते हैं इन पर नकेल आदि अनेक मसलों का समाधान निकालने की बजाय होटलों में घूमने वाली पलटन क्या हमारी उम्मीदों की कातिल नहीं । जब ये अगले साल वोट मांगने आयेंगे तब इनसे कहना कि बाड़ाबंदी का मजा ही लेते रहे हुजूर कोई काम भी कराया है आपने ?' गिरधारी लाल जी अपना सा मुंह लेकर चलते बने ।
मैं तुम्हें टेंडर दूंगा तुम मुझे शुकराना देना चुनावों के तुरंत बाद हर प्रांत के जीते हुए विधायक इलाके के दौरे पर निकलते हैं बाद में पांच साल तक इतनी व्यस्तता हो जाती है कि याद ही नहीं रहता किस गांव में क्या मीठी गोली दी थी । इस कमाऊ यात्रा को कोई भी नाम दिया जा सकता है । आमतौर पर इस आयोजन को धन्यवाद यात्रा कहा जाता है । मकसद इलाके में अच्छी छवि बनाना और लोगों को बताना कि देख लो वायदे के अनुसार आपको सम्भालने आया हूं । विरोधी कहते थे कि अगर मैं जीता तो दोबारा मुंह दिखाने नहीं आऊंगा । लो मैं आ गया । अगर वह सत्ता धारी दल का है तो जनता खूब स्वागत करती है, विपक्षी दल वाले का भी करती है जानती है कल को सरकार में उठापटक हो जाये, इसकी पूछ हो जाये , अंधे के पांव तले बटेर आ जाये और यह मंत्री बन जाये तो काम आ सकता है । इस धन्यवाद यात्रा में नोटों की मालाएं ,सोने की अंगूठियां बेहिसाब महंगी चद्दरें इकट्ठी हो जाती हैं । सामूहिक भोज रखे जाते हैं। अगर आने वाला मंत्री बन चुका है तो अंगूठी का वजन बढ़ जाता है तब मुकुट भी पहनाए जाते हैं । पंजाब वाले सदा ही इस पग फेरी को नया नाम देते रहे हैं उसे वे संगत दर्शन कहते हैं । लोग भी मुंह दिखाई खूब देते रहे हैं । इस प्रकार मिले धन को ए सी बी ने शायद ही पकड़ा हो ।कई सेर सोना इकठ्ठा हो जाता होगा । इस बार पंजाब से नया शब्द आया है - शुकराना । इस शब्द में भी कहीं न कहीं धन्यवाद छुपा है । यानी मैंने आपका काम किया आप मुझे खाली धन्यवाद नहीं दें शुकराना दें । नकद नारायण ही साफ साफ मतलब होता है । पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अपनी नयी नवेली सरकार के मंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त किया यही नहीं उसे गिरफ्तार करके पुलिस रिमांड पर भी दे दिया । खुद प्रेस वार्ता करके इसकी सूचना दी । दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने भगवंत मान के इस साहसिक कदम की प्रशंसा की । रिश्वत और ईमानदारी की लड़ाई में इतनी त्वरित कार्यवाही किसी अन्य प्रदेश में कभी देखी सुनी नहीं । भीतर ही दबा ली जाती है।वैसे प्रेस वार्ता करके यह बताना कि हमने फलां फलां की सिक्योरिटी हटा ली या कम करदी ,उल्टी पड़ जाती है और सिधु मूसेवाला की जान ले लेती है । बोरे भरकर रिश्वत की राशि जिनके घर से बरामद हुई वे भी किसी पार्टी के आदरणीय रहे उनके पक्ष में भी बयान वीर सामने आते देर नहीं लगाते । रक्षा सौदों में करोड़ों के घोटाले करने के आरोपी ,दिल्ली सिख कत्लेआम के दोषी भी पार्टी टिकट पाते रहे हैं । दुष्कर्म ही नहीं हत्या के आरोपों के बावजूद भी मंत्री, उनके पुत्र या निकट रिश्तेदार के विरुद्ध जांच चलती रहती है वे पद पर आसीन रहते हैं । बाद में मोटी पेंशन भी डकारते हैं । मामला घिसटता रहता है । केस पार्टी हित में दबा लिया जाता है । हो सकता है मुख्यमंत्री की कार्यवाही की मंशा हो लेकिन दबाब समूह के आगे झुकना पड़ता हो । कानून बना लिये हैं ऐसी कार्यवाही से पहले सरकार की मंजूरी लेना अनिवार्य है ,मंजूरी दी नहीं जाती । आरोपी आराम से कार्यकाल पूरा कर जाता है । अफसरों को इस मामले में काफी राहत रही है वे सस्पेंड होने या जेल जाने के स्थान पर तरक्कियां पा जाते हैं और कमाऊ पदों पर मलाई काटते हैं ।जातिवाद दीवार बन कर कार्यवाही के सामने खड़ा हो जाता है । अन्य स्वजातीय विधायक आसान सा फार्मूला फंसे विधायक के आगे रखते होंगे 'तू फंसा हम तेरे साथ हैं, हम फंसे तो हमारे साथ रहना ।' इसमें विपक्षी जातीय भाईचारा भी परोक्ष में साथ दे सकता है । ज्यादा से ज्यादा पद से इस्तीफा दिलवा कर इति करवा ली जाती है कि बेचारे ने त्यागपत्र दे दिया और क्या बच्चे की जान लोगे ? चुनाव आते आते जनता सब कुछ भूल चुकी होती है । राजस्थान में शिक्षक दिवस पर पता नहीं क्या सोचकर मुख्यमंत्री ने शिक्षा मंत्री के सामने ही सम्मानित शिक्षकों से पूछ लिया कि क्या आपको स्थानांतरण के लिये पैसे देने पड़ते हैं? शिक्षक होती है निडर जाति वे सभी हाथ ऊपर करके बोले हां देने पड़ते हैं ।मुख्यमंत्री ने उससे आगे न तो बात की न शिक्षा मंत्री से जबाब तलबी की । जांच कमेटी नियुक्त करनी चाहिये थी पर बात पर मिट्टी डाल दी गयी।वैसे तो गांव कोटवाळी सिखा देता है परंतु कोई आम आदमी पहली बार सत्ताधारी पार्टी के तीसमार खां को हरा कर विधायक बन गया हो और पहले हल्ले केबीनेट मंत्री और वह भी स्वास्थ्य मंत्री बन जाये तो कहना पड़ता है खुदा जब हुस्न देता है नजाकत आ ही जाती है । सत्ता की परंपरा का निर्वाह तो करना पड़ता है । स्वास्थ्य विभाग मलाईदार महकमा माना जाता है । डॉक्टरों को बड़े शहर के बड़े अस्पताल से उठाकर दूर गाँव की डिस्पेंसरी में भेजने की धमकी ही वारे न्यारे कर सकती है । अन्यानेक कमाई के सोर्स इस विभाग में निकाले जा सकते हैं । भर्ती और पोस्टिंग ही काफी अर्थ रखती है । संख्यात्मक रूप से शिक्षा विभाग के बाद बड़ा विभाग है । इस महकमे का मंत्री बनने के बाद शायद ही कोई विधायक असंतुष्ट रहा होगा । पंजाब में आप पार्टी की सरकार बने जुम्मा जुम्मा दो महीने हुए थे कि घटनाक्रम के अनुसार स्वास्थ्य मंत्री डॉ विजय सिंगला ने 'चढ़ते ई ढाण घाळ दी'।अर्थात सरेआम अधिकारी से कमीशन मांगना शुरू कर दिया । सभी अधिकारी भ्रष्ट नहीं होते, कोई जागती जमीर वाला भी होता है । उसने खुद मंत्री, उसके ओ एस डी और रिश्तेदारों द्वारा पैसे मांगने की काल रिकार्डिंग मुख्यमंत्री के सामने जा रखी जिसमें करोड़ों रुपयों के टेंडर में से शुकराना रूप में एक प्रतिशत रिश्वत मांगी बताई जाती है । मुख्यमंत्री ने मंत्री को बुला कर वह रिकार्डिंग सुनाई और पूछा यह आवाज आपकी है ? हां या ना में उत्तर दें । मंत्री के स्वीकार करते ही आगे की कार्यवाही सम्पन्न करवा दी । काम से पहले मांगी घूस रिश्वत और काम के बाद वही राशि शिष्टाचार का चोला पहन कर शुकराना हो जाती है । मुख्यमंत्री ने मिसाल पेश की है । प्रशंसा की जानी चाहिये । विरोधियों की दलीलें रेत की दीवार हैं । खोखली हैं । जो मंत्री खुद रिश्वत मांगने का 'मंगतीया छाप' काम करे वह इस पद के बिल्कुल लायक नहीं । पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी खुद को दलित और हर तरह के काम करने वाला बताते रहे, साली का लड़का दस महीनों में ही दस करोड़ को थूक लगा चुका था ,अब उसे कानूनी कार्यवाही का सामना करना पड़ रहा है,पर चन्नी तो सेफ है । इस मंत्री ने स्टाफ में से किसी विश्वसनीय व्यक्ति के माध्यम से यह आदि जुगादि काम करवाना था । मंत्री बनने के बाद तो रिश्तेदार भी नजदीक लगने शुरू हो जाते हैं यह सूगला काम उनसे करवाना था । और क्या रिश्तेदारों का अचार डालना होता है ?आजकल खुद ही फोन पर रिश्वत कोई अदना मुलाजम भी नहीं मांगता । भगवन्त मान के इस फैसले से दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री और जनता भी सीख लें । केवल इस्तीफा ही नहीं जेल भी भिजवायें और उसके द्वारा करवाये कामों की गहन जांच करवाएं । बनाई गई सम्पत्ति कुर्क करके भरपाई की जाये । जनता तुरन्त कार्यवाही नहीं कर सकती चुनावों में हिसाब बराबर करती है ।
रोना विछुड़े यारों को,लेके बहाना धुएं का भाभी जी साड़ी में उलझ कर गिरते गिरते कई बार सम्भलीं तो भाई साहब उन्हें सरकार कहने लगे । सरकारें भी बैठे बिठाये फाचर ले लेती हैं और अपने ही जाल में उलझ जाती हैं । महाराष्ट्र में भूचाल आया पड़ा है । मुख्यमंत्री क्या नींद में सो रहे थे । उनके खिलाफ खिचड़ी पकती रही उन तक खुशबू भी नहीं पहुंची । उनके गुप्तचर ,विजिलेंस कहां भटक रहे थे । उन्हीं की पार्टी का एक मंत्री दस बीस नहीं सरकार की चूल हिला देने जितने अड़तीस पार्टी के और बारह निर्दलीय विधायक मुम्बई से सूरत और वहां से गोवाहाटी ले गया । आरोप यह भी है कि मुख्यमंत्री विधायकों के फोन भी नहीं उठाते थे ,अब कुत्ती कादे में फंसी पड़ी है । ऐसा ही राजस्थान में हुआ था लेकिन ऐतिहासिक बाड़ाबंदी से डेमेज कंट्रोल किया । यहां बाहर वाले को सत्ता देने को ज्यादातर विधायक राजी न थे । सरकार जैसी उलझी थी वैसी पड़ी नहीं, गिरते गिरते सम्भल गयी । केंद्र सरकार ने बिना होमवर्क किये जल्दबाजी में नोटबन्दी की ,न काला धन वापिस आया न नकली नोटों पर अंकुश लगा । अफवाह तो उड़ी थी कि सब के खाते में पंद्रह लाख आ जाएंगे, बल्कि नये नोटों के साथ कई फ्राड उद्योगपति अरबों लेकर फुर्र हो गये । वैसे नोटबन्दी के नाम पर अढाई तीन सौ निर्दोष बैंकों के आगे काल के गाल में समा गये । विपक्ष को तब भी मुद्दा मिल गया था । जिन राहुल जी से दो हजार करोड़ रुपयों के हेर फेर के लिये ई डी की पूछताछ चल रही है वे चार हजार रुपल्ली निकलवाने का वीडियो बनवाने चार करोड़ की गाड़ी पर चालीस बॉडी गार्डों के साथ एक बैंक के आगे पहुंचे । जबकि दस लाख भी जिसका जमा था वो भी बैंक नहीं गया ,बैंक वाले सब सुविधा दे रहे थे । बाद में कई बैंक वालों पर भी जांच बैठी ,सुना है बहती गंगा में उन्होंने भी चोखे हाथ धोए थे। काले को सफेद करने में जोर तो आयेगा ही । कश्मीर में धारा 370 तोड़ी ,खूब शाबाशी मिली लेकिन कश्मीरी पंडित आज भी बेघर हैं । घुसपैठिये अब भी आ रहे हैं और बेगुनाहों का खून बह रहा है । तीन तलाक से वे मुस्लिम महिलाएं खुश हुई होंगी जो शोषण की शिकार थीं पुरुष तो तब भी नाखुश थे, अब भी हैं । किसान आंदोलन में सात सौ से ज्यादा किसान मरवाने के बाद काले कानून वापिस लिये अगर शुरू में कह देते कि आपके फायदे के कानून हैं, नहीं लेना चाहते तो वापिस लिए देता हूँ । ऐसा होता तो पंजाब विधान सभा चुनावों में भाजपा का हश्र इतना बुरा न होता । अब अग्निवीर नाम से नौजवानों को चार साल के लिये सेना में भर्ती करने की योजना ले आये । कुछ मायनों में यह सही भी है सत्रह से चौबीस साल की उम्र नाजुक होती है इसी उम्र में लड़के कैरियर बनाते हैं या नशाखोरी आदि में फंसकर बिगड़ते हैं । भर्ती हो जाने के बाद चार साल में दसवीं से सीधे बारहवीं का प्रमाणपत्र और लगभग पचास लाख रुपया घर आ चुका होगा । ज्यादातर युवा तीस पैंतीस साल की उम्र तक इंटरव्यू देते भटकते हैं । ये चौबीसवें साल रिटायर भी हो जाएंगे लेकिन अनेक नौकरियां इनका राह देख रही होंगी । युवा इसके नफे नुकसान को समझ भी नहीं पाये थे विरोधी दलों ने बेरोजगारों को फूंक भरनी शुरू कर दी । तोड़ फोड़ ,आगजनी पत्थरबाजी से देश का ही नुकसान हुआ । एक वीडियो में एक लँगड़ा लड़का बस में तोड़फोड़ करता दिखता है उसे किसी भी हालत में सेना में भर्ती नहीं किया जा सकता । उसका विरोध प्रायोजित था जो किसी भी तरह सही नहीं कहा जायेगा । उसी समय इ डी वाले राहुल को पूछताछ के लिये चक्कर कटवा रहे थे । उधर अग्निपथ का हंगामा शुरू हो गया, कांग्रेस पूछताछ से तंग थी । गांधी परिवार के दरबार में हाजरी के लिये हर कांग्रेसी चापलूसी की हद तक उतावला रहता है । राजस्थान की समूची सरकार ही दिल्ली में डेरा लगाए रही । पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सीधे ही पार्टी की महिला, छात्र विंग व सेवादल को विरोध के लिये उकसाते रहे । अग्निवीर योजना का विरोध तो बहाना था असल कारण ई डी की कार्यवाही का विरोध था । बयानवीर नेता एक भी पानी की बौछारों के आगे डट के खड़ा नहीं दिखा । भीड़ के रूप में गये कार्यकर्ता को भी विरोध से कोई मतलब नहीं था, बस बड़े आकाओं की नजरों में रहना ध्येय था ताकि भविष्य में लड्डू फूटे तो भोरा हमें भी मिले । राजस्थान में सरकार का डेढ़ साल पड़ा है अभी भी बुल्ले छाँगे जा सकते हैं । ऐसे ऐसों को राजनीतिक नियुक्तियों में लाभ मिल चुका है जिन्हें अपने शहर में भी लोग अच्छी तरह से नहीं पहचानते । अगर नेता जनता के काम करने की बजाए बड़े नेताओं को खुश करने की लल्लोचप्पी में लगे रहेंगे तो आम आदमी के रूप में कह सकते हैं कि सरकार गिरती है तो गिरे भाभी जी का पल्लू सलामत रहे ।