सत्रह अठारह साल गो बोछरड़ो छोरो ।ना घणों काळो, ना घणों गोरो ।जवानी गो जोर, होवै बड़ो दोरो ।दुनियादारी सयूं सफा कोरो।बांगी भींत मैं मोरो ।मोरै गै पार खाली नोरो ।दूर गे घर आलां गी छोरी।गन्ने गी पोरी।दूध गी कटोरी।रेशम गी डोरी।चांद या चकोरी।छोरे गो दिल हो ग्यो चोरी।रोज बा छोरी बाडै. मैं आंवती।सिर पर पोटां गो बठल ल्यावंती ।छोटी छोटी थेपड़ीयां बनांवती ।सुकी सुकी सागै ले जांवती।तीन चार गड़का लगांवती।छोरै गी मति मारी जांवती ।छोरो बीनै मोरै माखर तकांवतो।सपना गो संसार सजावंतो।मन गा लाडू पकांवतो।छोरी सागै व्याह रचांवतो।टाबरां गो डैडी बन जांवतो।वन वे ट्रैफिक चलांवतो।छोरी गे घर आळा जुल्म कमा दिया।सपना नै एडे लगा दिया ।लाडुआँ पर रेत बुरका दिया।फूलां पर टैंक चढ़ा दिया।नहाये धोये पर कूटला गिरा दिया ।दुष्टां भैंस तो बेची जकी बेची ,बाड़े मैं दादै गा कोठा चिणा दिया ।रूप सिंह राजपुरीरावतसर
एक दिन का शिक्षक सम्मानशिक्षक वो चिराग है जो खुद जल कर दूसरों को रोशनी देता है । उसके सम्मान के लिये समाज ने सिर्फ एक दिन पांच सितंबर निश्चित कर रखा है । उस दिन सरकार व विभिन्न संगठन उनमें से कुछ को प्रशंसा पत्र देते हैं । शाल कंधे पर रखकर फोटो खिंचाते हैं । पुराने चेले फेसबुक पर गुरूजी की फोटो लगाकर शाब्दिक सम्मान बिखेरते हुए सार्वजनिक करते हैं । अब तो नियति यह हो गयी है कि जिस दिन उसका अपमान न किया जाये उस दिन को वह सम्मान दिवस समझता है । तहसील से आया अदना अधिकारी भी उसे उसकी कुर्सी से खड़ा करके खुद बैठते समय अपने गुरुओं को याद नहीं रखता जिनकी बदौलत वह आज इस पद पर बैठा है । पहले जगत गुरु कहकर समाज शिक्षक की पूजा करता था । विभाग के अधिकारी ही नहीं मंत्री भी स्कूल में आने के बाद संस्था प्रधान की कुर्सी पर नहीं बैठते थे बल्कि उनके चरण स्पर्श करते थे। कुछ संस्था प्रधानों का भी मानखा मरा होता है वे डी ओ दफ्तर से आने वाले बाबू या हारे विधायक के लिये भी खड़े हो जाते हैं । कुर्सी छोड़ते हैं । एक जगह तहसीलदार व प्रिंसिपल के बीच कुर्सी छोड़ने के लिये द्वंद्व युद्ध हो गया था ।किसी प्रोटोकॉल में नहीं लिखा कि प्रिंसिपल आने वाले के लिये कुर्सी छोड़ेगा जैसे हरी स्याही केवल गजटेड अफसर ही इस्तेमाल कर सकता है की किवदन्ती चल रही है । कोई फालतू का काम जैसे कुत्ते बिल्ली की गिनती या सुबह खुले में शौच जाने वालों को रोकने की ड्यूटी लगानी हो तो तहसील का सहायक कर्मचारी भी शोर मचाकर कहने लगता है मास्टर है ना । सरकार ने भी उसके मूल काम पढ़ाना को दरकिनार कर रखा है और दुनिया भर के ऊल जलूल काम ओढ़ा दिये उस पर रिजल्ट भी उत्कृष्ट चाहिये । निर्धारित मानदंड से कम रहने पर सोलह सत्रह सी सी की तलवार सिर पर लटकती है ।पोषाहार की व्यवस्था अध्यापकों के गले डालने से सारा गुड़ गोबर हो गया । स्टाफ का सारा दिन इसी काम में निकल जाता है ।वे लसन छीलते रह जाते हैं मंत्री मलाई चाटते हैं । इन दिनों राज्य में सम्बंधित मंत्री पर जांच शुरू हो गयी है कि करोना काल में विद्यार्थियों के घर पहुचाने वाले राशन में कुंडी लगाई गयी । अपनी ही फेक्ट्री में पैकेजिंग करते समय कम व घटिया स्तर का सामान भेजा गया । अगर यह सत्य साबित हुआ तो डूब मरने वाली बात होगी ।गरीब घरों के बच्चे ही पोषाहार के लालच में सरकारी स्कूलों में आते हैं उन्हीं के राशन में घपला होना शर्मनाक बात है । वैसे सरकार की इतनी उदारता भी सवाल खड़े करती है कि जब स्कूल लग नहीं रहे । कोई घरों से बाहर निकल नहीं रहा तो घर पर राशन पहुचाने की जल्दी क्या थी । ग्रीष्मावकाश में तो देते नहीं । सब तामझाम फ्राड की तरफ उंगली उठाता है । शिक्षक का सम्मान सरकार की नजरों में कैसा है राज्य के पिछले शिक्षा मंत्री ने अपने घर पहुंचे शिक्षक संघ पदाधिकारियों के साथ जो सलूक किया था उससे सिद्ध हो गया । उस व्यवहार को कोई भी शिक्षक ताउम्र नहीं भूलेगा और वह मंत्री भविष्य में जहां से भी चुनावों में खड़ा होगा वहां उसे एहसास कराने में अपने स्तर पर कोई कोर कसर न छोड़ेगा । उस दिन वहां दो सौ लोग घूम रहे थे वे बुरे नहीं लगे क्योंकि वे तो कार्यकर्ता थे । बस पांच राष्ट्र निर्माता अध्यापक ही नहीं सुहाये । उन्हें कमरे में धकेल कर धमकाते और खुद ही वीडियो बनवाते समय सत्ता का गुरूर चरम सीमा पर था । वहीं वो जुमला दोहराया था मेरे घर को नाथी का बाड़ा समझ रखा है क्या? इन अपमानजनक हालातों के बीच कोई खबर रेगिस्तान में भटकते मुसाफिर को शीतल जल से भरी मटकी की तरह मिल जाती है । बांसबाड़ा के विज्ञान अध्यापक का तबादला जब बामणवास दौसा में हो जाता है तो चालीस छात्र टी सी कटवा कर गुरू जी के साथ ही नये स्कूल में आकर प्रवेश ले लेते हैं । बच्चे उनके पढ़ाने की विधियों के इतने कायल हैं कि उनसे दूर नहीं रहना चाहते । चुरू जिले के आबड़सर गांव के सरकारी सीनियर स्कूल में बोलांवाली तहसील सँगरिया का निवासी युवा विजय सिंह ज्याणी पी टी आई है । वह कितना अच्छा काम कर रहा होगा तभी तो उसे एक साल की सरकारी कोचिंग हेतु बेंगलुरु भेजा जा रहा है । उसे एक साल के लिये दी जा रही विदाई के समय का वीडियो आंखों में आंसू ला देता है वहीं हर शिक्षक की छाती गर्व से ऊंची उठ जाती है कि कोई करे ना करे कर्तव्यनिष्ठ अध्यापक का सम्मान शिष्य तो करते हैं ।
राजस्थानी भाषा को समर्पित एक सरदार :रूपसिंह राजपुरीरूपसिंह राजपुरी इस अंचल में ही नहीं देशभर में राजस्थानी भाषा के एकमात्र सिख कवि हैं जो विदेश में भी कवि सम्मेलनों के दौरान राजस्थानी का परचम फैलाते हैं ।अब तक सिंगापुर,मलेशिया हांगकांग,थाईलैंड दुबई,शारजाह व आबूधाबी सहित अरब अमीरात के सभी राज्यों सहित ग्यारह देशों की यात्रा कर चुके है ।वे बताते हैं विदेशों में रह रहे राजस्थानी अपनी मातृभाषा के लिये तरसते हैं जब कोई कवि उनकी भाषा में काव्यपाठ करता है तो वे दूर दूर से उसे सुनने पहुंचते हैं ।चालीस वर्ष की सरकारी सेवा से सेवानिवृत होकर रावतसर में रहकर साहित्य साधना कर रहे हैं । अखबारों में व्यंग्य लेखों के कॉलम सहित देश भर की साहित्य पत्रिकाओं में छप रहे हैं ।कविता हास्य में व कहानी मार्मिक अंदाज में लिखकर बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दे रहे हैं ।अब तक हिंदी ,राजस्थानी व पंजाबी भाषा में विभिन्न विधाओं की बीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन राजस्थानी हास्य व्यंग्य कवि के रूप में विशेष पहचान बनी है । टीवी के विभिन्न चैनलों व आकाशवाणी से भी काव्यपाठ करते हैं ।कुछ विडिओज में ख्याली सहारण के साथ अभिनय भी सराहनीय रहा है ।स्काउटिंग गाइडिंग आंदोलन के साथ गहरे तक जुड़े हैं अब भी स्काउट शिविरों में वर्दी पहनकर सेवाएं देते हैं ।ख़ुद ने इस विषय में उच्चतम योग्यता हिमालय बुड वैज हासिल किया है ।रोटरी क्लब ,भारत विकास परिषद सहित अनेक समाजसेवी संस्थाओं से जुड़ाव है ।रावतसर में स्थित वर्द्धाश्रम के संचालक मंडल में रहते हुए समाज के तिरस्कृत व्यक्तियों की सेवा करते हैं ।सेवा निवृत्ति के बाद भी विभिन्न सरकारी विधालयों की प्रबन्ध समिति में विधायक कोटे से सदस्य रहते हुए अपने अनुभवों का फायदा शिक्षा क्षेत्र में दे रहे हैं ।जिला शांति समिति व पुलिस की सी एल जी का सदस्य होने के कारण कानून व्यवस्था के सम्बन्ध में दिए सुझावों को जिला प्रशासन भी ध्यान से सुनता है । साहित्यिक योग्यता के कारण जिला प्रशासन द्वारा प्रकाशित किये जा रहे जिला गजेटियर के सम्पादक मंडल में रूपसिंह राजपुरी को स्थान दिया है और उनकी अनेक रचनाएं उसमें सम्मलित की गई हैं । रावतसर में शहीद स्मारक समिति के अध्यक्ष हैं और शहीद भगत सिंह की विशाल आदमकद मूर्ति नगर के ह्रदय स्थल पर लगवाने में इनकी विशेष भूमिका रही ।हर वर्ष तेईस मार्च को वहां विशाल मेला लगता है और तिरंगा यात्रा निकलती है । 15 अगस्त 1954 को संगरिया तहसील के गांव मोरजंड सिक्खान में जन्में रुपसिंह राजपुरी का बाल्यकाल घोर अभावों में बीता ।अपनी मेहनत के बलबूते समाज में सम्मानजनक स्थान बनाया और काव्य पाठ हेतु राजघरानों से आमंत्रण भी मिले ।
हर इच्छा मेरी सपना बनके, रही अधूरी बाला जी ।इच्छा पूर्ण नाम तिहारो कर दो पूरी बाला जी ।भक्तों के तुम रक्षक बनकर सदा सहाई होते हो ।सच्चे की तुम बांह पकड़ते पाप की नाव डुबोते हो।संकट मोचक बन कर आओ क्या मजबूरी बाला जी------हर इच्छा मेरीतुम तो सब के मन की जानों तुम से बात छुपाएं क्या ।तेरे दर को छोड़ पवनसुत और के दर पे जाएं क्या ।अपनी शरण में ले लो हमको अब क्यों दूरी बाला जी ----हर इच्छा मेरीमन का पंछी भटकन में है उसे सहारा मिल जाये ।उजड़ा चमन उम्मीदों का है, अब यह बगिया खिल जाये।आस अधूरी, प्यास अधूरी, मिले सबूरी बाला जी____हर इच्छा मेरीतेरे होते एक बेचारा, कितने दुखड़े सहता है।रावतसर में राजपुरी तेरा भगत निराला रहता है ।तन मन उसका फीका पड़ गया, करो सिंधुरी बाला जी ।।।।।।।।।16-4-2022
बेटीबेटी भेजी राम ने, बेटी है वरदान ।बेटी पगड़ी बाप री,मूछां रो अभिमान।बेटी खेलै आंगणै,मुलकै कुल परिवार।बेटी बूंटो खुसी रो,बेटी तीज तियोंहार ।बेटी कम ना पूत सयूँ,रोशन करती नाम।बेटी जो ना कर सके ,ऐड़ो कुनसो काम ।बेटी सुख रा धाम है ,बरकत रो भंडार।मत मारो रै कोख मैं, रुसै लो करतार ।। -----रूप सिंह राजपुरी
कौन गटक रहा है आजादी का अमृत आज 15 अगस्त है । सब देश वासियों को इस राष्ट्रीय पर्व की शुभकामनाएं । पचास साल से बड़ों को आज भी स्कूल का वो जमाना याद होगा जब अलसुबह चार बजे स्कूल पहुंच जाते, फिर बड़े जोश के साथ गांव भर में गुरुजनों के मार्गदर्शन में प्रभात फेरी निकालते और 'आज क्या है?'- 'पन्द्रह अगस्त' ,'महात्मा गांधी' - 'अमर रहे' ,'चाचा नेहरू'- 'जिन्दावाद' के नारे लगा लगा कर गला बिठा लेते थे । मारे खुशी के पूरी रात नींद न आती थी। सुबह स्कूल में ग्रामवासी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने पहुंचते । बच्चों को इनाम और लड्डू मिलते । बाद में टीवी आया जोश ठंडा पड़ने लगा । घर के पास स्कूल होने के बावजूद लोग घर में बैठे रहते या गांव में ताश खेलते रहते । इस साल फिर वही पुराना जोश दिख रहा है । हमें अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए 75 वर्ष हो गए । इस अवसर को आजादी का अमृत महोत्सव मान कर बड़े जुनून के साथ मनाया जा रहा है । जिधर भी देखो तिरंगे ही तिरंगे नजर आ रहे हैं । महलों, कोठियों, बंगलों व गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से लेकर झोंपड़ियों तक आन, बाण और शान के साथ तिरंगा लहरा रहा है । महंगी गाड़ियों से लेकर साइकिल तक लगा है । लगता है देश वासियों में देश प्रेम हिलोरें ले रहा है । हम भारतवासी होने का गौरव पर्व मना रहे हैं । आम संगठन और राजनीतिक दल अपनी तरफ से झंडे बांट रहे हैं । सब धर्मों ,जातियों, सम्प्रदायों के लोग तिरंगा रैलियों में बढ़चढ़ कर भाग ले रहे हैं । हो भी क्यों न देश सबका है । बीच बीच में खीर में नमक की तरह कोई वीडियो आ जाता है जब गरीब तबके की औरतें बताती हैं कि राशन डिपो वाला हमें जबरदस्ती बीस रुपये का तिरंगा बेच रहा है जो पैसा नहीं दे रहा उसका राशन काट लेता है ।डिपो होल्डर साहब से दरयाफ्त किया गया तो उसने बताया ऊपर से मिले मौखिक आदेशों के कारण ऐसा किया जा रहा है । ये ऊपर से इशारे कर के देशभगति की भावना में भी मुनाफाखोरी की कुंडी लगाने वाले जयचंदों के कारण बाहर से आने वाले यहां कब्जा जमा लेते थे । कई वास्तविक गरीब मुफ्त झंडा बाटनेवालों से स्वभाविक सवाल करने लगते हैं कि झंडा लगाने का बहुत मन है साहब, लेकिन घर नहीं है । अपने घर का सपना लेकर हमारे पुरखे चले गए । लगता है हम भी चले जायेंगे । झन्डा कहां लगाएं ? तब उन्हें यही सुनने को मिलता है तुम्हारे पुरखों ने आजादी संग्राम में भाग लिया था क्या ? जिन्होंने लिया था उनमें से जो समझदार थे वे पदों पर काबिज हो गए । कुछ असली स्वतंत्रता सेनानी वाली कुछ सौ रुपयों की पेंशन पाकर घर बैठकर पोतों नातियों को जेलों के क्रूर किस्से सुनाते रहे । कुछ के हाथ देश की बागडोर लगी । जिनके भगतसिंह जैसे लाल फांसी के फंदे पर झूले वे सत्ता की मलाई से दूर रहे । जिनके कपड़े तब पेरिस से धुलकर आते थे आज भी उनके वारिसों के पास कई शहरों में इतनी बड़ी बड़ी इमारतें हैं कि एक भवन का किराया ही दो दो करोड़ रुपये माहवार आ रहा है। और तुम पिचत्तर साल गुजर जाने के बाद भी अपना झोंपड़ा नहीं खड़ा कर सके तो किसका कसूर है ? हम से भी बाद में कई देश अंग्रेजों के चंगुल से निकले हैं वे हर मामले में हम से आगे हैं । सिंगापुर 1965 में आजाद हुआ हमारी तरह वहां भी अंग्रेज विभाजन की चाल चल गये । जाते जाते मलेशिया को सिंगापुर से अलग कर गये । वे दोनों देश समझदार हैं ।आपस में लड़ते नहीं । एक दूसरे के यहां आतंकवादी व घुसपैठिये नहीं भेजते । सीमा पर तनाव नहीं रहता ।गोलीबारी नहीं होती । सीमा विवाद का झंझट नहीं । भारत पाकिस्तान अन्य मदों से काट कर जितना रक्षा बजट पारित करते हैं वे देश उतना पैसा विकास पर लगाते हैं ।अपने मूल निवासियों के खातों में सरकार हर साल बचत का पैसा डालती है जो लाखों में होता है।हमारे यहां जन्म लेने वाले हर बच्चे के सिर हजारों का कर्ज विरासत में होता है। हम व्याज उतारने के लिये लोन लेते हैं। वहां देश का पैसा खा कर कोई भागता नहीं । घर विहीन कोई है नहीं ।धार्मिक स्थानों पर भी राष्ट्रीय ध्वज फहरा रहता है ।धार्मिक आडम्बरों का कोई स्थान नहीं । साम्प्रदायिक दंगे वे जानते ही नहीं । दोनों देशों के बीच में समुंदर है । सिंगापुर एक द्वीप है । व्यापार व आवागमन के लिये समुंदर पर पुल बना लिया । मलेशिया के हजारों लोग नौकरी करने सिंगापुर अपनी गाड़ी या बसों से आते हैं, शाम को लौट जाते हैं । दोनों देशों की करंसी की कीमत हमसे बीस तीस गुना अधिक है । वहां लाखों भारतीय रहते हैं । वे विकसित देशों में शामिल हो गए हम आज भी विकासशील कहलाते हैं । हममें से बहुतेरों को तिरंगे से भी नफरत है उसे जलाते फाड़ते हैं । बाकि वार त्योंहार हम देश भगति के रेकार्ड खूब बजाते हैं । तिरंगों से देश अटा पड़ा है । देश की एकता दिखाने के लिये हमने कोरोना में बजा बजा कर थालियां फोड़ दी थीं ।
ਮੁਢ ਕਦੀਮ ਤੋਂ ਮਨੁੱਖ ਸੁੱਖ ਦੀ ਭਾਲ ਵਿਚ ਰਿਹਾ ਹੈ । ਸੱਤ ਸੁਖਾਂ ਦੀ ਗੱਲ ਸਦਾ ਤੋਂ ਚਲਦੀ ਆ ਰਹੀ ਹੈ । ਨਿਰੋਗੀ ਕਾਇਆ ,ਜੇਬ ਚ ਮਾਇਆ ,ਸੁਲੱਖਣੀ ਨਾਰੀ ,ਪੁੱਤਰ ਆਗਿਆਕਾਰੀ ,ਨੀਰ ਨਿਵਾਸਾ,ਨਗਰ ਚ ਵਾਸਾ ਅਤੇ ਰਾਜ ਚ ਪਾਸਾ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੱਤ ਸੁੱਖਾਂ ਦੇ ਇਰਦ ਗਿਰਦ ਹੀ ਜੀਵਨ ਚੱਕਰੀ ਘੁੰਮਦੀ ਰਹੀ ਹੈ। ਰਾਜ ਚ ਪਾਸਾ ਦਾ ਅਰਥ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਸਮੇਂ ਦੀ ਹਕੂਮਤ ਤੁਹਾਡੇ ਪੱਖ ਵਿਚ ਹੋਵੇ।ਰਾਜ ਹੀ ਖਿਲਾਫ ਹੋ ਗਿਆ ਤਾਂ ਜਿਉਣਾ ਮੁਹਾਲ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ ਬਾਗੀ ਹੋਕੇ ਕਿੰਨ੍ਹੇ ਦਿਨ ਜੀ ਸਕਦੇ ਹੋਂ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੱਤਾਂ ਸੁੱਖਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਨੀਰ ਨਿਵਾਸਾ ਅਤੇ ਨਗਰ ਚ ਵਾਸਾ ਬੜੇ ਅਹਿਮ ਤੱਤ ਹਨ।ਪਾਣੀ ਦੇ ਵੱਡੇ ਸਰੋਤ ਕੋਲ ਬਸਤੀ ਵਸਾਉਣੀ ਸਮਝਦਾਰੀ ਹੁੰਦੀ ਸੀ । ਪਾਣੀ ਜੀਣ ਲਈ ਮੁਢਲੀ ਜਰੂਰਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਸਮੂਹ ਵਿੱਚ ਵਸਣਾ ਭੀ ਸੁਰਖਿਆ ਦਾ ਪਹਿਲਾ ਅਸੂਲ ਹੈ ।ਵੱਡੇ ਪਰਿਵਾਰਾਂ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਭੀ ਬਜ਼ੁਰਗਾਂ ਦੇ ਦਿਮਾਗ ਵਿੱਚ ਹਰ ਤਰਾਂ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਅਤੇ ਹਰ ਕੰਮ ਦੀ ਸੁਖਾਲੀ ਕਰਕੇ ਹੀ ਆਇਆ ਹੋਵੇਗਾ । ਮਸ਼ੀਨੀ ਜੁੱਗ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਖਾਨਾਵਦੋਸ਼, ਕਬੀਲੇ ਅਤੇ ਜਾਤੀਆਂ ਦੇ ਮਨੁੱਖੀ ਝੁੰਡ ਹਮੇਸ਼ਾ ਨਦੀਆਂ ਕਿਨਾਰੇ, ਝੀਲਾਂ, ਝਰਨਿਆਂ ਦੇ ਕੋਲ ਹੀ ਵਸੇ। ਸ਼ਿਕਾਰ ਆਦਿ ਕਰਨ ਲਈ ਦੂਰ ਜਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ਪਰ ਪਾਣੀ ਹੱਥ ਦੇ ਹੇਠ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ । ਸਮਾਂ ਪਾਕੇ ਚਿਰ ਸਥਾਈ ਰੂਪ ਵਿਚ ਇਕੋ ਥਾਂ ਵਸਣ ਦਾ ਖਿਆਲ ਆਉਂਦਾ ਗਿਆ ਅਤੇ ਨਗਰ ਵੱਸਦੇ ਗਏ । ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਸਿੰਧੂ ਘਾਟੀ ,ਨੀਲ ਜਾਂ ਚੀਨੀ ਸਭਿਅਤਾ ਦੇ ਸਬੂਤ ਨਦੀਆਂ ਕਿਨਾਰੇ ਹੀ ਮਿਲੇ ਹਨ । ਛੋਟੇ ਪੱਧਰ ਤੇ ਪਿੰਡ ਭੀ ਇੱਸੇ ਖਿਆਲ ਕਰਕੇ ਵਸੇ ਹੋਣਗੇ। ਸਾਲਾਂ ਵੱਧੀ ਪਏ ਵੱਡੇ ਮਾਰੂ ਅਕਾਲ ,ਪਾਣੀ ਖਤਮ ਹੋਣ , ਕੁਦਰਤੀ ਕਹਿਰ ਜਾਂ ਹਕੂਮਤ ਦੀ ਕਰੋਪੀ ਕਰਕੇ ਇੱਕ ਜਗ੍ਹਾ ਤੋਂ ਉੱਠ ਕੇ ਦੂਜੀ ਜਗ੍ਹਾ ਹਿਜਰਤ ਕਰਕੇ ਵਸਣਾ ਪੈਂਦਾ ਸੀ । ਤਦ ਭੀ ਕਿਸੇ ਢੁੱਕਮੀ ਰਾਖਵੀਂ ਥਾਂ ਤੇ ਜਿੱਥੇ ਖੁਦ ਲਈ ਅਤੇ ਸਹੁਲੀਅਤ ਲਈ ਰੱਖੇ ਪਸ਼ੂਆਂ ਦੇ ਢਿੱਡ ਭਰਨ ਲਈ ਕੁਦਰਤੀ ਭੰਡਾਰ ਅਖੁਟ ਹੋਣ ਉੱਥੇ ਹੀ ਦੁਬਾਰਾ ਵਸਿਆ ਜਾਂਦਾ ਸੀ । ਜਿੱਥੇ ਨਦੀਆਂ ਝੀਲਾਂ ਸੋਮੇ ਨਹੀਂ ਸਨ ਜਿਵੇਂ ਮਾਰੂਥਲ ਓਥੇ ਪਾਣੀ ਲਈ ਖੁਦੇ ਖੂਹ ਤਲਾਅ, ਛੱਪੜ,ਢਾਬ,ਬਾਵੜੇ, ਟਾਂਕੇ, ਆਦਿਕ ਸਬੂਤ ਦੇ ਤੌਰ ਤੇ ਅੱਜ ਭੀ ਖੜੇ ਹਨ । ਪਿੰਡ ਵਸਾਉਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਜਿਥੇ ਕੁਦਰਤੀ ਜਲ ਵਸੀਲਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਸੀ ਉੱਥੇ ਖੂਹ ਜਾਂ ਪੱਕੀ ਮਿੱਟੀ ਦੇਖਕੇ ਛੱਪੜ ਤਿਆਰ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਤਾਂ ਜੋ ਮੀਂਹ ਨਾਲ ਸਾਲ ਭਰ ਦਾ ਜਲ ਜ਼ਖੀਰਾ ਰਾਖਵਾਂ ਹੋ ਜਾਵੇ । ਕਈ ਕਈ ਪਿੰਡਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਬਣੇ ਇੱਕੋ ਇੱਕ ਛੱਪੜ ਸਾਂਝੇ ਸਹਿਕਾਰ ਜੀਵਨ ਦੇ ਝੰਡੇ ਬੁਲੰਦ ਕਰਦੇ ਅੱਜ ਭੀ ਦਿਖਾਈ ਦੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ।ਪਿੰਡ ਮੋਰਜੰਡ ਸਿਖਾਂ ਜਦੋਂ ਵਜੂਦ ਚ ਆਇਆ ਓਦੋਂ ਪਾਣੀ ਦੀ ਬਹੁਤ ਘਾਟ ਸੀ । ਆਸੇ ਪਾਸੇ ਟਿੱਬੇ ਬਹੁਤ ਸਨ ਅਤੇ ਆਏ ਦਿਨ ਰੇਤਲੀਆਂ ਹਨੇਰੀਆਂ ਆਉਂਦੀਆਂ ਰਹਿੰਦੀਆਂ ਸਨ, ਜੋ ਕਈ ਕਈ ਦਿਨ ਚਲਦੀਆਂ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਨਾਮ ਭੀ ਪ੍ਰਚੰਡਤਾ ਮੁਤਾਬਕ ਕਾਲੀ ਬੋਲ਼ੀ ,ਲਾਲ ਜਾਂ ਪੀਲੀ ਹਨੇਰੀ ਰੱਖੇ ਗਏ ਸਨ । ਵਾ ਵਰੋਲੇ ਧੁਰ ਅਸਮਾਨੀ ਘੁੱਮ ਘੁੰਮੇਰੀਆਂ ਪਾਉਂਦੇ । ਰੇਤਲੀ ਖੱਖ ਤਾਂ ਚੜੀ ਹੀ ਰਹਿੰਦੀ । ਕਈ ਦਿਨ ਲਗਾਤਾਰ ਹਨੇਰੀ ਚਲਦੀ ਤਾਂ ਜਨ ਜੀਵਨ ਠਹਿਰ ਜਾਂਦਾ । ਰੇਤਲੀ ਮਾਰੂਥਲ ਧਰਤੀ ਪਾਣੀ ਨੂੰ ਸੋਖ ਜਾਂਦੀ ਸੀ।ਹਰਿਆਲੀ ਦੇਖਣ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਮਿਲਦੀ ਸੀ ।ਰਾਜਪੁਤਾਨੇ ਵਿੱਚ ਜੰਡ ਦਰਖਤ ਬਹੁਤ ਹੁੰਦੇ ਰਹੇ ਹਨ ਉਹ ਇੱਥੇ ਭੀ ਸਨ । ਪਿੰਡ ਦਾ ਨਾਉਂ ਭੀ ਇੱਸੇ ਦਰਖਤ ਕਾਰਨ ਰਖਿਆ ਗਿਆ ਹੈ । ਇੱਥੇ ਹੇਠਲਾ ਪਾਣੀ ਬਹੁਤ ਖਾਰਾ ਸੀ । ਪਿੰਡ ਦੀ ਮਿੱਠੀ ਹੇਠਾਂ ਤਕ ਰੇਤਲੀ ਸੀ ।ਟੋਬਾ ਬਣਾਉਣਾ ਅਕਲਮੰਦੀ ਨਹੀਂ ਸੀ । ਖੂਹ ਪੁੱਟ ਕੇ ਦੇਖ ਲਿਆ ਸੀ ਜਿਸ ਵਿਚੋਂ ਜਹਿਰ ਵਰਗਾ ਖਾਰਾ ਪਾਣੀ ਨਿਕਲਿਆ ਸੀ । ਅੱਜ ਭੀ ਪਿੰਡ ਦੇ ਪਹਾੜ ਵਾਲੇ ਪਾਸੇ ਖੜਾ ਹੈ ਅਤੇ ਖਾਰਾ ਖੂਹ ਦੇ ਨਾਂਓਂ ਤੋਂ ਜਾਣਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਆਸੇ ਪਾਸੇ ਕਈ ਪਿੰਡ ਵਸ ਚੁੱਕੇ ਸਨ ।ਸੰਗਰੀਆਂ,ਧੌਲੀਪਾਲ,ਲੀਲਾਂਵਾਲੀ,ਬੋਲਾਂਵਾਲੀ, ਨੁਕੇਰਾ ਆਦਿਕ ਪਿੰਡ ਪੁਰਾਣੇ ਹਨ । ਪਰ ਖੂਹ ਕਾਮਯਾਬ ਨਹੀਂ ਹੋਏ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਪਿੰਡਾਂ ਦੀ ਪਾਂਡੋ ਮਿੱਟੀ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਛੱਪਡਾਂ ਦਾ ਪਾਣੀ ਵਧੀਆ ਕੰਮ ਸਾਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਬਹੁਤ ਸਾਲਾਂ ਤਾਈਂ ਦੂਜੇ ਪਿੰਡਾਂ ਤੋਂ ਪਾਣੀ ਮਿਲਦਾ ਰਿਹਾ ।ਸਿਰ ਤੇ ਘੜੇ ਰੱਖ ਸੁਆਣੀਆਂ ਮੀਲਾਂ ਦੂਰ ਤੋੰ ਪਾਣੀ ਲਿਆਉਂਦੀਆਂ ।ਊਠਾਂ ਤੇ ਚੌਕੜ ਪਾਕੇ ਜਾਂ ਬੋਰੇ ਚ ਦੋ ਤੌੜੇ ਰੱਖ ਕੇ ਭੀ ਪਾਣੀ ਢੋਇਆ ਜਾਂਦਾ ।ਇਹ ਉਹ ਜਮਾਨਾ ਸੀ ਜਦੋਂ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ਘਿਓ ਸਸਤਾ ਤੇ ਮਹਿੰਗਾ ਪਾਣੀ ।
लाउडस्पीकर हाजिर होलगता है जल्दी ही धार्मिक स्थलों पर बोलते लाउड स्पीकरों की बोलती बंद होने वाली है ।सरकार के हाथ उनके गले तक पहुंच गए हैं । यूपी ,दिल्ली और महाराष्ट्र में स्थानीय स्तर पर प्रशासन इन्हें उतारने भी लगा है ।साम्प्रदायिक दंगों का ठीकरा इन्हीं लाउडस्पीकरों के सिर फोड़ा जा रहा है ।लगातार दंगों के बाद सरकारों का मानना है कि अगर ये न होते तो इतने बलवाई इकट्ठे न होते और आगजनी व फसाद को हवा न मिलती । जब एक आस्था केंद्र से धार्मिक उद्यघोष होता है उसके प्रतिउत्तर में दूसरे धार्मिक स्थल से दुगने जोश के साथ अपना धार्मिक नारा बुलंद किया जाता है इसी को खुद के धर्म पर हमला मानने से उन्माद फैलता है । यह विरोध की आवाज इन स्पीकरों की सवारी करके ही दूसरे समुदाय तक पहुंचती है। लगता है धर्मों की मुठभेड़ हो रही है । इस लिये चोर की मां यही लाउडस्पीकर हैं पहले इन्हें उतारा जाये । सरकारों की खुद की नाकामी इन दंगों को रोकने में किस हद तक रहती है उस पर कभी विचार नहीं होता । नानी खसम करे दोहिता चट्टी भरे। रेल गाड़ी के आगे कूद कर कोई जान दे दे तो कसूर रेलगाड़ी का कहां होता है ? लाउडस्पीकर को माध्यम बना कर कोई शरारत करता है तो दोषी वह है ।आजादी के बाद लाउडस्पीकर हमारी आधुनिक संस्कृति का अहम हिस्सा हो गया है। उससे पहले ग्रामोफोन होता था जिसे आज की पीढी नहीं जानती । कमरे भर के लिये आवाज काफी होती थी । बिजली या बैटरी का झंझट न था । चाबी भर कर सुई लगा हाथ -यंत्र कोलतार के रिकार्ड पर रखा जाता था और साथ ही जुड़े पीतल के धत्तू से मधुर आवाज गूंजती । यह अमीर और शौकीन लोगों का प्रिय होता था । मेड इन इंगलैंड इस यंत्र को रखने वाले को गांव के लोग इज्जत की दृष्टि से न देखते थे । वह अपने जमाने का परिष्कृत म्यूजिक सिस्टम था। बाद में आये बड़ी बैटरी से चलने वाले बड़े और जोरदार आवाज वाले जिन्हें लाउडस्पीकर कहा जाता है । धार्मिक और मांगलिक कार्यक्रमों में इनकी उपस्थिति अनिवार्य हुई है। पंजाबी विवाहों में छत पर चारपाइयाँ खड़ी करके बांधा जाता और पहला गीत यमला जट्ट का 'सतगुर नानक तेरी लीला न्यारी' गूंजता तो पड़ोस के गांव वाले भी सुनने के लिये दौड़े आते । गुरुद्वारों में गुरबाणी का पाठ,मंदिरों से चौपाइयों,गायत्री मंत्र व हनुमान चालीसा का जाप और मस्जिदों से अजान व तिलावते पाक सुनने को मिलती रही है। अजान में कहा जाता है 'हय्या अल फला'अर्थात अंधेरे से रोशनी की ओर आओ । यह सनातन धर्म के श्लोक 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' से अलग कहां है ? यही स्पीकर अनाउंसमेंट के साधन भी बने।किसी की बकरी गुम हो जाती तो गुरुद्वारे के स्पीकर से 'बेनती 'की जाती । सांझा खाला साफ करना,किसी के कोई मर गया तो अंत्येष्ठि की सूचना, विवाह में दूध पहुंचाने का आग्रह इसी स्पीकर के माध्यम से होता रहा है । पोलियो की दवाई पिलाने और पटवारी साहब के गांव में पधारने की सरकारी घोषणा यही स्पीकर करता रहा है ।अब इसका रूप बदला है । अब यह डी जे हो गया । जो कान फोड़ू आवाज करता है । नई पीढ़ी इसी की दीवानी है । बारात लड़की वालों के घर कितनी लेट पहुंच पायेगी डी जे पर निर्भर करता है । जो लड़का कभी बाथ रूम में भी नहीं नाचा होता वो डी जे की धुन पर नागिन सा नाचता है। नए गीतों गानों और डांस की जान इसी स्पीकर में बसी होती है । गीत संगीत का अरबों रुपयों का बिजनेस इसी पर अभिलम्बित है ।अफसोस इसी स्पीकर को धार्मिक कटुता का जनक मान लिया उसे छुट्टी पर भेजने की तैयारी की जा रही है ।जिस गंगा जमुनी सभ्यता का हम हिंदुस्तानी दुनिया के सामने दम भरते और गर्व करते रहे हैं वही गंगा और जमुना देश के कई हिस्सों में सौतियाडाह से भयंकर रूप से ग्रस्त हैं । अपने अपने धार्मिक झंडे उठा रखे हैं । तलवारें खींच ली हैं । महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से कहा है जब अजान होगी तो मस्जिदों के बाहर दुगनी आवाज में हनुमान चालीसा बजाया जायेगा । बताइये यहां कसूर स्पीकरों का है या छिछली राजनीति का । सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद वहां की सरकार बैमनस्य फैलाने के एक्ट में उन पर कार्यवाही नहीं कर रही । आखिर विचारधारा अलग होने के बावजूद राज और उद्धव ठाकरे हैं तो चचेरे भाई ही । जिस राजस्थान में बंटवारे के समय एक भी लाश नहीं बिछाई गई वहां करोली में और अब अपनी मस्ती में मस्त रहने वाले शहर जोधपुर में दो समुदायों के आमने सामने होने की नौबत आ गयी ।पत्थर बरसे ,लाठीचार्ज हुआ । पंजाब में हिन्दू सिख सांझ को ललकारा गया । पटियाला में जो कुछ हुआ वह भविष्य में घातक नासूर न बन जाये। दिल्ली यूपी में धार्मिक यात्रा निकालना खतरे का काम हो गया । आम शहरी डरने लगा है क्या पता कब पत्थर बरसने शुरू हो जायें । गोली न चल जाये। पुलिस वाले लाठीचार्ज के समय दोषी व निर्दोष को धक्के चढ़ने पर एक नजर से ही देखते हैं । उन्होंने मार मार कर कानून व्यवस्था लागू व शांति बहाली करनी होती है । लेकिन मजे की बात यह है कि दंगे के बाद परिस्थितियां बिगड़ने पर कर्फ्यू लगाने की सूचना क्या कानों कान दी जाएगी उसके लिये लाउडस्पीकर ही काम में लिया जायेगा। चुनावों में नेता गला फाड़ सार्वजनिक सभाएं करने के लिये स्पीकर में नहीं बोलेंगे का ? वोट लेने के लिये हिन्दू मुस्लिम भाई भाई बोल सकते हैं तो बाद में दूसरे सम्प्रदाय के लोगों से बू क्यों आने लगती है । उनके तीज त्योंहारों के समय वे शत्रु क्यों दिखने लगते हैं । उनके त्योंहार पर उनके वहां जाकर लाउडस्पीकर पर नाच गाना करें 'जिंदगी चार दिनां दी 'और माहौल खुशनुमा बना दें ।
कुत्ता खस्सी करा लो सभी सरकारें रोनी सूरत बना कर बोलती रहतीं हैं -खजाना खाली है । जिन घाघ अफसरों के हाथ में सरकारी नकेल रहती है वे तब भी नए प्रपोजल बनाकर मंत्रियों के पास भेजते हैं । उनसे डिसकस करते हैं।नफा नुकसान समझाते हैं और फाइल पास करवाके ही लौटते हैं । बानगी के तौर पर शहरी कच्ची बस्तियों के घरों का मल जल बड़ी पाइपों द्वारा शहर से बाहर जल शोधन संयंत्र तक ले जाया जाये ,वहां पानी साफ करके सिंचाई के लिये किसानों को बेचा जाये । इससे स्वायत्तशासी संस्थाएं आत्म निर्भर होंगी । यह एक सब्जबाग था । फटाफट करोड़ों का बजट पास हुआ, ठेके छूटे, काम शुरू हुआ । गलियों को खोखली करके बड़ी बड़ी पाइपें धरती में दबाई गयीं । अभी ट्रीटमेंट संयंत्र तक पहुंची ही नहीं थीं कि किसी निरीक्षणकर्ता ने पाया कि पाइपों का लेबल सही नहीं है । शहर सड़ जाएंगे । नागरिक मारे बदबू के भाग खड़े होंगे ।योजना ठप्प हो गयी । सब को अपना हिस्सा जरूर मिल गया होगा । करोड़ों रुपयों का माल मिट्टी में दबा पड़ा है । पाइपों पर बनी सड़क अब भी ढोल सी बजती सुनी जा सकती हैं । शायद ही किसी शहर में योजना सफल हुई हो । ऐसी और बहुत योजनाएं मिल जाएंगी, जिनसे जनहित तनिक भी नहीं हुआ बजट ठिकाने लग गया । कितनी हास्यस्पद योजना है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिये नसबन्दी करवाने वाले को अनुग्रह राशि दी जाये । लेकिन बच्चा पैदा करने पर उससे ज्यादा रुपये दिये जाते हैं । इतना अंक गणित तो अपने यहां के लोग जानते ही हैं कि घाटा क्यों उठायें । नसबन्दी की बजाय जन्मदर बढ़ाये रखना ही फायदेमंद है । नसबन्दी से याद आया इन दिनों कुत्तों की नसबन्दी चर्चे बटोर रही है । दशकों पहले कभी कुत्ते मारने का अभियान चला था । आवारा कुत्ते सदा ही जी का जंजाल रहे हैं । रात विरात आना जाना खतरे से खाली नहीं रहता । झुंड के झुंड बैठे गुर्राते रहते हैं । पहली रोटी गाय की आखरी कुत्ते की कहने और विश्वास रखने वाले पुण्य कमाते हुए आवारा कुत्तों को ललचाए रखते हैं । पागल कुत्ते के काटने और नाभि में इंजेक्शन लगवाने की पीड़ा जिसने सही है वह जानता है टीके का उतना दर्द नहीं होता जितना सुंडी में सुई की कल्पना डराती है ।गांवों में हड्डा रोड़ी के कुत्ते बहुत खतरनाक होते हैं । अकेला आदमी देखकर हिंसक हो जाते हैं । उनके लहू मुंह लग चुका होता है जैसे भृष्ट अफसर के रिश्वत। शहरों में मोटरसाइकिल वाले के पीछे दूर तक दौड़ते है । वाहन तेज दौड़ाया जाता है रिले रेस के धावकों की तरह आगे और तैयार मिलते हैं । देवयोग ही माना जायेगा अगर दुर्घटना न हो ।कुत्ते मारने के अभियान में जहरीला गुलाब जामुन कुत्ते के आगे डाला जाता था । खाते ही मर जाता नगर पालिका की गाड़ी उन्हें दूर ले जाकर पटक देती । फिर कोर्ट और जानवर अधिकारों के संरक्षक जागे इस तरह मारना बंद करवाया । किसी ने कुत्तों की नसबन्दी का सुझाव दे दिया ।सुझाव कारगर है । न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी । धीरे धीरे कुत्ते कम हो जाएंगे ।नागालैंड की तरफ कुत्ते और बिल्लियां देखने को कम ही मिलती हैं वहां के लोग इन्हें मारकर खाते हैं ।वे कभी इधर आएं तो इतने कुत्ते देखकर 'हाबड़के' से खुद मर जायें । वैसे जनसंख्या नियंत्रण के लिये नसबन्दी पर जो काम हुआ उससे तो स्थिति काबू में आ जानी चाहिये थी । अफसोस हम देखते ही देखते एक सौ पैंतीस करोड़ से ज्यादा हो गये । जबकि इस काम के लिये जबरदस्ती भी कर ली और लालच भी दे लिये । कुत्तों पर काम चालू हुआ ही है भृष्टाचार की बदबू फैल भी गयी । सुना है गंगानगर में यह ठेका लाखों का है। ठेकेदार के कारिंदे घपलेबाजी पर उतर भी आये। वे कुत्ते पकड़ कर भी ले गये और वापिस पुरानी आबादी के पंचमुखी मंदिर के पास बाईज्जत वैसे के वैसे छोड़ भी गये । किसी अनुभवी पारखू को पता चल गया कि नसबन्दी नहीं हुई । शिकायत हुई । बयान दिये गये। ठेकेदार से पूछताछ होगी । अनुभव कहता है जांच रिपोर्ट में लिख दिया जायेगा उन कुत्तों की उम्र और वजन थोड़ा था इसलिये बंध्याकरण नहीं किया ।घपलेबाजी के आरोप निराधार हैं । आवारा कुत्ते इलाका बदलते रहते हैं । कौन रोज उन्हें पकड़ कर पेश करेगा । सभापति के मेज पर लिटा कर दिखायेगा भ्र्ष्टाचार आदि जुगादि है । यह फाइलों से शुरू होकर फाइलों में छुप जाता है । अगर इस योजना में पारदर्शिता रखी जाये, पूरी मॉनिटरिंग हो, समुदाय से भी निगरानी करवाई जाये तो यह समाज हित में बड़ा काम होगा । कमीशनखोर अफसर या बाबू भी कभी सुबह की सैर को निकलते होंगे किसी दिन उनकी पैंट फाड़ दी उस दिन लगेगा ईमानदारी से यह काम किया होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता । हो सकता है सुंडी में टीके लगवाने तक नौबत आ जाये । साधो ! जब तक दबंगों के आगे पूंछ हिलाने और कमजोर पर गुर्राने वाली दफ्तरी पीढी की नसबंदी नहीं होगी यह कुत्तेखाणी यूं ही चलती रहेगी ।
तूड़ी की जैड सुरक्षा जाते सीजन नरमे का आश्चर्यजनक भाव फिर सरसों की बम्पर पैदावार,इस बार भगवान ने कनक निकालने के लिये कई सालों बाद सहानुभूति पूर्वक अतिरिक्त समय दिया । अगर फिर भी किसी आलसी किसान के कनक खड़ी थी अंत अप्रैल तक उसे थोड़ा बहुत खड़का बड़का करके डराया और कहा चेत जा और खेत जा । इन हालातों को देखकर कोई नहीं कह सकता कि खेती अब घाटे का काम है ।अगर फिर भी कमी लगती है तो भादरा तहसील के किसी भी किसान से "खुल जा सिम सिम" का कोडवर्ड पूछा जा सकता है अर्थात फसल बीमा योजना की जानकारी ली जा सकती है । प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पूरे देश के किसानों के लिये है लेकिन पूरे देश में सर्वाधिक अरबों रुपये एक ही तहसील भादरा के किसानों के खातों में आये हैं । जिस रेतीले खेत में आज तक दो सेर दाने नहीं हुए उसका भी लाखों रुपये मुआवजा ले रहे हैं । जीवन स्तर सुधर गया । नोहर और भादरा को आम तौर पर बारानी माना जाता है जबकि इस योजना ने यहां के किसानों की किस्मत बदल दी । अन्य तहसीलों के किसान अभी भी किसान क्रेडिट कार्ड ,के सी सी और अन्य कर्जे लेने के लिये बैंकों की लाइनों में लगते हैं । इसके लिये जनप्रतिनिधि जागरूक होने चाहिये। बैंक या कंपनी जरा सी देर कर दे तो वहां के नेता के एक बुलावे पर दस बीस हजार किसान बैंक के आगे इकट्ठे होने में देर नहीं लगाते । भादरा विधायक हरियाणा में जाकर तूड़ी पर लगी रोक हटाने के लिये सिरसा के कलेक्टर को खरी खरी सुना आया । कह दिया हरियाणा से बाहर तूड़ी जाने पर जो रोक लगा रखी है उसे उठायें अन्यथा यहां धरना लगाया जायेगा । अगर ऐसा होता है तो यह अभूतपूर्व बात होगी । पर अगला कामरेड है । दूसरे स्टेट की मनमर्जी के खिलाफ भी बोलेगा । वहां से बाहर तूड़ी ले जाने पर तीस चालीस हजार रुपये का चालान किया जा रहा है जबकि पहले वहां की तूड़ी से राजस्थान के गौधन का पेट भर रहा था और वहां के किसानों को भी आमदन हो रही थी। अब सोचने की बात है तूड़ी के भाव आसमान पर जा टँगे हैं । तूड़ी मुहावरों में हल्की चीज के रूप में जानी जाती रही है "आज मेरी तूड़ी हो गई" या "तेरी तूड़ी कर दूंगा" कहने के पीछे तुच्छता का भाव होता था । वही तूड़ी राजस्थान के कुछ जिलों में बीस रुपये किलो अभी से हो गई । जबकि तंगी का समय तो आगे आना है । तूड़ी की मारामारी हो रही है लोग सोचने लगे हैं कि पशु रखें या छोड़ दें । पहले खेती के साथ पशुपालन सहायक धंधा था ।अब घाटे का सौदा है । खल भी कह रही है हाथ न लगा ।अस्सी के दशक तक किसान तूड़ी ,बनछटी दूसरों के घरों तक छोड़कर आते थे कि इतनी का हम क्या करें। यह चीजें मोल बिकने का तो सोचा भी न था । आगामी फसल के लिये खेत तैयार करने की जल्दी होती थी । दो चार बोरे तो कभी भी सम्भाली हुई में से मांगने पर दे देते थे । सरसों का गूना जी का जंजाल रहता था कि इसे खपायें कहां ।अब ईंटभट्टों पर बेचने से आम के आम गुठलियों के भी चोखे दाम मिल रहे हैं । सामाजिक समरसता भी टूट रही है ।अब कोई टोकरा तूड़ी मांग ले तो बहाने बाजी पर उतरना पड़ता है । सारा साल सड़कों पर विशालकाय तूड़ी लोडिड ट्रालियां परिवहन करती हैं । अगर संकड़ी सड़क पर चारों तरफ भूंग निकाले कमरे का कमरा चल रहा है तो पीछे साधनों वाले कितने भी हॉर्न बजायें कोई फायदा नहीं ।सोशल मीडिया पर चर्चा छिड़ गई है कि सरकार लगभग अठाइस तीस रुपये गेहूं खरीद कर हट्टे कट्टे लोगों को दो रुपये किलो बेच सकती है तो बेजुबान पशुओं के लिये दो रुपये किलो तूड़ी नहीं दे सकती? मजे लेने वाले कह रहे हैं अगर हरियाणा तूड़ी पर बेन कर रहा है तो राजस्थान वाले वहां प्याज न भेजें ।यूपी वाले गुड़ भेजना बंद करें और बिहार वाले 'रिश्तेदारी' न करें क्योंकि चालीस साल के छड़े रूंडे खूंडे वहीं मिलते हैं ।दिल्ली वाले पराली जलाने का दमघोटू प्रदूषण न सहेंगे अब कौन जलाएगा, सब तूड़ी बनाकर बेचेंगे । अगर तूड़ी का महत्व इसी तरह बढ़ता गया तो हो सकता है चाय नमक के पॉलिथीन पैकेट्स की तरह किलो तूड़ी भी इसी तरह न बिकने लग जाये ।
गैंगस्टर तो यूं ही बदनाम हैं हमारे सार्वजनिक पड़ोसी गिरधारीलाल जी डिप्रेशन के मरीज सा बड़बड़ाते हुए हमारे गरीब खाने में तशरीफ़ लाये और आते ही शुरू हो गये, बोले 'अब तो कश्मीरी पंडितों की तरह पलायन करना पड़ेगा लेकिन जायें तो किस जम्मू में जायें? यहां रहना अब दूबर हो रहा है ।' मैंने जब पूछा कि 'क्या हुआ, क्यों फिक्रमंद हो रहे हो ' तो बोले 'यह पूछो क्या नहीं हुआ ? अरे राजस्थान की पावन पवित्र धरा का हर आम आदमी सीधा-सादा , सरल और मेहनती है जो किसी तरह दो जून की रोटी का मुश्किल से जुगाड़ करता है । यहां भी गैंगस्टर पैदा हो गये जो सीधे मंत्री से ही 75 लाख रुपये फिरौती मांग रहे हैं अन्यथा उनके परिवार को मारने की धमकी दे रहे हैं ।आम बन्दे का क्या होगा?' 'आप चिंता क्यों करते हैं।' मैंने कहा 'हमारे विधायक के रूप में चुन कर भेजे दो सौ बब्बर शेर अब खूब खा पीकर,मोटे ताजे होकर, ऐश आराम करके बाहर आये हैं वे सब सम्भाल लेंगे । जरा राज्य सभा चुनावों की जीत हार का विश्लेषण कर लेने दो ।'अब गिरधारी लाल जी ने बात का रुख मोड़ लिया, ढीले पड़ते हुए बोले ,'बाड़ाबंदी के भी क्या ठाठ होते हैं । सुना है एक विधायक एक दिन में चार हजार का तो भोजन खा जाता था जबकि उनमें से कितने बुढऊ शुगर,बी. पी. और अन्य बीमारियों के मरीज होंगे। बाकि ऐशो आराम का एक विधायक पर बीस हजार रुपये प्रतिदिन खर्च आ जाता था । जो मांगो हाजिर होता था । हम तुम तो फाइव स्टार होटल की केवल फोटो देख लिया करो भीतर जाने के लिये किसी बाहरी श्रोत से आया पैसा जेब में होना चाहिये अन्यथा कोई दीवार के भी हाथ न लगाने देगा । मेहनत मजदूरी करने वाला वहां के सुइट, मसाज पार्लर ,पलंग,तौलिये ,बाथ रूम ,तरणताल और खाने की वैरायटियां सपने में भी नहीं देख सकता । भाग्य से मिलता है ऐसा अवसर । जब पैसे की चिंता न हो और नौ दिन फाइव स्टार होटल में जवाई जैसी सेवा,और हर तरह का मनोरंजन मिलता हो , जेब किसी की, हाथ किसी का, वाह क्या किस्मत पाई है । जिन विधायकों के पुरखे उड़ते हवाई जहाज को देख कर उसे चील गाड़ी बताया करते थे उन्होंने विमान को बिना भाड़े की चिंता के ऑटो रिक्शा की तरह इस्तेमाल किया । आते समय बड़े हवाई जहाज में जयपुर आये वहां भी महंगा होटल मिला । भाग्य हो तो विधायकों जैसा । भाजपा ने भी टूट के डर से अपने विधायकों को जयपुर के होटल में ठहराया बस नाम बाड़ाबंदी की जगह ट्रेनिग कैम्प रखा, जनता इतनी बेवकूफ भी नहीं जो शब्दों की हेर फेर न समझे ।'मैंने भी बात आगे बढ़ाई 'शुरू में लगता था हॉर्स ट्रेडिंग हो जायेगी । भीतर घात टी वी चैनल मालिक सुभाष चंद्रा की डगमगाती नैया पार लगा देगी । जब उदयपुर से आते समय फाइनल रिहर्सल करते हुए मॉक पोलिंग करवा कर देखी तो कांग्रेस के चार विधायक गलत वोट कर गये थे, तब लगा भाजपा को फायदा मिलने वाला है । इनके कुछ विधायक कड्डी ढोळेंगे । कुछ निर्दलीय कोप भवन में जा बैठेंगे, पूर्व में उन्हें कोरी झांसे बाजी का झुनझुना ही दिया गया था, कोई मलाईदार ओहदा नहीं मिला ,लगा वे जादूगर को अब पिदकायेंगे, लेकिन उन्होंने आंख की किरकिरी बने कुछ अधिकारियों के हाथों हाथ ट्रांसफर करवाने को ही मोर्चा मार लेना मान लिया और झोला उठा कर बाड़ा बंदी में चले आये । सब विरोध फुस्स हो गये । भीतर ही भीतर क्या पता क्या खिचड़ी पकी और राजस्थान से बाहर से आये तीनों उम्मीदवार सिट्टा सेक गये । वे इतने ही तीसमार खां हैं तो लोक सभा के लिये खड़े होने की रिस्क भी कभी उठाते। वे राजस्थान का राज्य सभा में कितना हित साधन करेंगे, पहले के अनुभव तो अच्छे नहीं । लेकिन पांच साल के लिये चिंतामुक्त हो गये । राज्यसभा कभी भंग नहीं होती । भाजपा की विधायक चंद्रकांता के गिरफ्तारी वारंट ऐन मौके पर निकलवाये ताकि वोट न दे पाये । यह मोहल्ला स्तरीय खुंदक थी, बड़े माननीयों के स्तर का आचरण तो बिल्कुल न था जबकि मामला पांच साल पुराना था । वोटिंग में एक कांग्रेसी विधायक परस राम मोरदिया अपना वोट कैंसिल करवा गये और भाजपा को जो अनुशासित पार्टी होने का मुगालता था वह भी टूट गया । धौलपुर से विधायक शोभा रानी क्रॉस वोटिंग करते हुए अपना मत कांग्रेस के प्रमोद तिवाड़ी को दे गयी।''यह सब तो जनता ने देखा है। हाईकमान ने कह रखा था येनकेन प्रकारेण अपने ये आदमी राज्यसभा में पहुचने चाहिये।संख्या बल के आंकड़ों का गणित साफ था कि तीन कांग्रेस के एक भाजपा का जीतेगा पांचवें की फाचर तो यूं ही फंसाई थी ,इसी पांचवें के कारण बाड़ा बंदी का खेला हुआ और करोड़ों रुपयों को तंगली लगी ।' गिरधारीलाल जी ने मेरी बात बीच में काटते हुए कहा 'आप पढ़े लिखे हैं यह बताओ होटल और विमानों का लगभग तीन करोड़ रुपये का खर्च कौन उठायेगा ?और मन्त्री को मिली धमकी का क्या होगा ? वह रिजर्व सीट पर विधायक जीता है और कम महत्व के महकमे का वजीर है, बस अर्जुन राम मेघवाल के कद को छांगने के लिये उसे महत्व दिया है । वह कहां से इतनी रकम देगा ?''मंत्री का क्या छोटा और क्या बड़ा होता है गिरधारी लाल जी!' मैंने ज्ञान बघारा 'मंत्री चाहे तो स्विमिंग पूल से भी मोती बटोर सकता है, वैसे भी उसका बेटा पंचायत समिति का प्रधान,बेटी जिला परिषद सदस्य है, वो तो देर से मंत्री बने हैं अन्यथा बेटी सीधे जिला प्रमुख बनती । पहले भी एक मंत्री की बेटी जिला प्रमुख रही है । ट्रांसफर करवाने के लिये आने वालों से वही बात करती थी । खर्च की बात तो हम जैसों के लिये ही बड़ी होती है कि चार मेहमान चार दिन रह जायें तो बजट डगमगा जाता है । पहले भी यही विधायक महीना भर फाइव स्टारी मजे लूट चुके हैं, जबकि तब करोना का मंझ था आम आदमी सड़क पर नहीं निकल सकता था ये होटल दर होटल घूम रहे थे । इन्हें जिसने चकरी चढ़ाया था अब वही कह रहा है बाड़ा बंदी की परंपरा अच्छी नहीं । तब खर्च किसने भरा था बात फूटी क्या ? जिसने पहले भरा वही अब भर देगा । मार्बल की खानों से समझ लो सोना निकलता है उनके ठेकेदार छोटी मोटी सेवा को धर्म मानते हैं । हम पर टेक्स जरा और बढ़ जाएंगे । बेरोजगार युवा चार हजार की नौकरी को भी मोहताज हैं और ये एक दिन में चार हजार रुपये भोजन में चट कर जाते थे वो भी खुद के नहीं । आप धमका कर रंगदारी वसूलने वालों को ही गैंगस्टर कहेंगे इनके लिये भी कोई नाम सुझाइये ।विधानसभा में जनहित के मुद्दे यथा बेरोजगारी,बड़ी भर्तियों के समय ही पेपर आऊट क्यों होते हैं,महिलाओं पर ज्यादती सर्वाधिक यहां ही क्यों, सी एच ए का शहीद चौक जयपुर में धरना कितने दिन से चल रहा है उन्हें कोई आश्वाशन क्यों नहीं,राज्य में सब प्रांतों से डीजल पेट्रोल महंगा क्यों, अधिकारी कर्मचारी रिश्वत लेते आये दिन पकड़े जाते हैं इन पर नकेल आदि अनेक मसलों का समाधान निकालने की बजाय होटलों में घूमने वाली पलटन क्या हमारी उम्मीदों की कातिल नहीं । जब ये अगले साल वोट मांगने आयेंगे तब इनसे कहना कि बाड़ाबंदी का मजा ही लेते रहे हुजूर कोई काम भी कराया है आपने ?' गिरधारी लाल जी अपना सा मुंह लेकर चलते बने ।
मैं तुम्हें टेंडर दूंगा तुम मुझे शुकराना देना चुनावों के तुरंत बाद हर प्रांत के जीते हुए विधायक इलाके के दौरे पर निकलते हैं बाद में पांच साल तक इतनी व्यस्तता हो जाती है कि याद ही नहीं रहता किस गांव में क्या मीठी गोली दी थी । इस कमाऊ यात्रा को कोई भी नाम दिया जा सकता है । आमतौर पर इस आयोजन को धन्यवाद यात्रा कहा जाता है । मकसद इलाके में अच्छी छवि बनाना और लोगों को बताना कि देख लो वायदे के अनुसार आपको सम्भालने आया हूं । विरोधी कहते थे कि अगर मैं जीता तो दोबारा मुंह दिखाने नहीं आऊंगा । लो मैं आ गया । अगर वह सत्ता धारी दल का है तो जनता खूब स्वागत करती है, विपक्षी दल वाले का भी करती है जानती है कल को सरकार में उठापटक हो जाये, इसकी पूछ हो जाये , अंधे के पांव तले बटेर आ जाये और यह मंत्री बन जाये तो काम आ सकता है । इस धन्यवाद यात्रा में नोटों की मालाएं ,सोने की अंगूठियां बेहिसाब महंगी चद्दरें इकट्ठी हो जाती हैं । सामूहिक भोज रखे जाते हैं। अगर आने वाला मंत्री बन चुका है तो अंगूठी का वजन बढ़ जाता है तब मुकुट भी पहनाए जाते हैं । पंजाब वाले सदा ही इस पग फेरी को नया नाम देते रहे हैं उसे वे संगत दर्शन कहते हैं । लोग भी मुंह दिखाई खूब देते रहे हैं । इस प्रकार मिले धन को ए सी बी ने शायद ही पकड़ा हो ।कई सेर सोना इकठ्ठा हो जाता होगा । इस बार पंजाब से नया शब्द आया है - शुकराना । इस शब्द में भी कहीं न कहीं धन्यवाद छुपा है । यानी मैंने आपका काम किया आप मुझे खाली धन्यवाद नहीं दें शुकराना दें । नकद नारायण ही साफ साफ मतलब होता है । पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अपनी नयी नवेली सरकार के मंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त किया यही नहीं उसे गिरफ्तार करके पुलिस रिमांड पर भी दे दिया । खुद प्रेस वार्ता करके इसकी सूचना दी । दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने भगवंत मान के इस साहसिक कदम की प्रशंसा की । रिश्वत और ईमानदारी की लड़ाई में इतनी त्वरित कार्यवाही किसी अन्य प्रदेश में कभी देखी सुनी नहीं । भीतर ही दबा ली जाती है।वैसे प्रेस वार्ता करके यह बताना कि हमने फलां फलां की सिक्योरिटी हटा ली या कम करदी ,उल्टी पड़ जाती है और सिधु मूसेवाला की जान ले लेती है । बोरे भरकर रिश्वत की राशि जिनके घर से बरामद हुई वे भी किसी पार्टी के आदरणीय रहे उनके पक्ष में भी बयान वीर सामने आते देर नहीं लगाते । रक्षा सौदों में करोड़ों के घोटाले करने के आरोपी ,दिल्ली सिख कत्लेआम के दोषी भी पार्टी टिकट पाते रहे हैं । दुष्कर्म ही नहीं हत्या के आरोपों के बावजूद भी मंत्री, उनके पुत्र या निकट रिश्तेदार के विरुद्ध जांच चलती रहती है वे पद पर आसीन रहते हैं । बाद में मोटी पेंशन भी डकारते हैं । मामला घिसटता रहता है । केस पार्टी हित में दबा लिया जाता है । हो सकता है मुख्यमंत्री की कार्यवाही की मंशा हो लेकिन दबाब समूह के आगे झुकना पड़ता हो । कानून बना लिये हैं ऐसी कार्यवाही से पहले सरकार की मंजूरी लेना अनिवार्य है ,मंजूरी दी नहीं जाती । आरोपी आराम से कार्यकाल पूरा कर जाता है । अफसरों को इस मामले में काफी राहत रही है वे सस्पेंड होने या जेल जाने के स्थान पर तरक्कियां पा जाते हैं और कमाऊ पदों पर मलाई काटते हैं ।जातिवाद दीवार बन कर कार्यवाही के सामने खड़ा हो जाता है । अन्य स्वजातीय विधायक आसान सा फार्मूला फंसे विधायक के आगे रखते होंगे 'तू फंसा हम तेरे साथ हैं, हम फंसे तो हमारे साथ रहना ।' इसमें विपक्षी जातीय भाईचारा भी परोक्ष में साथ दे सकता है । ज्यादा से ज्यादा पद से इस्तीफा दिलवा कर इति करवा ली जाती है कि बेचारे ने त्यागपत्र दे दिया और क्या बच्चे की जान लोगे ? चुनाव आते आते जनता सब कुछ भूल चुकी होती है । राजस्थान में शिक्षक दिवस पर पता नहीं क्या सोचकर मुख्यमंत्री ने शिक्षा मंत्री के सामने ही सम्मानित शिक्षकों से पूछ लिया कि क्या आपको स्थानांतरण के लिये पैसे देने पड़ते हैं? शिक्षक होती है निडर जाति वे सभी हाथ ऊपर करके बोले हां देने पड़ते हैं ।मुख्यमंत्री ने उससे आगे न तो बात की न शिक्षा मंत्री से जबाब तलबी की । जांच कमेटी नियुक्त करनी चाहिये थी पर बात पर मिट्टी डाल दी गयी।वैसे तो गांव कोटवाळी सिखा देता है परंतु कोई आम आदमी पहली बार सत्ताधारी पार्टी के तीसमार खां को हरा कर विधायक बन गया हो और पहले हल्ले केबीनेट मंत्री और वह भी स्वास्थ्य मंत्री बन जाये तो कहना पड़ता है खुदा जब हुस्न देता है नजाकत आ ही जाती है । सत्ता की परंपरा का निर्वाह तो करना पड़ता है । स्वास्थ्य विभाग मलाईदार महकमा माना जाता है । डॉक्टरों को बड़े शहर के बड़े अस्पताल से उठाकर दूर गाँव की डिस्पेंसरी में भेजने की धमकी ही वारे न्यारे कर सकती है । अन्यानेक कमाई के सोर्स इस विभाग में निकाले जा सकते हैं । भर्ती और पोस्टिंग ही काफी अर्थ रखती है । संख्यात्मक रूप से शिक्षा विभाग के बाद बड़ा विभाग है । इस महकमे का मंत्री बनने के बाद शायद ही कोई विधायक असंतुष्ट रहा होगा । पंजाब में आप पार्टी की सरकार बने जुम्मा जुम्मा दो महीने हुए थे कि घटनाक्रम के अनुसार स्वास्थ्य मंत्री डॉ विजय सिंगला ने 'चढ़ते ई ढाण घाळ दी'।अर्थात सरेआम अधिकारी से कमीशन मांगना शुरू कर दिया । सभी अधिकारी भ्रष्ट नहीं होते, कोई जागती जमीर वाला भी होता है । उसने खुद मंत्री, उसके ओ एस डी और रिश्तेदारों द्वारा पैसे मांगने की काल रिकार्डिंग मुख्यमंत्री के सामने जा रखी जिसमें करोड़ों रुपयों के टेंडर में से शुकराना रूप में एक प्रतिशत रिश्वत मांगी बताई जाती है । मुख्यमंत्री ने मंत्री को बुला कर वह रिकार्डिंग सुनाई और पूछा यह आवाज आपकी है ? हां या ना में उत्तर दें । मंत्री के स्वीकार करते ही आगे की कार्यवाही सम्पन्न करवा दी । काम से पहले मांगी घूस रिश्वत और काम के बाद वही राशि शिष्टाचार का चोला पहन कर शुकराना हो जाती है । मुख्यमंत्री ने मिसाल पेश की है । प्रशंसा की जानी चाहिये । विरोधियों की दलीलें रेत की दीवार हैं । खोखली हैं । जो मंत्री खुद रिश्वत मांगने का 'मंगतीया छाप' काम करे वह इस पद के बिल्कुल लायक नहीं । पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी खुद को दलित और हर तरह के काम करने वाला बताते रहे, साली का लड़का दस महीनों में ही दस करोड़ को थूक लगा चुका था ,अब उसे कानूनी कार्यवाही का सामना करना पड़ रहा है,पर चन्नी तो सेफ है । इस मंत्री ने स्टाफ में से किसी विश्वसनीय व्यक्ति के माध्यम से यह आदि जुगादि काम करवाना था । मंत्री बनने के बाद तो रिश्तेदार भी नजदीक लगने शुरू हो जाते हैं यह सूगला काम उनसे करवाना था । और क्या रिश्तेदारों का अचार डालना होता है ?आजकल खुद ही फोन पर रिश्वत कोई अदना मुलाजम भी नहीं मांगता । भगवन्त मान के इस फैसले से दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री और जनता भी सीख लें । केवल इस्तीफा ही नहीं जेल भी भिजवायें और उसके द्वारा करवाये कामों की गहन जांच करवाएं । बनाई गई सम्पत्ति कुर्क करके भरपाई की जाये । जनता तुरन्त कार्यवाही नहीं कर सकती चुनावों में हिसाब बराबर करती है ।
रोना विछुड़े यारों को,लेके बहाना धुएं का भाभी जी साड़ी में उलझ कर गिरते गिरते कई बार सम्भलीं तो भाई साहब उन्हें सरकार कहने लगे । सरकारें भी बैठे बिठाये फाचर ले लेती हैं और अपने ही जाल में उलझ जाती हैं । महाराष्ट्र में भूचाल आया पड़ा है । मुख्यमंत्री क्या नींद में सो रहे थे । उनके खिलाफ खिचड़ी पकती रही उन तक खुशबू भी नहीं पहुंची । उनके गुप्तचर ,विजिलेंस कहां भटक रहे थे । उन्हीं की पार्टी का एक मंत्री दस बीस नहीं सरकार की चूल हिला देने जितने अड़तीस पार्टी के और बारह निर्दलीय विधायक मुम्बई से सूरत और वहां से गोवाहाटी ले गया । आरोप यह भी है कि मुख्यमंत्री विधायकों के फोन भी नहीं उठाते थे ,अब कुत्ती कादे में फंसी पड़ी है । ऐसा ही राजस्थान में हुआ था लेकिन ऐतिहासिक बाड़ाबंदी से डेमेज कंट्रोल किया । यहां बाहर वाले को सत्ता देने को ज्यादातर विधायक राजी न थे । सरकार जैसी उलझी थी वैसी पड़ी नहीं, गिरते गिरते सम्भल गयी । केंद्र सरकार ने बिना होमवर्क किये जल्दबाजी में नोटबन्दी की ,न काला धन वापिस आया न नकली नोटों पर अंकुश लगा । अफवाह तो उड़ी थी कि सब के खाते में पंद्रह लाख आ जाएंगे, बल्कि नये नोटों के साथ कई फ्राड उद्योगपति अरबों लेकर फुर्र हो गये । वैसे नोटबन्दी के नाम पर अढाई तीन सौ निर्दोष बैंकों के आगे काल के गाल में समा गये । विपक्ष को तब भी मुद्दा मिल गया था । जिन राहुल जी से दो हजार करोड़ रुपयों के हेर फेर के लिये ई डी की पूछताछ चल रही है वे चार हजार रुपल्ली निकलवाने का वीडियो बनवाने चार करोड़ की गाड़ी पर चालीस बॉडी गार्डों के साथ एक बैंक के आगे पहुंचे । जबकि दस लाख भी जिसका जमा था वो भी बैंक नहीं गया ,बैंक वाले सब सुविधा दे रहे थे । बाद में कई बैंक वालों पर भी जांच बैठी ,सुना है बहती गंगा में उन्होंने भी चोखे हाथ धोए थे। काले को सफेद करने में जोर तो आयेगा ही । कश्मीर में धारा 370 तोड़ी ,खूब शाबाशी मिली लेकिन कश्मीरी पंडित आज भी बेघर हैं । घुसपैठिये अब भी आ रहे हैं और बेगुनाहों का खून बह रहा है । तीन तलाक से वे मुस्लिम महिलाएं खुश हुई होंगी जो शोषण की शिकार थीं पुरुष तो तब भी नाखुश थे, अब भी हैं । किसान आंदोलन में सात सौ से ज्यादा किसान मरवाने के बाद काले कानून वापिस लिये अगर शुरू में कह देते कि आपके फायदे के कानून हैं, नहीं लेना चाहते तो वापिस लिए देता हूँ । ऐसा होता तो पंजाब विधान सभा चुनावों में भाजपा का हश्र इतना बुरा न होता । अब अग्निवीर नाम से नौजवानों को चार साल के लिये सेना में भर्ती करने की योजना ले आये । कुछ मायनों में यह सही भी है सत्रह से चौबीस साल की उम्र नाजुक होती है इसी उम्र में लड़के कैरियर बनाते हैं या नशाखोरी आदि में फंसकर बिगड़ते हैं । भर्ती हो जाने के बाद चार साल में दसवीं से सीधे बारहवीं का प्रमाणपत्र और लगभग पचास लाख रुपया घर आ चुका होगा । ज्यादातर युवा तीस पैंतीस साल की उम्र तक इंटरव्यू देते भटकते हैं । ये चौबीसवें साल रिटायर भी हो जाएंगे लेकिन अनेक नौकरियां इनका राह देख रही होंगी । युवा इसके नफे नुकसान को समझ भी नहीं पाये थे विरोधी दलों ने बेरोजगारों को फूंक भरनी शुरू कर दी । तोड़ फोड़ ,आगजनी पत्थरबाजी से देश का ही नुकसान हुआ । एक वीडियो में एक लँगड़ा लड़का बस में तोड़फोड़ करता दिखता है उसे किसी भी हालत में सेना में भर्ती नहीं किया जा सकता । उसका विरोध प्रायोजित था जो किसी भी तरह सही नहीं कहा जायेगा । उसी समय इ डी वाले राहुल को पूछताछ के लिये चक्कर कटवा रहे थे । उधर अग्निपथ का हंगामा शुरू हो गया, कांग्रेस पूछताछ से तंग थी । गांधी परिवार के दरबार में हाजरी के लिये हर कांग्रेसी चापलूसी की हद तक उतावला रहता है । राजस्थान की समूची सरकार ही दिल्ली में डेरा लगाए रही । पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सीधे ही पार्टी की महिला, छात्र विंग व सेवादल को विरोध के लिये उकसाते रहे । अग्निवीर योजना का विरोध तो बहाना था असल कारण ई डी की कार्यवाही का विरोध था । बयानवीर नेता एक भी पानी की बौछारों के आगे डट के खड़ा नहीं दिखा । भीड़ के रूप में गये कार्यकर्ता को भी विरोध से कोई मतलब नहीं था, बस बड़े आकाओं की नजरों में रहना ध्येय था ताकि भविष्य में लड्डू फूटे तो भोरा हमें भी मिले । राजस्थान में सरकार का डेढ़ साल पड़ा है अभी भी बुल्ले छाँगे जा सकते हैं । ऐसे ऐसों को राजनीतिक नियुक्तियों में लाभ मिल चुका है जिन्हें अपने शहर में भी लोग अच्छी तरह से नहीं पहचानते । अगर नेता जनता के काम करने की बजाए बड़े नेताओं को खुश करने की लल्लोचप्पी में लगे रहेंगे तो आम आदमी के रूप में कह सकते हैं कि सरकार गिरती है तो गिरे भाभी जी का पल्लू सलामत रहे ।
रुत आई रे पपीहा स्कूलों में तालाबंदी की जुलाई माह कहने को तो वर्ष के दूसरे हाफ का शुरुआती महीना होता है लेकिन होता बड़ा खास है । इसी महीने में वन विभाग की सक्रियता बढ़ जाती है, हर कार्मिक के चेहरे पर गुलाब के फूल सी लाली आ जाती है जंगलात महकमा बरसातें इसी महीने से शुरू होना मानता है और अपने कस्सी फावड़े सम्भालता है। नया बजट आता है ,नये पौधे लगाये जाते हैं लकड़ी बहुत कम रह गयी उसकी क्या कीमत है इस महकमे के अफसरों से ज्यादा कौन जानता है । बिहार बंगाल में इन्हीं दिनों नदियों में बाढ़ आती है । लोग बेघर हो जाते हैं। अफसर इस विपदा के समय प्रभावितों को बांटी जाने वाली राहत को रबी व खरीफ के बाद तीसरी फसल मानते हैं जो केवल अफसरों और नेताओं के हिस्से आती है । जुलाई में ही स्कूल खुलते हैं,खुलते ही सरकारी स्कूलों में तालाबंदी होने लगती है।एक तो स्टाफ को नया सत्र जमाने ,साफ सफाई ,प्रवेश की जल्दी और विभाग द्वारा छुट्टियों में मांगी गई बेसिर पैर की वे सूचनाएं जो पता नहीं कितनी बार पहले भेजी जा चुकी हैं , भेजने की उतावली होती है ऊपर से ताला बंदी वाले ताला और झंडा लेकर आ धमकते हैं, वे स्टाफ को ऐसे लगते हैं जैसे बीमार भैंस को झोटा तंग कर रहा हो । उन्हीं के बीच भंवरा टाइप शोहदों की पैदावार बढ़ जाती है । वे भी दो महीनों से बेरोजगार हुए बैठे होते हैं । शिक्षकगण एक दूसरे के हालचाल भी ढंग से नहीं पूछ पाते। मैडमें सूट साड़ियों की बात आधी अधूरी ही कर पाती हैं । कहां घूमकर आये यह भी बताना होता है, घूमे चाहे पीलीबंगा हों गोवा बताने पर किसी को क्या दिक्कत है ? दिक्कत मिटाने आते हैं तालाबंदी वाले आंदोलनकारी जो स्टाफ पूरा करवाने के लिये तालाबंदी करते हैं । जुलाई में कोई ताला खरीदने पहुंचता है तो दुकानदार एक बार ध्यान से देख कर पूछता है ताला घर के लिये चाहिए या स्कूल के लगाना है । जिनके बच्चे पढ़ते हैं वे हाय तौबा करें तो ठीक लेकिन कॉलेजों के छोरे जो अन्य गांवों से आते हैं उनके भाई बहिन या रिश्तेदार बच्चे भी यहां नहीं पढ़ते वे भी तपे तंदूर पर रोटी सेंकते हैं भावी नेता जो बनना है ।बच्चों को बाहर ही रोककर बैठा लिया जाता है । स्टाफ को कुछ नहीं कहा जाता वे पिछली मोरी से भीतर जाते हैं ।उच्चाधिकारियों को हालात गम्भीर होने की बढ़ाचढ़ा कर सूचना दी जाती है ।धरनार्थी पत्रकारों के सामने कलेक्टर से कम अधिकारी से वार्ता नहीं करने का अहद दोहराते हैं, कल बढ़िया सी खबर फोटो समेत लगाने की मिन्नत की जाती है।अधिकारी अगर एबीईओ भी आ गया ज्ञापन दिया जायेगा ।दो चार दिन से ज्यादा धरना चलता नहीं किसी अध्यापक को डेपुटेशन पर लगा दिया जाता है विजय जलूस भी निकलता है महीने बाद डेपुट टीचर मूल स्थान पर आ जाता है । किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता ।रोज रोज धरनार्थी भी कहां मिलते हैं ।अध्यापकों को परेशान करने वालों के तरीके गजब होते हैं झारखंड के गांव गढ़वा के लोग एक दिन स्कूल पहुंच कर बोले हम मुस्लिमों की आबादी गांव में पिचहत्तर परसेंट है स्कूल अब शरीयत कानून से चलेगा ।और ये भारत माता की जय या दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना वाली प्रार्थना अब नहीं चलेगी अब आप तुम्हीं राम हो तुम्हीं रहीम हो किस्म की प्रार्थना शुरू करो और बच्चे हाथ भी नहीं बांधेंगे अन्यथा तालाबंदी होगी । कई शिक्षण संस्थाएं खुद तालाबंदी की करतूत करती हैं एक दिल दहला देने वाला वीडियो वायरल है जिसमें अध्यापक छह साल के मासूम को डंडे से बेरहमी से पीटता है ।यह वीडियो मसौढी के धनरूआ थाने के महादेव नामक स्थान का है जहां जया क्लासेज की कोचिंग क्लास में बच्चे पर कहर टूटा और वह मानसिक संतुलन खो बैठा । बताया जाता है बच्चे ने राक्षस अध्यापक को एक लड़की के साथ गलत हरकत करते देख लिया था । तो इस तरह जुलाई माह ज्यादातर स्कूलों का तालाबंदी पर्व हो जाता है । स्टाफ पूरा करना या अन्य सुविधाओं को उपलब्ध करवाना न अध्यापकों के हाथ है न बच्चों के । नेता जो वोट मांगने आते हैं उनके दर पर यह अलख जगाई जाये तो फायदा हो सकता है नहीं तो रेत में घी ढोलने का कोई मतलब नहीं ।
सूरज के सांड और गऊ के जाये सुबह सबेरे ही हमारे सार्वजनिक पड़ोसी गिरधारीलाल ने पहेली की चुनौती दे डाली कि 'बताइये इन दिनों कौनसी खबर ज्यादा सुखियों में है ।' मेरा मूड अभी इस विषय पर चर्चा को तैयार न था, मैने कह दिया 'आप ही बताइये ।' वे चंचलता दिखाते हुए बोले 'चलो कुछ क्लू देता हूं उनमें से एक का चयन करके बता देना । पहला अल जवाहिरी की मौत, दूसरा अमेरिका चीन और ताईवान का कंजर क्लेश, तीसरा कॉमनवेल्थ गेम्स और चौथा ईडी(प्रवर्तन निदेशालय) की छापेमारी ।' मैंने बला टालने के उद्देश्य से कहा 'मैं हार मानता हूं मेरी भयां । चलिए आप ही उत्तर दे दीजिये ।' वे बच्चों की तरह खुश होकर बोले 'ईडी की धमाल सबसे ऊपर है ।' 'वो कैसे?' पूछने पर बोले 'देखते नहीं क्या रुतबा है इसके अधिकारियों कर्मचारियों का, सारे देश को हिला कर रख दिया। कोई दूर का रिश्तेदार भी ईडी में चपरासी होता तो भी मजा आ जाता । कैसे बड़ों बड़ों के हल्क में डंडा देकर नोटों के अंबार उगलवा रहे हैं । जब मशीनों से नोट गिन रहे होते हैं नोटों की इमारतें और रंगोली बना कर सेल्फी लेते हैं उन जैसे धनी वाली फीलिंग कुबेर ने भी क्या ली होगी ।' गिरधारी लाल जी की आनन्द लीला भंग करते हुए मैंने कहा 'भोले भाई वह पैसा सरकार का होता है गिनना या सम्भालना उनकी ड्यूटी है ।नोट गिनने का इतना ही शौक है तो बैंक में कैशीयर बन जाओ, पटवारी या रोडवेज में कंडक्टर लग जाओ सपने में भी नोट गिनते रहोगे ।' मेरी बात से उन्हें थोड़ी मिर्च सी लगी, बोले 'कैशियर किसी के घर बंगले में घुसकर ताले तोड़कर नोट बाहर निकाल सकता है क्या ?पटवारी देश की अमीरतम महिला को अपने दफ्तर में बुला कर घण्टों पूछताछ कर सकता है ? कंडक्टर किसी की आय से अधिक सम्पत्ति की जांच कर सकता है क्या? यह काम तो ईडी ही कर सकती है । बंगाल के एक बूढ़े मंत्रीजी और उसकी जवान महिला मित्र को तो बकरे के बच्चे सा इधर उधर खींचे फिरती है ।उस मंत्री को व्हीलचेयर पर बैठा कर वो जलूस निकाल रही है कि पीछे दे दाता के नाम तुझको अल्ला रखे गाना बज जाये तो लोग हाथ पर आना दो आना रख जायें ।मुंबई का बड़बोला शिवसेना नेता संजय राउत जो पार्टी का बंटाधार करने के बाद भी भगवा पटका लहराते हुए खुद को तुर्रम खां दिखा रहा था अब भीगी बिल्ली बना है तो ईडी के खौफ से ही ।' मैंने कहा 'इतने दिनों की पूछताछ के बाद भी बंगाली आरोपी स्वीकार ही नहीं कर रहे कि उनके घरों से मिले नोटों के अंबार, प्रोपर्टी के कागज और सोने के टोकरे जिनमें आधा आधा किलो के कंगन हैं उनके हैं। वे ईडी और देश को मूर्ख समझते हुए यही रट लगाए हुए हैं कि पता नहीं ये नोट किसके हैं । हां अस्पताल में मेडिकल जांच करवाते समय वहां आई एक साधारण महिला ने मंत्री पर चप्पल जरूर दे मारी । इसके कुछ मायने निकलते हैं कि भृष्ट नेताओं का इलाज जनता ही कर सकती है। ईडी या अन्य एजेंसियां सरकारी आदेशों का पालन भर करती हैं । शाहरुख खान के बेटे की बीच समुंदर लग्जरी जहाज पर हो रही पार्टी के समय खूब धमाचौकड़ी मची थी । नशा बरामदगी और गिरफ्तारियां हुई । कई दिन तक हाई प्रोफाइल ड्रामा हुआ । टीवी चैनलों ने खूब कांव रौला मचाया । बाद में केस डिसमिस हो गया जांच एजेंसी वह भी खूब अधिकार सम्पन्न थी, कह दिया कि गलतबहमी हो गई थी ।'मेरी बात से वे फिर तिलमिलाए और बोले 'नेशनल हेराल्ड को सीलबंद कर देना आपको छोटा मोटा काम लग रहा है । देख लेना इस अखबार के नाम से जो पैसे की हेरफेर हुई है सब बाहर आ जायेगी ।' मैंने उनके जोश पर जावण लगाते हुए कहा ,'स्विस बैंक में जमा देश का काला धन ,बैंकों से अरबों रुपये लोन लेकर भगौड़े हुए ठग,सरकारों के गिरने की स्थिति में सूटकेसों की भूमिका की जांच भी ईडी के अधिकार क्षेत्र में आती है वहां क्या उपलब्धि हासिल की है जरा वह भी खुलासा कर दीजिये । ये एजेंसियां उठाव तो सूरज के सांड जैसा करती हैं लगता है इस बार तो कुछ नया होगा परन्तु परिणाम के समय गऊ के जाये बनकर मोक मारने लगते हैं । हाथ पीछे खींच लेते हैं। सरकार बदलते ही नए घोड़े नये मैदान हो जाते हैं ।ढाक के वही तीन पात रहते हैं ।आजतक कितनों को जेल हुई ?ये सौ पचास करोड़ जब्त भी हो जायें तो इन मोटी चमड़ी वालों के क्या फर्क पड़ता है?'मेरे तेवर देखकर पड़ोसी जी ने चलने में ही भलाई समझी ।
रुपइया गिरा रे दुनिया के बाजार में साधु संत कितना ही कहते रहें कि धन दौलत यहीं रह जायेगी । जब अंत समय आयेगा एक पैसा साथ न ले जा पायेगा । कफ़न के जेब भी नहीं होती कब्र में आळा- अलमारी नहीं रहती । न हाथी है न घोड़ा है वहां पैदल ही जायेगा । बहुत उदाहरण हैं कि कारूं का खजाना भी यहीं रह गया। खाली हाथ आया खाली हाथ जायेगा । लेकिन पैसा सदा सर्वदा से अर्थ व्यवस्था की धुरी और रीढ़ रहा है । तभी तो स्टिंग ऑपरेशन से बेखबर एक मंत्री रिश्वत लेते हुए दुनिया को सनातन सत्य से अवगत करवा रहा था कि पैसा भगवान तो नहीं भगवान की कसम उससे कम भी नहीं ।रीढ़ से याद आया झुकने की भी सीमा होती है टूटने की नौबत आ जाये वह झुकना या गिरना किस काम का । रुपया आजकल गिरता ही जा रहा है जैसे उसके रीढ़ है ही नहीं । इतना गिर गया कि अस्सी रुपये से ज्यादा देकर एक डॉलर आने लगा । पैसे धेले के मिजाज को अर्थ शास्त्री समझते हैं । अपना जीव तो बस गिरने पर अफसोस कर सकता है । अर्थशास्त्री बताते हैं 1917 में एक रुपया तेरह डॉलर के बराबर होता था ।यानि डॉलर रुपये के आगे पानी भरता था लेकिन रुपया था इंग्लैंड के पाउंड के नीचे । सन सैंतालीस में भी रुपया और डॉलर बराबर थे एक रुपया एक डॉलर का । तब हमारे देश पर विदेशी कर्ज नहीं था ।अब हालात सम्भाले नहीं सम्भलते, रुपया लुढकता ही जा रहा है । स्थिति कैसी भी हो हम लोग मज़ाक से नहीं चूकते । एक एड की पैरोडी बनी है जिसमें एक जना कह रहा है मैं मजबूत डॉलर छाप अंडरवीयर पहनता हूं अगर रुपया छाप पहना होता तो वह कब का गिर गया होता ।इतिहास बताता है कि हुमांयु को डूबते हुए बचाने वाले भिश्ती के हाथ एक दिन की चौधर आई । हुमायूं ने उसके पूर्व में किये एहसान के कारण एक दिन के लिये राजा बनाया तब उसने चमड़े की मश्क से बनी दमड़ियाँ चलाई । तभी से कहावत चली है चमड़े की चलाना । जिस देश में चमड़े की करंसी चलती रही वहां नोटबंदी हुई । कालाधन गोराधन का भेद नहीं निकल पाया। वे बैंक जो दो रुपये की बॉलपेन रस्सी से बांधकर रखती हैं अरबों रुपये बिना जमानत के विजय माल्या आदि को दे दिया जो लेकर रफूचक्कर हो गए । सब जानते हैं हमारे यहां आने की भेड़ की रस्सी चवन्नी की हो जाती है ।भगौड़ों को वापिस देश में लाने और उनसे रकम वसूलने में हो सकता है मूल रकम से ज्यादा खर्च हो जाये या सरकार माफ कर दे । कोर्ट ने तो माल्या को चार हजार जुर्माना और कुछ माह की सजा का एलान कर दिया है । लोग कह रहे हैं इतना पैसा हजम कर लेने के बाद हम भी इससे तिगुनी चौगनी सजा भुगतने को तैयार हैं । सोशल मीडिया पर लोग भड़ास निकाल रहे हैं कि भगौड़ा कोर्ट द्वारा लगाया जुर्माना भरने के लिये दोबारा बैंक से लोन न ले ले । नोटबन्दी के बाद भी नकली नोट वैसे ही चल रहे हैं । तंगी पहले से ज्यादा हो रही है । महंगाई सुरसा बन गयी मुंह फैलता ही जा रहा है । जिस देश में सात सत्तर के दशक तक ट्रेक्टर पेट्रोल से चला करते थे अब स्कूटरी में डलवाना मुहाल है । खाने पीने के सामान पर बेहिसाब सरकारी टेक्स लगाने से श्रीलंका का पाडीया पून में आ गया है, हमारे यहां भी इतिहास में पहली बार दूध दही दलीये पर जी एस टी सुनने को मिल रही है । बैंक में खुद के पैसे निकलवाने पर भी टेक्स देना पड़े तो भविष्य की योजनाएं समझ में आने लगती हैं । सरकार कह रही है कि रूस यूक्रेन युद्ध,कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक हालात रुपये के गिरने के मुख्य कारण हैं । जनता कह रही है महंगाई सहन कर लेंगे बस मंत्रियों के वेतन भत्ते और कई कई पेंशने वर्दाश्त से बाहर हैं जो जनता का तेल निकालने वाली योजनाएं बनाते और लागू करवाते हैं । कम वेतन में उनका गुजारा नहीं होता तो तामझाम छोड़ दें बिना वेतन विधायक बनने को भी हजारों बेरोजगार युवा बैठे हैं । बेरोजगारी की दर भी तो रुपये के गिरने के कारण बढ़ी है ।
जिनका जीना किसी के मरने पर टिका है जब सरकारी कार्यालयों में जाना होता है तो वहां तख्ती पर एक वाक्य अनिवार्य रूप से लिखा मिलता है कि रिश्वत लेना व देना कानूनी अपराध है । उस पर सजा आदि के प्राबधान का उल्लेख भी रहता है तब खुलकर नहीं तो दबे होंठों हंसी निकल ही जाती है कि यह हाथी के दिखाने वाले दांत हैं और आने वाले 'ग्राहक' को कुछ याद कर लेने में सहायता की जा रही है। वैसे अब रिश्वत पाप पुण्य, करनी भरनी, मर्यादा, नैतिकता, गरिमा, हाय, दुराशीष ,देश के प्रति कर्तव्य भाव आदि फालतू शब्दाडम्बरों के सांकल तुड़वा कर सुविधा शुल्क के सर्व स्वीकार्य आंगन की तुलसी हो गई है । लोग मानने लगे हैं कि पैसे देकर भी काम हो जाये तो जान बची लाखों पाये के बराबर है अन्यथा मींगनी घुला दूध पीना पड़ सकता है ।खज्जल खुआर होकर आखिर में झख मराकर भी रिश्वत ही देनी है तो पहले बोल ही दे दो, नहीं तो देवता रूठ जायेंगे । जनमानस में यह बात घर कर चुकी है जो रिश्वत लेता पकड़ा गया वो रिश्वत देकर छूट जायेगा । लेकिन सरकारी कारिंदे जब माथे पर बूक मांड लें तो उनकी प्यास इंद्र देव भी नहीं बुझा सकते । रिश्वत की सीमा, फिक्स रेट और ओर छोर ही नहीं । मांगने वाला अपने घर की जरूरत ध्यान में रखता है सायल की मजबूरी नहीं । जिला स्तर का सक्षम अधिकारी पूर्व में एक चर्चित जमीन रजिस्ट्री के नाम पर सौ बीघा के सौ लाख मांगता पाया गया था । सुनने वालों ने तब दांतों तले उंगली दबा ली थी कि इतनी भी रिश्वत होती है ।जिला कलेक्ट्रेट पूरे जिले के सरकारी कामकाज का रिमोट अपने हाथ में रखता है ।सभी विभागों की मॉनिटरिंग , दिशानिर्देश और निरीक्षण भी वहीं से होते हैं ।आमजन काम न होने की स्थिति में अधिकारियों की शिकायत आदि लेकर वहीं जाता है । उसे उम्मीद रहती है वहीं से न्याय मिलेगा । अगर वहां काम कर रहे किसी कार्मिक को रिश्वत लेने जैसा घृणित कार्य करते गिरफ्तार किया जाये तो बात अफसोस नाक ही नहीं चिंतनीय हो जाती है । ए सी बी ने कलेक्ट्रेट में सहायता विभाग में निजी सहायक दो लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए दलाल मित्र के साथ रंगे हाथों पकड़ा है । यह घूस कोई मुरब्बे अलॉटमेंट करने में सहयोग के बदले नहीं ली जा रही थी न ही रिवाल्वर या गन का लाइसेंस बनवाया जा रहा था । बस कोरोना कहर के समय घर के मुखिया की मृत्यु पर मिलने वाली सरकारी सहायता में से पांच परसेंट की कुंडी लगाने की गिरी हुई हरकत की जा रही थी । मृतक का राशन डिपो था नियमानुसार उसे कोरोना वारियर माना गया । कोरोना से हुई मौत के कारण उसके घर वालों को पचास लाख रुपये की राशि मंजूर हो गई । जिन बाबू लोगों के हाथ से ये कागज निकले हों वे 'सुक्का खूड' कैसे निकलने दें । खबर के अनुसार राशि मंजूर होने से पहले ही पांच परसेंट का गाना बजना शुरू हो गया था । वे समझ रहे थे पानी पुलों के नीचे से ही जायेगा। हमारे बिना पत्ता भी कैसे हिलेगा। लेकिन पैसा ऑन लाइन पीड़ित आवेदक के खाते में आ गया । तब भी बेसुरा राग अलापना बंद नहीं किया और फोन करके पांच परसेंट यानि अढाई लाख देकर जाने का दबाब बराबर रखा । जबकि चाहिये यह था कि इंतजार करते । कभी मिलता तो एहसान जताते ।उसे दोबारा अड़ीक्के चढ़ाने का चक्कर चलाते लेकिन सब्र नहीं हुआ ।बताया जाता है आरोपी चार साल पहले ही नौकरी लगा था और चढ़ते ही ढांण घाळ चुका था । जिले में अढाई साल में बाइस आरोपी रिश्वत मामले में धरे जा चुके हैं,इन आंकड़ों से भी सबक नहीं लिया । पता नहीं क्यों रुपये की हबस आदमी की सोचने की शक्ति भी कुंद कर देती है । सरकारी पद पर कार्यरत मुलाजिम यह क्यों भूल गया कि फोन पर रिश्वत मांगना मुसीबत को बुलावा देना है । आजकल लल्लु पंजू के दो हजार के फोन में भी रिकॉर्डिंग की सुविधा रहती है । यह भी नहीं सोचा मरे हुए की राशि में से काट काटनी राध में छुरी मारने के बराबर है ।दफ्तरों में रिश्वत चाय पानी और आटे में नमक समान तो आदि जुगादि काल से सुनते आये हैं लेकिन बाबू ग्रेड का आदमी एक झटके में अढाई लाख के थूक लगा सकता है तो अधिकारी तो कितने ही वारे न्यारे कर सकते हैं । मृतक को नियमानुसार कोरोना वारियर माना गया है उसे सहायता राशि किसी प्रकार की घोचेबाजी से भी नहीं रुकनी थी । क्यों न दुखी परिवार की कागजी सहायता करके आशीष ली जाती। वहीं अब कैरियर दांव पर लग गया । दो लाख से मिसिज के टूम टल्ले बनवाने की जगह जेल की हवा खानी पड़े तो ग्रह नक्षत्रों का दोष नहीं खुद ईश्वर का नाशुक्रा होने का सबूत है जिसने बढ़िया नौकरी और इज्जत दे रखी थी ।
कितने भाई बहिन हो भारत देश महान सदा सर्वदा से हर मामले में विश्व गुरु रहा है । बस एक ही बात वर्षों से साल रही थी कि जनसंख्या के मामले में हम चीन से पीछे रह रहे हैं । हमारा नम्बर इस मामले में चीन के बाद आता है । इस कारण एक दो बच्चों वाले यूरोप के लोग हमारा लोहा मानते रहे हैं कि इन दो देशों में वास्तव में मर्द बसते हैं जो इतने बच्चे पैदा कर लेते हैं और पाल भी लेते हैं। जल्द ही विश्व में कुल जनसंख्या आठ अरब होने जा रही है। 2011 में सात अरब थे उनमें से तीन अरब से ज्यादा हम हिंदी चीनी भाई भाई ही हैं ,बाकी दो सौ से ज्यादा देश हमारे पासंग में भी नहीं वे सारे मिलकर पांच अरब बनते हैं । हम अकेले हर साल एक नया आस्ट्रेलिया पैदा कर देते हैं । कहने का मतलब है दुनिया में आबादी के हिसाब से हम दोनों मित्रां दा ना चलदा है । हमारी आपस में चाहे न बने पर बच्चे पैदा करने में हम एक जैसे हैं । कभी हमारे यहां भी जन संख्या कम रही थी । युद्धों में काम आ जाने के कारण पुरुषों की पैदावार बढाने के लिये बहुविवाह की छूट और दर्जन से अधिक बच्चे पैदा करने वाले को राज की जमीन आदि देने का जिक्र इतिहास में मिलता है । कभी स्त्रियों की कमी भी देखने को मिली तब किसी तरह पैसे देकर एक लुगाई का जुगाड़ हो पाता । एक भाई की शादी हो जाती तो बाकी के पांच सात भाई भी शादी शुदा जैसी फीलिंग पाते थे । तब औरत की दो ही केटेगिरी होती मोल की या पुन्न की । कई देशों में फसल और अन्य उत्पादन सोर्स बहुत हैं, लेकिन उनका उपभोग करने वाले मर्द कम हैं औरतें ज्यादा । तब वहां नौबत यहां तक पहुंची कि मर्द आयात किये जायें यहां उन्हें कई कई शादियां और अधिकाधिक बच्चे पैदा करने की छूट दी जाये । सरकारी भत्ते जमीन और अन्य सुविधाएं दी जायें । तब घने देशों के लन्डूर उधर मुंह उठाकर चल दिये थे । अपने यहां जनसंख्या के सम्बन्ध में अब जाकर सकून मिला, कलेजे में ठंड पड़ी जब पता चला कि अगले साल हम चीन से आगे निकल जायेंगे । पूरी दुनिया में हमारा डंडा घूमेगा बाकी का घाघरा घूमता है । हम जनसंख्या के मामले में विश्व के सबसे पहले नम्बर का खिताब हासिल करने जा रहे हैं यह बात अलग है ओलंपिक आदि खेलों में एक मात्र स्वर्ण पदक के लिये हमारी आंखें तरस जाती हैं । चीन ने इस तरफ विशेष ध्यान दिया है शादी करने की कानूनी उम्र बढा दी वहीं एक से ज्यादा बच्चे हों तो सरकारी नौकरी और अन्य सरकारी सुविधाओं के दरवाजे बंद कर दिये । हम अभी भी इस लालच में लगे हुए हैं कि दो रुपये किलो वाला गेंहूँ घर में ज्यादा आयेगा । कुछ सरकारी योजनाएं भी समझ से परे हैं जैसे नसबंदी करवाने पर कम पैसे मिलते हैं जापा करवाने पर ज्यादा, विशुद्ध घाटा उठाने की प्रवृति हमारी कभी रही नहीं जितने ज्यादा होंगे उतने दिहाड़ी कमाकर लायेंगे । जिनके एक है वही बिगड़ गया तो कहां जायेंगे । ज्यादा होंगे कोई न कोई तो माँ बाप का सहारा बनेगा । सो इसे एक काम समझकर लगे हुए हैं ।लेकिन तसल्ली तो है कि मानसों को तरसते देश किताबों में हमारे बारे में पाठ्यक्रम छापेंगे कि भारत सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है । यहां आकर शोध करेंगे कि क्या कारण हैं इस मिट्टी के लोग धड़ाधड़ बच्चे पैदा कर रहे हैं । उन्हें जरूर उन शहरों कस्बों में सर्वे के लिये ले जाया जायेगा जहां आधी रात को रेल आती है । पिछले हफ्ते विश्व जनसंख्या दिवस मनाया गया । नयी बहस छिड़ी। बीच में धर्म को घसीटा गया । टीवी की धुआंधार मुठभेड़ों में धर्म गुरु और उलेमा लोग अपने अपने तर्क देते रहे । यह सुनने को मिला बच्चे ज्यादा या कम होने में आदमी का कोई हाथ नहीं सब ऊपर वाले की माया है। जो जन्म देता है रिजक भी वही देगा । उदाहरण भी दिये गये । नेता भी चर्चा में हाजिरी लगवा गये । जितना जहर घोल सकते थे घोल गये । बढ़ती आबादी पर भी राजनीतिक रोटियां सेक गये । दो सम्प्रदायों में अधिक बच्चे पैदा करने की होड़ शुरू करने का आह्वान कर गये । सब अपने धर्म की संख्या बढ़ाने की वकालत करते रहे सच्चे भारतीय पैदा करने की किसी ने बात नहीं चलाई । मां भारती देशभक्तों की राह देख रही है । एक स्कूल में अधिकारी ने एक बच्चे से अचानक पूछ लिया 'कितने बहिन भाई हो' तो बच्चा बोला 'चौदह ।'अफसर की सुनकर सिट्टी पिट्टी गुम होने लगी, बोला 'आज के समय में चौदह बच्चे ?अरे तुम्हारे बाप ने कुछ नहीं सोचा, उस सरकारी नारे ,, की भी दशा और दिशा बदल दी जिसमें कहा गया है 'बच्चे दो ही अच्छे ।' लड़का बोला 'मेरा बाप बहुत समझदार है जानता है चौदह में से दो तो अच्छे निकल ही सकते हैं।'दूसरे स्कूल में भी यही सवाल दोहराया गया तो वहां भी एक लड़के ने कहा 'चौदह ।' अधिकारी हैरानी प्रकट करते हुए बोला 'तुम्हारा बाप क्या काम करता है' तो लड़का बोला 'जिसने चौदह बच्चे पैदा किये हों वह कोई और क्या काम करता होगा बस यही काम करता है।'
चला चला रे डलेवर गाड़ी होले होलेयात्रा करने का भी अपना अनुभव होता है ।अनदेखे नये स्थान रोमांच और जिज्ञासा पैदा करते हैं । पुराने जमाने में पैदल ही चलना पड़ता था । एक से दूसरे देश तक पैदल जाया जाता था । गुरु नानक देव जी ने चारों दिशाओं में कई देशों की पैदल यात्रा की जिसे उदासियाँ कहा जाता है । महात्मा बुद्ध, महावीर, ईसा सब पैदल घूमें । चीनी यात्री फाह्यान और हुवानसांग की पैदल भारत यात्रा इतिहास की किताबों में पढ़ना भी मजबूरी रही । घोड़ों, गधों या ऊंठ पर भी यात्रा की जाती थी । पहाड़ी लोग खच्चर रखते हैं जो सवारी और सामान दोनों ढोते हैं । याक नामक पशु भी बर्फीले पहाड़ों पर दूध देने के साथ बोझा ढोता है । पहले घोड़े या रथ होते थे वे भी सबको कहां नसीब थे । अब घोड़े शौक और व्यापार के लिये पाले जाते हैं । मारवाड़ी या नुकरा किस्म के घोड़ों की कीमत जानकर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है। बैल गाड़ी और ऊंट गाड़ा का अपना मजा था । हमारे बचपन में हाड़ी की फसल निकालने के समय स्कूल से खेत जाते तो घर वाले ऊंठों के पीछे बंधे फले पर बैठा देते। वे झूटे स्वर्गीय आनन्द से ज्यादा नजारा देते थे । आज महंगी कारों में भी वो स्वाद नहीं आता ।आज के बच्चे ही नहीं युवा भी फला नहीं जानते । आजकल जीप, कार, बस, रेल आदि में हर किसी ने सफर किया है । कुछ खुशनसीब हवाई जहाज में भी बैठे होंगे । जिन्होंने कभी पिकअप वालों से लिफ्ट ली होगी वे उस समय को याद करके आज तक पछता रहे होंगे, क्यों कि पिकअप वाले उसे हवाई जहाज की तरह उड़ाने का प्रयोग करने बैठ जाते हैं । ओवर स्पीड का मीटर उनके आगे पानी मांगने लगता है । मैंने तो ट्रकों में भी बहुत यात्रा की है । पल्लू क्षेत्र से चूने से भरे ट्रक जंक्शन आया करते थे , वे बस किराए से आधे में ही चढ़ा लेते थे । मैं पंजाबी ड्राइवरों के साथ बैठकर खुशमिजाजी,गहरी जिजीविषा ,अलमस्त व्यवहार,भाषा में गाली के तड़के के साथ ठरका, नये नये शब्दों का भंडार,औरत के लिये अलग ललचाया नजरिया , सजगता,होशियारी और निडरता के दर्शन करता । अनपढ़ होने के बावजूद दुनियादारी का ज्ञान उनसे ज्यादा किसे हो सकता है । वे सामने पुलिस नाका देखकर घबराते नहीं, न पीछे घूम कर वापिस मुड़ते हैं । वे डंडा घुमाते सिपाही के लिये सौ पचास का फटा पुराना नोट खलासी को पकड़ाते हुए कहते हैं 'मार साले दे सिर च ।' और मौके का अफ़सर बिना नोट देखे पेंट की जेब में ठूंस कर जल्दी आगे जाने का इशारा करता है । अकेली लेडीज सवारी उनके साथ न तब चढ़ती थी न अब चढ़ती है। गायक चमकीले के चक्कमें गीतों की कैसेट अब भी उनकी पुरानी डैक में बजती रहती है ।हेमामालिनी के पोज वाली फोटो उन्हें आज भी प्यारी लगती है । केबिन में स्लोगन लिखा मिलता है 'चल बिल्लो रानी तेरा रब राखा ।' यह वाक्य ही उनकी अलमस्ती का परिचायक बन जाता है । वे नींद लेते हुए भी मस्त रहते हैं कि अपनी गाड़ी को कुछ नहीं हो सकता इसका रब्ब राखा है । जंक्शन में चूना फाटक नाम तभी पड़ा था । जहां जिप्सम के पहाड़ खड़े हो जाते थे । माल गाड़ियों में भर कर उसे देश भर में भेजा जाता था । तब छह टायरों के ट्रक होते थे जो आजकल कम ही दिखते हैं । मैंने विदेश में सौ से ज्यादा टायरों वाले ट्रक भी देखे हैं, लेकिन वहां ड्राइविंग लाइसेंस लेने के लिये अपने यहां की तरह लचीलापन नहीं है कि एजेंट महोदय को निर्धारित से तिगनी फीस दे दी और मिल गया लाइसेंस ।अलवर में एक जन्म से अंधे आदमी का ड्राइविंग लाइसेंस बना देने का कारनामा काफी चर्चित रहा था । विदेश में बाकायदा ट्रेनिग लेकर परीक्षा देनी पडती है जिसमें पहली बार कोई भाग्यशाली ही पास होता है। वहां के अधिकारी मानवीय जानों की कीमत जानते हैं । अब हमारे यहां ए. सी., कम्प्यूटर व जी. पी. एस. लगे ट्रक भी चलते हैं जिनका मालिक घर बैठे स्पीड, ठहराव और लोकेशन देख लेता है । मालिक ड्राइवरों की जन्मजात चालाकियों को नजरअंदाज भी करता रहता है । उसे पता होता है रास्ते की सवारियों का हिसाब वे उसे नहीं देंगे । पुलिस इंट्री आदि का खर्च बढाकर बताएंगे । तू डाल डाल मैं पात पात का सिद्धांत वे भली भांति जानते हैं । ट्रक ड्राइवरों पर पुलिस का सरकारी सर्वे सामने आया है जबकि आम आदमी तो इसे पहले से जानता था। सर्वे कहता है कि इकतीस परसेंट ट्रक ड्राइवर शराब पीकर गाड़ी चलाते हैं । नब्बे परसेंट को गुटका और धूम्रपान की लत होती है । आधे ड्राइवर चार से छह घण्टे ही नींद लेते हैं । उनमें से बाइस प्रतिशत का बीपी खतरनाक स्तर तक बढ़ा होता है । इन्ही कारणों से लाखों लोग सड़क पर बेमौत मारे जाते हैं । ड्राइवरों पर बहुत चुटकले बने हैं जैसे वे आंखों की जांच करवाते हुए डॉक्टर से कहते हैं कि सामने से आती बस जीप आदि दिखनी चाहिए मोटरसाइकिल सवार या पैदल की कोई परवाह नहीं । हाइवे के ढाबों पर दाल फ्राई इन्हीं ड्राइवरों के कारण चल रही है । श्रीनगर से कन्याकुमारी और जोधपुर से अगरतला तक की मंजिल तय करना इन्हीं के दिल गुर्दे का सबूत है । रास्ते में डाकू और संगठित गिरोह मिलते हैं ,उनसे कैसे निबटना है ये ही जानते हैं। एक ड्राइवर साहब ने किस्सा सुनाया कि 'एक जगह का आर टी ओ बहुत परेशान करता था । गरीब चालकों की पगार तक छीन लेता । एक बार मैं उस रुट पर ट्रक लेकर जा रहा था । सिपाही ने दूर ही रोक कर कहा सामने जीप में आर टी ओ साहब बैठे हैं साथ में मेम साहिबा भी हैं वे कहीं जाते समय दिहाड़ी बनाने को रुक गये । मेम साहब के सामने जरा सलीके से पेश आना । ड्राइवर ने अपने सारे कपड़े उतार कर ट्रक में छुपा दिये और अल्फ नँगा होकर साहब की ओर चल पड़ा ।देखते ही अफ़सरनी ने मुंह छुपा लिया और साहब चिल्लाया ,अरे यह क्या कर रहा है । मैंने कहा, साहब थोड़ी दूर पीछे डाकू मिल गये थे सब कुछ लूटकर ले गये सारे कपड़े भी उतरवा कर ले गये भैंण दे यार । साहब ने अपनी सीट पर रखा तौलिया मेरी तरफ फेंक कर कहा लपेटो और भागो यहां से । मैंने कहा साहब एक रुपया भी पास नहीं, खर्चा भी दो । साहब ने दो हजार के नोट मेरी तरफ और फेंके और जल्दी दफा होने का इशारा किया । मैंने नोट उठाये और आराम से गाड़ी में आकर बैठा । जब तक वहां से निकल नहीं गया मेम साहब ने सिर नहीं उठाया । कुछ भी है ड्राइवरों की दुनिया है बड़ी रंगीन । लेकिन चलते ट्रक में आग लगने के कारण जब निकलने का मौका नहीं मिलता या भयंकर एक्सीडेंट के कारण पिचकी गाड़ी से कटर से काटकर लाश निकाली जाती है तो उसकी घरवाली का रूदन हजार कोस दूर भी सुनता है ।दुर्घटना से देर भली । हम तो यही कहेंगे "चला चला रे डलेवर गाड़ी होले होले ।"
माणस खाणी लखूवाली नहर हाल ही में मेरे पास सरदारशहर के युवा मित्रों का फोन आया कि हमारे यहां बहता पानी नहीं होता ,और जिस आपणी योजना का पानी हम पीते हैं उस नहर को देखना चाहते हैं । लखूवाली की नहर दिखाने में आप मार्गदर्शक बनें । पिकनिक मूड में आयेंगे, गाड़ी नहर किनारे रोक कर डिक्की खोलकर डैक पर गाना बजायेंगे 'लाके तिन पैग बलिए' ,खुद भी जाम छलकायेंगे ट्विस्ट करेंगे, भंगड़ा होगा । नहर के पार भाटा उछालने की कोशिश होगी, अंत में नहाएंगे। मैंने उन्हें कहा अगर नहाने के नाम पर खुदकुशी करने का इरादा है तो मैं आपकी मदद नहीं कर सकता । यहां नहाते हुए हमने तो किसी को देखा नहीं । आपने नहाना है तो इसके लिये यहाँ पुलिस चौकी को सूचना करनी होगी,सूरेवाला के गोताखोर पहले बुक करने पड़ेंगे । पहने हुए कपड़े ,बटुआ मोबाइल किसी जानकार के पास छोड़कर आने होंगे बाद में तो मिलेंगे नहीं । लखूवाली की नहर नहाने के नहीं अकाल मृत्यु के काम ज्यादा आ रही है । जब मैंने डरावनी सी तस्वीर पेश की तो वे बोले हम आपको बाद में फोन करते हैं।यह नहर जिसे पुराने लोग आज भी राज केनाल कहते हैं साठ के दशक में बनते हुए यहां तक पहुंची । हरी के पत्तन से निकला हिमालय का पानी सतलुज नदी से होता हुआ हमारे यहां पहुंचता है । पहला हैड हरियाणा के गांव लोहगढ़ के पास बना है जिसे इसी नाम से पुकारा जाता है । इस हैड पर तथाकथित नेता आये दिन सफेद कपड़े पहनकर गाड़ियों के काफिले व पत्रकारों के साथ पहुंचते रहते हैं । वहां काम करवा रहे पंजाब सिंचाई विभाग के अधिकारियों के साथ धौंस पट्टी किस्म की बहस करते हैं जबकि पानी के गणित का ज्यादातर को कुछ पता नहीं होता। इस हैड पर आवागमन लगा ही रहता है । जबकि वहां से थोड़ा सा आगे पंजाब के लम्बी, पँजाबा गांवों के किसान नहर से हमारा पानी ट्रेक्टरों पर बरमा लगा कर सरेआम उठा रहे होते हैं । इस हैड पर डूब कर मरने वालों के आंकड़े कमजोर ही हैं । यहां सुदूर से आई लाशें ही आती हैं जिन्हें बेलदार आगे सरकाने में देर नहीं लगाते । दूसरा हैड मसीतांवाली गांव के पास है, जहां आत्महत्या के आंकड़े अलग प्रकार के हैं। प्रेमी जोड़े वहां ज्यादा गिरने आते हैं, जिनमें अक्सर प्रेमी कुंवारा और प्रेमिका दो चार बच्चों की मां होती है । हरियाणा तक के प्रेमी जीवन से हताश होकर यहां खिंचे चले आते हैं । घर से भागने का मकसद पूरा होने की गर्मी उतर जाने के बाद भविष्य की चिंता सताती है । बदनामी ,पुलिस ,वकील जज, हवालात व शरीके की अपमानित करती नजरें साफ दिखने लगती हैं । दुर्खीम का सिद्धांत कहता है तब मरना ही एक मात्र मार्ग दीखता है । नहर में छलांग लगाना आसान मौत लगती है । इस हैड ने भी बहुत जानें ली हैं । 1983 में तो पूरी की पूरी बस इसमें समा गई थी । इसी के लिये पुलिस चौकी बनानी पड़ी और सी सी टी वी कैमरे लगाये गए हैं जिनके माध्यम से चौकी में बैठे पुलिस वाले हैड पर होने वाली गतिविधियां देखते परखते रहते हैं । संदिग्ध दीखने पर झट पहुंच जाते हैं । मरने वाले कैमरे की जद में नहीं मरना चाहते वे कुछ दूर जाकर सफलता प्राप्त करते हैं । सरकार इस जगह को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है । शायद तब बेमौत मरने वालों की दर कम हो जाये। इसी हैड पर उद्धघाटन हेतु 1962 में तात्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी,उप राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, बिना किसी पद के इंदिरा जी,पधारे । मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया अपनी पूरी कैबिनेट के साथ कई दिनों तक यहीं डेरा डाले पड़े रहे । लखूवाली हैड आगे रह जाता है। हाइवे पर पुल है जिसकी ढाल में गांव बसा है लखूवाली । नहर बनाने वाले ठेकेदार तब भी थे । उनसे केवल सेवाभाव की उम्मीद बेमानी तब भी थी । तब सीमेंट के थैले का रेट पांच रुपये था। मुश्किलों से भरा जमाना था । कच्चे घरों में रहने वालों ने सीमेंट क्या करना था सो उनसे कौन खरीदता । बताया जाता है तब उन्होंने दिहाड़ी बचाने के लिये खदानों में ट्रकों के ट्रक सीमेंट दबाकर ऊपर मिट्टी डाल दी। वर्षों बाद पत्थर रूप में सैट हुए सीमेंट के छोटे पहाड़ धरती से बाहर आये। पूरा माल लगा नहीं सो नहर से दशकों बाद पानी रिसने लगा स्थानीय भाषा में उसे पानी का सिमना कहते है जो सेम नाम से जाना जाता है यही बदबूदार पानी यहां की बर्बादी का कारण बना । लखूवाली नहर में मरने वाले जीवन से अघाये या दुर्घटना वश गिरने वालों की तादाद ज्यादा रहती है । साजिशवश गाड़ी समेत धक्का देकर गिराने या अन्यत्र मारकर यहां लाकर फेंकने की घटनाएं भी हो चुकी हैं।नहर अब इतनी बदनाम हो चुकी है कि रात विरात अकेले ड्राइवर से लूटपाट ही नहीं गाड़ी तक छीन लेती है । गांव से बाहर भी वारदातें करने लगी है । अतः नहाने की बात करना ही बेमानी है ।
बिजली का झटका ,पानी की मार।वाह मेरी सरकार आदि जुगादि समय से रोटी कपड़ा और मकान ही मनुष्य की मूलभूत जरूरत मानी गई है बिजली का इसमें कहीं नाम नहीं ।सातों सुख यथा निरोगी काया,जेब में माया,सुलखनी नारी,पुत्र आज्ञाकारी,नीर निवासा,नगर में वासा, और राज में पासा में भी बिजली को सुख का कारक नहीं माना गया । लेकिन आधुनिक सुख घर में बल्कि कमरे में कुई ,रंगीन टीवी, कमाऊ बीवी ,उसका एटीएम अपने बटुए में , घर मैरिज पैलेस के पास, विधायक से यारी और बीपीएल में नाम होना आज के जमाने में सबसे बड़ा सुख है।नये सुखों में बिजली सबसे बड़ी देन है ।हफ्तों में होने वाले काम मिनटों में कर देती है ।लेकिन यही बिजली इन दिनों कोढ़ में खाज हो रही है । कोढ़ में खाज देखी नहीं तो सुनी जरूर होगी । स्पष्ट महसूस करनी है तो इसके लक्षण समझने होंगे । मई जून की तपती मौसमी गर्मी ऊपर से बिजली कट और पानी की नहरबंदी यही तो कोढ़ में खाज होती है । हम बिजली के अभिलम्भित हो गए, उसका नशा करने लगे, उसके बिना जीवन की कल्पना बेमानी है । बिजली की सुविधा ने जनजीवन सरल बना दिया । जो काम हमें हाथ से करने पड़ते थे बिजली करने लगी । कुए से पानी भरना ,बिलोना करना, पंखा चलाना, पानी ठंडा करना, घर में बर्फ बनाना और सिनेमा भी घर में टीवी पर चलने लगा । झाड़ू पोंछा व कपड़े धोना भी बिजली करने लगी ।और कितने ही छोटे बड़े काम इस सूची में जोड़े जा सकते हैं । तभी तो निहंग सिंह बिजली को सुखदेव कौर नाम से पुकारते हैं ।आजादी के बाद इस इलाके में बिजली भाखड़ा बांध पर बननी शुरू हुई और गांवों कस्बों तक पहुंची । नेहरू जी ने जिस दिन भाखड़ा गांव के पास इस पनबिजली संयंत्र का उद्घाटन किया वहां भीड़ में गायक ने गीत सुनाया 'भाखड़े तो औंदी मुटियार नचदी, चुन्नी ओदे सिर उत्ते सुचे कच दी ।' यह मुटियार बिजली ही थी जिसने पंजाब हरियाणा हिमाचल राजस्थान और दिल्ली तक को रोशन किया । बड़े कारखाने और उद्योग शुरू हुए । गांव शहर में आकर बसने लगे । गांव का होरी शहरी बाबू बनकर फख्र महसूस करने लगा । सब बिजली का पुण्यप्रताप था । शुरू शुरू में बिजली वंचित गांव का कोई भोला स्याना बिजली वाले गांव जाता तो आश्चर्य से अधपगला हो जाता कि यह कैसा दीपक बनाया है सरकार जिसमें न तेल है न बाती ,न जगाने को दियासलाई न बुझाने को फूंक मारने की जरूरत ।यही बिजली बड़ी दुर्घटनाओं का सबब बनी फिर भी इसका जादू चलता रहा । बिजली का मुरीद बनने के बाद बिल झटके मारता है । गरीब आदमी के बजट का अच्छा खासा हिस्सा बिल में जाता है । घरों से लालटेन चिमनी वर्षों पहले कूच कर गये । खाना खाते समय बिजली जाती है तो कोफ्त होती है ।जिनका हाथ फुरता है वे इन्वर्टर लगाते हैं सौर ऊर्जा का आनंद लेते हैं । गरीबआदमी कट के दौरान अमीर के घर लोटिया जलता देखकर अपना खून जला कर रह जाता है । सरकार कोयला खत्म है या दो दिन का ही बचा है कहकर डराती रहती है । बिजली फिर भी आंख मिचौली जारी रखती है ।नहरबंदी भी उन दिनों करवाई जाती है जब सर्वाधिक पानी चाहिये होता है । सावनी की बिजाई और घर गृहस्थी के लिये भी इन्हीं दिनों ज्यादा लागत बढ़ जाती है ।अफसर लोग इन्हीं दिनों बंदी मांग लेते हैं, उन्हें इस थ्योरी की ज्यादा समझ होगी ।जलदाय विभाग के जुम्मे पानी पिलाने का दायित्व है वे बंदी में नलकूपों का पानी सप्लाई करके हाय तौबा से बचे रहते है अन्यथा शहरों में हर साल औरतें उनके दफ्तर के आगे पहले से क्रेक घड़े ले जाकर पूरी एक्टिंग के साथ मटका फोड़ स्यापा करतीं थीं । मीडिया में खबरें बनतीं ।अफसरों की जान सांसत में आई रहती ।इस मटका फोड़ अभियान की अगुवाई करने वाले कई शख्स बाद में पार्षद बने।घरों में पानी की टँकी भरी दोपहरी कांड करने पर आमादा रहती है । भूल से कोई आदमी फुहारा छोड़ नहाने बैठ जाये तो फौरन अस्पताल ले जाना होगा । संडास की तूतरी छोड़ना भी भारी पड़ सकता है ।वो फफोले होंगे कि डॉक्टर देखना न चाहेगा मरीज दिखाना न चाहेगा । इस टँकी का पानी किसी भी मौसम में रास न आया । सर्दी में बर्फ से ठंडा और गर्मी में बाल्टी भर पानी में आलू छोड़ दें तो उबल जायें ।बिजली पानी के साथ अगर इंटरनेट भी बंद हो जाये तो लगता है जीवन ही व्यर्थ जा रहा है ।
अ अफीम ग गाड़ी में रख पुरानी कहावत है जो गुड़ देने से मर सकता है उसे जहर क्यों दिया जाये ,अब कहावत बदल कर यह हो गई कि जिसे अफीम केस में फंसाया जाये उसके सामने आने की क्या जरूरत है ? अफीम शाही नशा है । शराब जैसा घर ऊजाड़ू व्यसन नहीं । अफीम की खेती सरकार खुद करवाती है और खुद खरीदती है फिर भी आम आदमी को उपलब्ध नहीं । अफीम खा कर शराबियों की तरह झगड़ा फसाद नहीं होता बल्कि आम दिनों की बजाय अमली ज्यादा काम करता है । अफीम से पोस्त सस्ता है और मजदूरों से अधिक काम लेने के लिये उनकी चाय में चोरी से पोस्त या अफीम मिला कर दी जाती थी यही बेईमानी उड़ता पंजाब का कारण हो गई । हमारे यहां भी हाड़ी के दिनों में आम तौर पर हर किसान के घर में अफीम मिल जाया करती थी । तर्क होता था थकावट नहीं होती । यह भी कहा जाता है अफीम खून को पतला करती है और ब्लड प्रेशर को सही रखती है । कई दवाइयों में अफीम की मात्रा रहती है । मांग हो रही है कि अफीम सर्व सुलभ कर दी जानी चाहिये । अफीम लोक जीवन में घुली मिली है । कितने ही लोक गीत अफीम पर बने हैं ।अमलियों पर बने चुटकले हास्य विनोद पैदा करते हैं । मारवाड़ में मनुहार का जरिया ही अफीम है । घर आये मेहमान या मिजाज पुर्सी को आये लोगों को पानी में अफीम घोल कर 'घूंटीया' पिलाना आम बात है । सर्दी में छोटे बच्चों को बाजरी के दाने जितनी देते रहने का रिवाज रहा है । लकवा के अटैक के समय ग्रामीण क्षेत्र में आज भी अफीम पर निर्भरता की बात चलती है । इन दिनों जिले में फिर से यही अफीम चर्चा में है । हमारे सार्वजनिक पड़ोसी गिरधारी लाल के घर से सुबह से ही तेज आवाजें आ रही थीं । वे निखट्टू पुत्र से गुस्से से बतिया रहे थे लगता था लड़ रहे हैं । कह रहे थे 'कोई काम धाम पकड़ ले ,मेरा घर सराय नहीं है जो रैनबसेरा करने आ जाते हो ।' जवान लड़का सामने से सटीक प्रश्न कर रहा था 'क्या काम करूँ?' तो गिरधारी लाल कह रहे थे 'किसी की गाड़ी में अफीम ही रख दे । कुछ दिन जेल जायेगा तो भी घर में तो शांति रहेगी । रोटियां तो सरकारी तोड़ेगा ।' लड़का पूछ रहा था 'डेढ़ किलो अफीम जितने पैसे होते तो मैं आपके मुंह लगता क्या ? कोई दुकान न कर लेता । आपकी जली कटी तो न सुनता ।' गिरधारीलाल बेटे से दबना नहीं चाहते थे बोले 'अनाज के दुश्मन तुझे अकल कब आएगी पहले किसी से चार पांच लाख उधार ले फिर उसे किसी से मिलकर लपेटे में ले । दुकानों जमीनों पर कब्जे करने हों तो आजकल इसी ट्रिक का ट्रेंड है ।' पर लड़का टस से मस न हो रहा था ।पुराने जमाने के राजा महाराजा शत्रु को ठिकाने लगाने के लिये विषकन्या का सहारा लेते थे । कौटिल्य के नीतिपरक ग्रन्थ 'अर्थशास्त्र' में विषकन्या तैयार करने, उससे काम लेने,शत्रु को सुलटाने व उससे बचने आदि के उपायों पर पूरा अध्याय लिखा पड़ा है । दूसरे से पीछा छुड़ाने के लिये तीसरे के कंधे पर रख कर चलाने वाले हर युग में हुए हैं । हनुमानगढ़ में किसी को फंसाने के लिये अफीम का सहारा इस काम में लेने का दूसरी बार उदाहरण सामने आया है । पुलिस के सभी अधिकारी भ्रष्ट नहीं होते । पिछले अफीम कांड में भी सही जांच में दूध का दूध पानी का पानी छान दिया था । जिस व्यक्ति की गाड़ी में कोर्ट परिसर में ही अफीम रखवाई थी वह निर्दोष साबित हुआ । ऐसा ही ताजा मामले में हुआ है जबकि मामले के तार हरियाणा के साथ भी जुड़े थे । वहां की पुलिस ने भी अत्यधिक जल्दवाजी और अतिरिक्त तेजी दिखाई थी। मामला मुख्यमंत्री हरियाणा तक पहुंचा और पीड़ित को फौरी राहत मिली । बहुत सारे निर्दोष जेलों में विचाराधीन पड़े रहते हैं वर्षों बाद वे निर्दोष साबित भी हो जायें तो क्या फायदा ,उम्र ढल जाती है । सबके मामले में समाज या संगठन बराबर नहीं खड़े होते और न ही डॉक्टर रामप्रताप जैसा धुरंधर सबकी पैरवी करता है । इन दोनों वारदातों में रसूखदार लोगों का नाम जुड़ा पाया गया । वैसे तो जांच बंद नहीं हुई, केस का पटापेक्ष नहीं हुआ, जांच लम्बी चलेगी । पीड़ित को जरूर छोड़ा गया है । अब वह निश्चित हो कर नाटक के आगामी एपिसोड का दर्शक बनेगा । पकड़ा आरोपी गवाह बनेगा और फोन की काल डिटेल आदि निकलवाई जाएगी । कहा गया है निर्दोष पर आंच न आएगी दोषी चाहे कोई भी हो छोड़ा नहीं जाएगा । हो सकता है केस में रोचक नाटकीय मोड़ आयें । कहां से शुरू हुआ मामला कहां जाकर फनिश हो। कर के डैश बोर्ड और स्टेपनी के भेद में वकील लोग कितनी युक्तियां इस्तेमाल करेंगे । कौन बरी होगा कौन नपेगा । काली अफीम कितने सफेद कपड़ों की तरफ उंगली उठाने का मौका देगी । किन किन को पछतावा होगा किसके घर घी के दीये जलेंगे, किसकी राजनीति की रोटियां सिकेंगीं, किसके कितने वोट पक्के हुए । पार्टी में अपने पराये का पता चलेगा । शहर की नाक के सवाल पर कितने अपने रूसाये जाएंगे यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन अफीम बदनाम हो गई । जिसे कालेज के दिनों में बटुए में मोमी कागज में प्रेमिका की तस्वीर सी सम्भाल कर रखते थे दोस्तों से कहते थे , सफेद आंख तो भेड़ की होती है । मर्द की आंख तो लाल ही अच्छी लगती है, छक ले मावा । वही अफीम हथकंडों में इस्तेमाल हो रही है । नकली बिकने लगी है और सोने के भाव हो रही है । कुछ भी हो 'नाग दी बच्ची' को आपसी दुश्मनी निकालने का ओछा हथियार नहीं बनाया जाना चाहिये । किसी से रंजिश निकालनी है तो यह नई बर्णमाला न लिखी जाये, यह मर्दों वाली बात नहीं है । उसके लिये कोई और रास्ता चुना जाना चाहिये।
उमरां च की रखया उम्र के हिसाब में कांग्रेस इस देश में सबसे बजुर्ग बूढ़ी माई है । एक सौ छत्तीस साल की हो गई । इस उम्र में बुढापे के लक्षण व्यूटीपार्लर के पास जाने से भी नहीं छुपते ।उम्र की बात और कांग्रेस के ग्रह आपस में मेल नहीं खाते । पार्टी की नींव अंग्रेज ने रखी है इसलिये कुछ अंश अंग्रेजियत के सदा रहते आये हैं । नेहरू जी के कपड़े पेरिस से धुल कर आते थे । झीलों की नगरी उदयपुर में कांग्रेस का चिंतन शिविर सम्पन्न हुआ उसमें वही बात हो गई, जिसका डर था । उम्र की बात चल निकली जिसे बाद में मेजबान राज्य के कांग्रेसियों ने ही नकार दिया । विरोधियों ने इस आयोजन को चिंता शिविर, किसी ने कहा यह मृतप्राय पार्टी का चिता शिविर है । खैर विरोधी तो बाल की खाल उधेड़ेंगे ही । खूबसूरत शहर में चार सौ के लगभग कांग्रेसी इकठ्ठे हुए महंगे होटलों में लजीज खाना, घूमना- फिरना भी हो गया बड़ों के साथ बैठना भी हुआ और पार्टी में अपने कद का पता भी चल गया । पूरे देश से पार्टी के विश्वसनीय जन बुलाये गये थे ।राजस्थान से केवल दो विधायक ही शामिल हो पाए उनमें एक नोहर विधायक अमित चाचाण सौभाग्यशाली रहे । गांधी परिवार से सोनिया जी, राहुल गांधी व प्रियंका जी भी उत्साह के साथ शामिल रहे । सोनिया जी ने कहा पार्टी ने आपको बहुत दिया है अब लौटाने की बारी है । उन्हीं की नजरे -इनायत का हर कोई चाहवान था । जब मां, बेटा, बेटी में से कोई एक भी सामने होता है तब असली कांग्रेसी खुद को भूल जाता है, बस तू ही तू ही का अलाप करता है । उसकी रीढ़ लचकदार हो जाती है । यह इस पार्टी की परिपाटी है । पंजाब से इसी दौरान बुरी खबर भी मिली वहां के कद्दावर और मूल कांग्रेसी सुनील जाखड़ ने गम्भीर आरोप लगाते हए पार्टी छोड़ दी और आश्चर्यजनक रूप से भाजपा ज्वाइन कर ली राजस्थान से भी दो विधायक भाजूँ भाजूँ कर रहे हैं । शिविर में सोनिया जी के सामने किसी ने भी यह कहने की जुर्रत नहीं की कि पार्टी में जान डालने के उद्देश्य से एक कार्यकाल के लिये आपके परिवार से बाहर के व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष बनाने का प्रयोग किया जाये । सब जानते थे ऐसा कहने वाले की फजीती पक्की थी । सब ने राहुल को अध्यक्ष बनाने पर ही जोर दिया । सब चापलूसी की महिमा जानते हैं । यह बात शिविर में आये उस प्रस्ताव से साबित हो जाती है कि एक परिवार से एक को ही टिकिट मिलेगी पर यह पाबंदी गांधी परिवार पर लागू नहीं होगी । नतमस्तक संस्कृति का उदाहरण कई बार वायरल हो जाता है ,किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री गांधी परिवार के सदस्य को ऊंट पर चढ़ाते समय छुट भैया नेताओं, अधिकारियों के लवाजमे के बावजूद खुद कंधे पर पांव रखवाने को जीवन सफल मान चुका है । एक बार इसी परिवार की एक महिला की जूती भीड़ में खुल गयी थी तब भी मुख्यमंत्री लोगों के पांवों की ठोकरों के बीच तलाश कर खुद पहनाकर फख्र महसूस कर चुका है । हो सकता है किसी चमचे ने जूती ढूंढ ली हो श्रेय मुख्यमंत्री जी को दिलवाने के लिये उन्हें पकड़ा दी हो । दीन दुखी की सेवा करने का भला काम गांधी परिवार ने भी किया होगा पर उन्हें उनका प्रचार करना नहीं आया जैसा मोदीजी ने मैला उठाने वालों के चरण पखार कर हासिल कर लिया था । चिंतन शिविर से उस नेता को बाहर रखा गया जिसके लिये लोग पागलों की तरह चिल्लाते थे हमारा युवा ह्रदय सम्राट जिन्दावाद । जिसे मिली उपमुख्यमंत्री की कुर्सी से सब्र न था और भयंकर करोना काल में सरकार को होटल दर होटल भटकने को विवश कर दिया था । उसे सोचना चाहिए था राजस्थान में सिर्फ ननिहाल ही है । मेरा प्रदेश तो यूपी है यहां की बड़ी कुर्सी कैसे दे देंगे । लेकिन नजरें उसी कुर्सी पर हैं । यहां वाले कह रहे हैं "आई छाह लेण,घर गी धिराणी बननी चावै ।" उस युवाह्र्दय सम्राट की अनुपस्थिति में एक यह प्रस्ताव भी आया कि पार्टी संगठन में पचास प्रतिशत पद पचास साल से कम उम्र वालों से भरे जायें । उम्र के सवाल पर पहले भी पार्टी की खीर जूतों में बंट चुकी है ।इतिहास के आईने की गर्द साफ करके देखें तो इंदिरा जी ने भी कभी अपनी जवानी के दिनों में पार्टी पर काबिज उम्रदराज बजुर्गों का पत्ता साफ करने का प्रयास करते हुए कह दिया था कि साठ साल से बड़े नेता को कोई पद नहीं मिलेगा कामराज, निजलिंगप्पा व मोरारजी देसाई आदि उनके निशाने पर थे । यह प्रयास उल्टा पड़ गया । कांग्रेस और चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी बूढ़ों के हाथ रही । इंदिरा जी को नई पार्टी,नया नाम और निशान गाय बछड़ा बनाना पड़ा । सन्देश था बैलों की जोड़ी दोबारा बनेगी । थोड़े दिनों बाद इंडियन नेशनल कांग्रेस और बैल घास चरने चले गए और कांग्रेस आई के नाम से हाथ चुनाव चिन्ह सामने आया । कांग्रेस का हाथ सबके साथ को ध्यान में रखते हुए दोबारा उम्र पर चिंतन नहीं किया । पता नहीं क्यों उदयपुर शिविर में फिर से इस गड़े मुर्दे को उखाड़ लिया । इससे कितने ही भूतपूर्व युवाओं में हलचल मच गयी । सोनिया जी के सामने कोई बोला नहीं बाद में मंत्री जी से कहलवा दिया कि उम्र की बात करना अपनी कमजोरी दिखाना है । प्रधानमंत्री की उम्र देख लेनी चाहिये । बात में संतुलन बनाते हुए यह भी कहा कि युवाओं को मुगालते में नहीं रहना चाहिये कि वे फिट हैं तो टिकिट उन्हें ही मिलेगी । एक परिवार से एक टिकिट पर भी उन्होंने कहा है कि जिसमें दम होगा वह धरती फाड़ कर भी बाहर आ जायेगा । यानी ये दोनों सुझाव यहां तो नकार दिए गए हैं । विश्लेषक मानते हैं इन प्रस्तावों को नकारने को मुख्यमंत्री की सहमति मानना चाहिये उनके खास मंत्री ने यह सब कहा है और मुख्यमंत्री को 'युवा' शब्द असहज भी करता होगा । भला मार्ग दर्शक मंडल में कौन जाना चाहेगा । मज़ाक में भी किसी कांग्रेसी से पूछा जाये कि 'उमरां च की रखया' तो वह ट्यून मिलाते हुए कहेगा 'दिल होना चाहीदा जवान ।'
कोरी मटकी( कहानी) रूपसिंह राजपुरी उसके कई नाम प्रचलित थे। अनिंद्दय रूप राशि के कारण घरवालों ने उसका नाम फूलां रानी रखा था,सख्त और गुस्सैल स्वभाव होनेके कारण उसे फूलनदेवी भी कहा जाता था।उन दिनों डाकू फूलन देवी बीस बाईस मर्दों को बन्दूक से मार कर खूब चर्चा में थी ।फूलां भी बात बे बात किसी के भी थप्पड़ जड़ने में संकोच न करती थी ।गली मोहल्ले के बच्चे खेलते दिखते तो उनके खेल में जा टांग अड़ाती ।रस्सी कूद आती -पाती या छुपा छुपाई खेलते बिल्कुल अबोध बच्ची बन जाती ।धरती पर लोट कर हाथ पांव चलाती ,झूठमूठ रोती, जानबूझ हार जाती ,तब दुनिया भर की मासूमियत उसके चेहरे पर सिमट आती । बच्चों को तब वह बिना पंखों की परी लगती । लम्बरदार रणजीत सिंह के चार बेटे चार बेटियां हैं ।बड़े सातों बच्चों की शादियां कई साल पहले कर रखी हैं ,वे बाल बच्चेदार हैं।बस फूलां की शादी बाकी है। वह सबसे छोटी सन्तान होने के कारण लाडली भी बहुत है ।अगर उसकी भी शादी कर दी होती तो वह भी अब तक कई बच्चों की मां बन गयी होती ।उम्र के पच्चीसवें वर्ष में चल रही है। रिश्ता हुए पांच छह साल हो गये।शादी की योजना बनती है तब लम्बरदार जमीन का सौदा कर बैठता है अतः शादी अगले साल पर सरका दी जाती है ।इस तरह एक एक साल निकलने से उसकी उम्र काफी हो रही है । लम्बरदार ने भी निर्णय कर रखा है किआखिरी शादी है धूमधाम से करेंगे ,लेट होने की एवज में दहेज ज्यादा देंगे ।वैसे भी चेहरे मोहरे से पचीस की लगती भी नहीं ।गोरा रंग ,भरवां शरीर ,हाथ पांव लड़कों जैसे मजबूत हैं क्योंकि घर और खेत के काम में बराबर भाग लेती है ।खान पान खुला है ।दूध दही और खूब सारा घी भोजन में शामिल रहता है । अच्छी खुराक के साथ श्रम साध्य काम करने से शरीर गोले जैसा और फुर्तीला है।जिस बोरी को इधर उधर सरकाने के लिये चारों भाभियाँ जोर लगा बैठती हैं उसे वह अकेली ही उठाकर दूसरी जगह रख देती है ।तब भाभियाँ उसे पहलवान कह कर छेड़ती हैं , "ननदी,तुम्हें तो दंगल में जा कर कुश्ती करनी चाहिये।" "करूँगी न ,तुम्हारे छोटे ननदोई के साथ ,जाते ही चित कर दूंगी ।" कहकर वो आंख मारती और मुस्कराकर बाहर निकल जाती ,भाभियाँ उसका लोहा मान जातीं ।कई बार वह दो भाभियों के हाथ अपने हाथों से पकड़कर कहती ,छुड़वालो,भाभियाँ पसीनों पसीन हो जातीं पर छुड़वा न सकतीं । न तो लम्बरदार कभी स्कूल गया न उसका कोई बच्चा ।दो बहुएं दो चार क्लासें पढ़ी आ गयीं हैं ,उनसे फूलां ने घर पर ही नरमा तोलने का कांटा देखना ,सौ तक गिनती ,छोटा जोड़ बाकी और कॉपी में लिखना सीख लिया था ।अब लम्बरदारके छोटे पोते पोतियां स्कूल जाने लगे हैं ।नरमा कपास की चुगाई के दो महीने फूलां के लिए हर साल भारी रहते हैं ।सुबह होते ही चुगारी औरतों को खेत ले जाना ,उन्हें खाना ,चाय और बार बार पानी देने में ही दिन निकल जाता है ।बीच में फुर्सत मिलती तो खुद भी चुगती ।पीठ पीछे झोली बंधी ही रहती ।शाम को सबकी गठरियाँ तोल कर कॉपी में लिखना ,अंधेरा होने पर घर जाना ,आकर कई खास भैंसों को दूहना भी उसके जिम्मे था, क्योंकि वे भैंसें उसके बगैर किसी को नजदीक न लगने देतीं थीं ।कई बार ट्रैक्टर मंडी गया होता तो खेत से चुगा नरमा लाने में देर हो जाती ,चुगारियाँ इंतजार न करतीं वे पैदल ही गांव को चल पड़तीं ऐसे में फूलां रात तक 9खेत में बैठी रहती ,डरना तो वह जानती ही न थी । उस जमाने में अश्पृश्यता का बहुत चलन था ,स्थानीय भाषा में जिसे "भींट"कहते थे यानि जातिगत भेदभाव चरमोत्कर्ष पर था ।हीन कही जाने वाली दलित जातियों के लोगों को हेय कहकर छुआ न जाता था न ही उनकी छुई चीज के हाथ लगाया जाता ।उन्हें केवल खेत के कठिन कामों ,पशुओं की सार सम्भाल और गोबर बुहारी में ही लगाया जाता था ।चूल्हे चौके तक तो क्या उन्हें भीतरी आंगन पर चढ़ना भी मना था ।खुद मटके से पानी भरकर पी लेना अक्षम्य और दण्डनीयअपराध हो जाता था ।वे फसल ला कर आंगन में रख देते भीतर कोठयार में घर वाले ही भरते ।उन्हें पानी या खाना दूर से ही दिया जाता ,घर का बर्तन देने का तो सवाल ही न था ।दलितों ने भी सदियों से चले आ रहे इस अन्याय पूर्ण व्यवहार को नीयति मान रखा था ।वे भी धर्म पालन की तरह इन सामाजिक भेदभाव के बन्धनों का निर्वहन करने का भरसक प्रयास करते ।दासता उनकी मानसिकता में गहरे तक पैठ गयी थी । फूलां भींट के मामले में बहुत कट्टर थी ।भूल से भी किसी दलित का हाथ घड़े को लग जाता तो वह आग बबूला होकर घड़ा फोड़ देती । गाली गलौज के साथ वो व्यवहार करती कि "दोषी" माफी मांगता ही रह जाता ।नरमा चुगाई के समय उसका वास्ता दलित औरतों से पड़ता था जिन्हें वह डंडे के बल पर हांकती रहती ।उन्हें एक वक्त का खाना ,दो बार चाय और दिन भर पानी देते देते वह चिड़चिड़ी हो जाती ।सुबह ट्राली पर चुगारियाँ के साथ चार पांच घड़े पानी भी खेत में जाता ।जब भी उन्हें पानी देना होता उनके बर्तन में डालकर डंडे से परे सरका देती ,सुबह की रोटियां लम्बरदार साइकिल पर देकर जाता ।तन्दूर की बनी हर दो रोटियों के बीच प्याज की चटनी और अचार रहता ,सबको छाछ की एक बाटकी भी मिलती ।शाम की चाय के साथ भी सुबह की बची दो दो रोटियां दी जातीं।इन दिनों घर में बहुओं की भी फिरकी घूम जाती ,उन्हें खुद के लिये समय ही न मिलता ।सारा दिन चूल्हे चौके में ही लगी रहतीं ।अन्य खेतों में सरसों व गेहूं के लिए जमीन तैयार करने वाले आदमियों के लिए भी खाना जाता था ।लम्बरदार भी लाटू सा घूमता रहता जिस दिन पानी की लागत ज्यादा हो जाती और समय से पहले खत्म हो जाता तब सिर पर घड़ा उठाकर फूलां किसी चुगारी को साथ लेकर खेतों में बनी तलाई से पानी लेने निकल जाती ।उनके खेत से लगभग दो किलोमीटर दूर गोचर भूमि में वर्षों पूर्व एक छोटा जोहड़ खोदा गया था जो बीस आँगल बरसात से ही लबालब भर जाता,तब वह खेतों में काम करने वालों, गड़रियों, ग्वालों के लिए बेहतरीन जलस्रोत रहता ।फूलां बहुत बार यहां से पानी भरकर चुगारों को पिलाया करती थी ।साथ में किसी औरत को तो ले आती थी परन्तु घड़ा खुद ही उठाकर सिर पर बड़ी फुर्ती से रख लेती थी ,भींट मुख्य कारण था। वैसे भी उसमें अथाह शक्ति थी ।उसका रिश्ता भी उसकी ताकत और कर्मठता के कारण हुआ था ।हुआ यह कि उनके गांव बारात आयी हुई थी। रिवाज था ,अलग अलग घरों में बाराती ठहराये जाते थे ।उनके नहाने धोने ,चाय पानी,चारपाई ,बिस्तर,हुक्का आदि की व्यवस्था घरवालों के जिम्मे रहती ।लम्बरदार के दूर के भतीजे की बेटी की शादी थी ।वह लड़की फूलां से सात साल छोटी थी ।दस बाराती इनके घर ठहरे थे ।वे सुबह नहा कर चाय के बाद हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे ,सभी अधेड़ उम्र के थे ।फूलां नें वहीं भैंस दूहने के लिये पाडा छोड़ा।पाडा तीन चार महीने का था ।इतने बड़े काटडू को भैंस के थनों से छुड़ा कर दूर ले जाकर बांधना खाला के बाड़े से खरबूजे तोड़ने जितना आसान नहीं होता ,वो शान ले लेता है ।ऐसी स्थिति में कमजोर औरतें रोने लग जाती हैं ।बाराती देख रहे थे ,फूलां ने पाडे की बूथी में हाथ डाला और ताकत के साथ खींच कर दूर बांध दिया और झमाझम दस सेर पक्का दूध निकाल बाल्टी भीतर ले गयी ।एक बाराती सब माजरा बड़े गौर से देख रहा था, वह अपने साथियों से बोला,"यारो,ऐसी लड़की बहु के रूप में मिल जाये तो घर के सोए भाग जाग जाएं ।""तो ले चलते हैं तेरे बेटे कुलदीप के लिये,लड़की तो हमने देख ही ली है ।"एक दूसरा बाराती बोला ।"यह लड़की मिल जाये तो बिना दहेज एक रुपये नारियल में ही ले जाने को तैयार हूं।"वह फूलां के रूप में पुत्रबधु का सपना देखने लगा था ।"दहेज की इस घर में क्या कमी है ।लम्बरदारजी के पास छह मुरब्बे जमीन है पानीवाली ।"दूसरा बाराती भूमिका बांधने में जुट गया था ।"तो बन जा बिचौला,तेरे लिये सोने की अंगूठी पक्की ,चाहे आज ही ले ले ।मेरे बेटे को भी साठ बीघा आती है झोटे के सिर जैसी ।"पहले बाराती ने मन बना लिया था ।"लम्बरदार मेरी रिश्तेदारी में है ,मेरी बात नहीं टालेगा ,बात पक्की समझो ।"दूसरा बाराती निश्चित था ।उसने एक महीने में ही रिश्ता करवा दिया ।तबसे ही लड़के वाले विवाह मांग रहे हैं,लम्बरदार मोहलत मांग रहा है ।लड़के के बाप ने फूलां को ही बहू बनाने की ठान रखी है वरना उसके लड़के को रिश्तों की क्या कमी?दो तीन दिन से चुगारियाँ के साथ एक लड़का भी आने लगा था ,उसे नरमा चुगने का अभ्यास न था ,बस अपनी मां की कुछ सहायता कर रहा था ।खाने के समय उसकी मां से फूलां ने पूछा,"चूना भाभी यह लड़का कौन है ?""तेरा भतीजा है बाईसा,यानि मेरा बेटा,अब तक ननिहाल में रहकर पढ़ रहा था ,आठवीं पास है अब नौवीं में देखते हैं पढ़ाना है या आप जैसे घरों में सीरी लगा दें ।"लड़के की मां ने रोटी का कोर तोड़ते हुए कहा ।"आठवीं?देखने में तो बड़ा लगता है ।"फूलां ने लड़के को गौर से निहारा ।ऊपर वाले होंठ पर कालिमा छा रही थी ।दाढ़ी भी निकलने वाली थी ।"हां बाईजी ,अठारहवां लगा है इसे ।ननिहाल में मामियों की सेवा में लगा रहा ,एक क्लास दो साल में पास करता रहा है ।"चूना चुगारी ने कहा तो सब हंसे ।लड़का गर्दन नीचे करके रोटी खाता रहा ।"ले रे भतीज एक रोटी और ले ले ।ननिहाल में रहकर शर्माना ही सीखकर आया है ।"फूलां नें रोटी उसकी तरफ फेंकनी चाही ।"बस भुआ जी ।"गर्दन झुकाये वह इतना ही बोल पाया ।"तू तो बस स्कूलिया ही रह गया ।तेरी उम्र के लड़के तो रोटियों की रेल बना देते हैं ।"फूलां ने रोटी उसके आगे पड़ी कटोरी पर रखदी ।"क्या नाम है तेरा ?"फूलां अब उसमें दिलचस्पी लेने लगी थी ।"राकेश।"लड़का धीमी सी आवाज में बोला ।"सुंदर नाम है हमारे लड़कों जैसा ,तुम्हारे तो ननकू,मनकू,कोझिया या मंगतू वगैरा रखते हैं ।"फूलां ने बिना मांगे उसकी कटोरी में पानी डाल दिया ।उसके बाद फूलां जब भी उस लड़के को बुलाती "स्कूलिया "ही कहती ।वह भी शाम को गठरियाँ तुलवानेऔर कांटा देखने में मदद करने लगा था ।एक दिन खेत जाने से पहले नहाने के लिये रात को धो कर सुखाये कपड़े खूंटी से उतारने लगी तो फूलां को उसकी मां ने टोका ,"कभी तो ढंग के कपड़े पहन लिया कर बेटा ?इन कपड़ों में काम वाली बाई लगती है ।""मां मैं खेत जा रही हूं ,मुकलावे नहीं ।"फूलां ने हंसकर मां को कहा ।"जवान जहान बेटियों पर तो गहरे रंग के कपड़े ही अच्छे लगते हैं ।"कहकर उसकी मां अंदर चली गयी और सन्दूक से उसके ससुराल से सिंधारे में आया गूढ़े येलो कलर का सूट लेकर आयी।"आज यह पहन ।"मुस्काते हुए फूलां ने सूट ले लिया ,उसपर हाथ फिराया और लेकर बाथरूम में घुस गयी ।जब वह तैयार हुई तो उसकी मां एकटक देखती रह गयी ।"तू इतनी सुंदर है रे फूलो।"कहकर मां ने उसे छाती से लगा लिया ।उसकी आंख से उंगली छुआ कर काजल का एक टीका उसकी गाल पर लगा दिया ।"मां की भी नजर लग जाती बच्चों को ।" उसकी बलईयां लीं।उसकी भाभियों ने भी उसकी सुंदरता की तारीफ की ।ज्यादा पढ़ी लिखी भाभी बोली ,"आज तो ननदी ऐसी लग रही है जैसे ब्यूटी कम्पीटीशन में जा रही है।"जब तक वह तैयार हुई उसका बड़ा भाई चुगारियों को ट्राली में चढ़ा कर ले आया था ।वह चढ़ी तो खुशबू की लपट सबको महसूस हुई ।औरतें देखती रह गयीं ।वह अपने निर्धारित स्थान पर रखे मूढ़े पर बैठ गयी ।पानी के घड़े उसके पास ही रखे थे ।स्कूलिया एक कोने में बैठा उसे कनखियों से देख रहा था ।वहां से चलने के बाद कुम्हारों का घर आया तो वह ट्रैक्टर रुकवाकर उतरी ।वहां से उसने एक कोरी मटकी खरीदी ।"यह सिर्फ मेरे लिये,घड़ों का पानी अब ठंडा नहीं रहता ।"मटकी अपनी गोदी में लेकर बैठते हुए फूलां ने कहा ।"मटकी का रंग भी तुम्हारे सूट जैसा है बाई सा ।" एक चुगारी ने कहा,लेकिन कोई समझ न पाया ,प्रशंसा सूट की की है या मटकी की । खेत में जाकर सब अपने अपने काम से लग गए ।फूलां खाली खाले में चक्कर लगा कर आती और घड़े में मूंह देख कर बाल सँवार लेती ।खाने के बाद गर्मी ज्यादा ही बढ़ गयी थी ।आसोज के दिन गर्म और रातें ठंडी हो जाती हैं ।नरमा चुगते समय हवा नहीं लगती ।पसीना बहुत आता है।दोपहर को उसके याद आया नई मटकी में भी पानी भरना है ।उसने बूढ़ी चुगारी को साथ चलने का कहा तो वह हाथ बांध गयी ,साथ में सुझाव दे गयी कि स्कूलियाकोई काम नहीं कर रहा उसे ले जाओ ।उसकी मां ने भी सहमति दे दी तो वह पीठ पर बंधी झोली खोलकर साथ चलने को तैयार हो गया ।सिर पर मटकी,उसपर ढक्कन के रूप में बाटकी रखकर फूलां मजाजन अंदाज में पगडण्डी पर चल पड़ी ।लड़का उसके पीछे पीछे चप्पल फटकारता चला जा रहा था ।पाजेब की रुनझुन और चप्पल की फटक फटक में कहीं सुर ताल नहीं बैठ रहा था ।फूलां के दोनों हाथ मटकी पर थे ,उसकी बगलें पसीनें से भीगी पड़ी थीं ।गर्दन और पीठ पर से कुर्ती गीली हो रही थी।फिट सूट में उसकी कमर के नीचे की गोलाइयाँ ऊपर नीचे हो रही थीं ।लम्बी चोटी कभी इधर तो कभी उधर दस्तक दे रही थी ।नयी जूतियां चर्र चूं चर्र चूं कर रही थीं।धूप से बचने के लिये उसने थोड़ा घूंघट निकाल रखा था ,जो आंखों को ढके हुए था ।गालों को भी दोनों तरफ से ढककर दुपट्टा मुंह में दबा रखा था ।मटक मटक चलते हुए वह लड़के से बातें भी करती जा रही थी ।उसके ननिहाल ,स्कूल,अध्यापक,मामियांऔर किताबों की बातें ।जब कभी रुक कर उसकी तरफ देख कर उत्तर पूछती तो लड़का उसे देखता ही रह जाता ।चेहरा ऐसे लगता जैसे गुलाबों के गुलदस्ते में दो मोमबत्तियां जग रही हों ।छाती के उभार और भी स्पष्ट हो जाते ।कुछदेर बाद वे तलाई की पाल से पानी की तरफ उतर रहे थे ।फूलां ने तो यहां का चप्पा चप्पा देख रखा था ,लड़का पहली बार आया था सो वह प्राकृतिक छटा फटी आंखों से देख रहा था ।सघन पेड़ों की हरियाली युक्त छाया चारों ओर थी लेकिन उनके नीचे कांटे ,सूखे पत्ते और भेड़ बकरियों की मींगनीयों की गन्दगी थी ।फूलां जानती थी पेड़ों के झुंड के नीचे गड़रियों ने कपास की बनछटियों से एक शानदार झोंपड़ी बना रखी है ,जहां वे दोपहर को आराम करते हैं ।पास में ही एक कच्चा चूल्हा है जिस पर चाय आदि बनाते हैं और चौथे पहर फिर भेड़ बकरियां चराने निकल जाते हैं ।आज इधर कोई रेवड़ नहीं आया था ।वह चलती हुई झोंपड़ी के पास आ गयी ।सामने तलाई नीले जल से भरी छोटी झील सी प्रतीत हो रही थी ,जो दो माह पहले सावन की बरसात में ऊपर तक भर गयी थी ।उसने मटकी बाहर रखी और झोंपड़ी के भीतर जा कर लेट गयी ।वहां ठंडक महसूस हुई ।कमर सीधी करते ही उसे आराम मिला ।लड़का बाहर एक पत्थर पर बैठ गया ।थोड़ी देर बाद उठकर बाहर आई तो गर्म हवा का झोंका गुलाब के फूलों को झुलसा गया ।उसने अंगड़ाई ली।सलवार को घुटनों तक ऊपर खींचकर खोंस लिया।फिर मटकी उठाकर पानी की तरफ चली ।लड़के को उसकी गोरी मांसल पिंडलियां सोने जैसी प्रतीत हुईं ।उसे लगा चन्दन के तनों के बाहर पाजेब रूपी सपोलिये लिपटे हैं ।वह पानी के भीतर चली गयी ।मटकी को धोया तो मटियाली महक बिखर गयी ।पानी का संसर्ग पाकर आग में तपी मिट्टी सां सां करने लगी ।मटकी भरकर बाहर आ गयी ।भीगी पिंडलियों का सोना और भी चमकदार हो गया ।मटकी रखकर वह पुनः झोंपड़ी में लेट गयी।उसे चैन न आ रहा था ।वह फिर से बाहर आ गयी ।लड़का चुपचाप ठुड्डी पर हथेलियां रखे उसे देख रहा था ।फूलां ने दुप्पटा झोंपड़ी पर टांग दिया ,बाल खोल लिये और तलाई की तरफ चल दी , गहरे पानी में जा कर डुबकी लगा दी ।मल मल कर नहायी ।फिर झोंपड़ी में आकर खड़ी रह गयी ।बाहर आ कर मटकी उठाई और हंसते हुए लड़के पर उंडेल दी"कितनी गर्मी है तू भी नहा ले ।"वह कुछ नहीं बोला बस भीगे कपड़ों को देखता रहा ।अब दोनों भीग चुके थे ।फूलां के तन पर कपड़े चिपके पड़े थे ।पारदर्शी कपड़ों में बदन झांक रहा था ।वह शीघ्रता से गयी एक मटकी और भर लाई ,तब तक लड़का कमीज उतार कर निचोड़ रहा था ।कपड़ों में वह मरियल दिखता था ,अब उसकी चौड़ी छाती,मजबूत कन्धे और बलिष्ठ भुजाएं साफ दिख रही थीं ।अब वह पहले से ज्यादा गोरा लगने लगा था ।एक मटकी उस पर धार बांधकर और गिरा दी साथ में गुदगुदी भी करने लगी फूलां।दोनों हंस भी रहे थे ,एक दूसरे को छेड़ भी रहे थे । झोंपड़ी तक जाने की तो उन्हें सुध रही उसके बाद बेसुधि का आलम छा गया।उन्हें लगा कुछ पलों के लिए समय की घोड़ी बेलगाम होकर एक अंतहीन गुफा में तेज और तेज दौड़ रही है ।उन्माद उसे ऐड लगा रहा है चाबुक मार रहा है ।घोड़ी थमने का नाम नहीं ले रही ।उत्तेजना उसे उकसा रही है । अंधड़ तूफान के बाद जैसे बरसात हुई हो।नदी ,नाले,तालाब उफ़न कर बह रहे हों ।तपते रेगिस्तान में कायनात तृप्त होकर हरी भरी हो गयी हो ।चारों तरफ आनंद ही आनंद व्याप्त हो ।लड़का पत्थर पर बैठकर पसीना पोंछने और सांसों को संयमित करने का प्रयास कर रहा था ।भीतर फूलां गहरे सन्तोष से सराबोर किसी भी नियंत्रण से मुक्त पसरी पड़ी थी ।बाल चेहरे पर बिखरे थे ।छाती धौंकनी सी बज रही थी ।बन्द आंखों से अभी भी सपना देख रही थी जैसे कुछ समय पहले वह एक पतंग थी और नीले अंतरिक्ष में लहरा रही थी ।लड़के के हाथ में डोर थी।वही उसे नियन्त्रित कर ऊंचा चढ़ा रहा था ।अभी भी वह तितली बन कर फूलों की घाटी में उड़ रही है ,चारों ओर से फूलों की बरसात हो रही है । लड़का उठा ,उसने मटकी से बाटकी भर कर गटागट पानी पीया ।एक और बाटकी भरकर वह वह फूलां के पास आया,उसे देखता रहा ।मुस्कान जैसे फूलां के चेहरे पर छप चुकी थी ।पपड़ाये होंठों से कुछ बोलना चाहती थी पर बोल न पा रही थी ।लड़के ने उसकी गर्दन के नीचे हाथ डाल कर उसे उठाया और अंक में भर ली।फूलां ने अपनी बाहें उसकी गर्दन से लपेट लीं । भारी पलकें खोलने का प्रयास किया जैसे उन पर मनों वजन लदा हो ।लड़के ने बाटकी उसके अधरों से लगाई, "पानी पीलो भुआ ।" फूलां ने एकदम आंखें खोलीं,आग्नेय नेत्रों से लड़के को घूरा। "तुम तो हीन जात हो न ,मेरी मटकी को छूने की हिम्मत कैसे की?" बाटकी दस कदम दूर जा गिरी ।वह अस्त व्यस्त कपड़ों को सम्भालती खड़ी हुई ।सिंधारे में आया नया सूट कीचड़ से सना पड़ा था ।खुले बाल भी मिट्टी में नहाये हुए थे ।उसने लात के एक ही प्रहार से मटकी चकनाचूर कर दी ।
ਦੂਜਾ ਮੱਸਾ ਰੰਘੜ(ਕਹਾਣੀ)ਰੂਪਸਿੰਘ ਰਾਜਪੁਰੀ9928331870 ਨਿਹੰਗ ਸਿੰਘਾਂ ਦਾ ਵੱਡਾ ਕਾਫਲਾ ਤੇਜ ਤਰਾਰ ਘੋੜਿਆਂ ਤੇ ਸਵਾਰ ਹੋਕੇ ਆਪਣੀ ਮੰਜਲ ਵੱਲ ਤੇਜੀ ਨਾਲ ਵਹੀਰਾਂ ਘੱਤ ਰਿਹਾ ਸੀ ।ਗੁਰੂ ਦੀ ਇਹ ਲਾਡਲੀ ਫੌਜ ਆਪਣੇ ਖਾਸ ਬਾਣੇ ਚ ਤਿਆਰ ਵਰ ਤਿਆਰ ਹੈ ਜਿਸ ਵਿਚ ਬਿਰਦ ,ਜਵਾਨ ,ਸਿੰਘਣੀਆਂ ਅਤੇ ਬੱਚੇ ਹੱਥਾਂ ਚ ਕ੍ਰਿਪਾਨਾਂ ਵਰਛੇ ਅਤੇ ਬੰਦੂਖਾਂ ਆਦ ਅਸ਼ਤਰ - ਸ਼ਸ਼ਤਰ ਲੈਕੇ ਖੇਡਦੇ ਹੋਏ ਅੱਗੇ ਵੱਧ ਰਹੇ ਹਨ । ਸਭ ਤੋਂ ਅੱਗੇ ਗੁਰੂ ਕਾ ਕੇਸਰੀ ਨਿਸ਼ਾਨ ਸਾਹਿਬ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਉਸਤੋਂ ਪਿਛੇ ਜਵਾਨ ਸਿੰਘ ਸ਼ੂਰਵੀਰ ਗੱਤਕਾ ਖੇਡਦੇ ਹੈਰਾਨਕੁਨ ਕੌਤਕ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ ।ਕਰੀਬ ਸੌ ਘੋੜਿਆਂ ਦਾ ਇਹ ਜੱਥਾ ਖੇਤਾਂ ਵਿਚਾਲ ਦੀ ਨੱਕ ਦੀ ਸੀਧ ਕੁਰਾਹੇ ਚੱਲ ਰਿਹਾ ਹੈ ।ਸਾਰੇ ਘੋੜੇ ਬੜੇ ਕੀਮਤੀ ਹਨ ,ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਪਿੰਡਆਂ ਤੋੰ ਮੱਖੀ ਤਿਲਕਦੀ ਹੈ ।ਘੋੜਿਆਂ ਤੇ ਖੁਰਜੀਆਂ ਲਦੀਆਂ ਹਨ ਜਿੰਨਾਂ ਵਿਚ ਜਰੂਰਤ ਦਾ ਸਮਾਨ ਭਰਿਆ ਹੈ ।ਰੋਟੀ ਟੁੱਕ ਲਈ ਰਾਸ਼ਨ ਪਾਣੀ ,ਸੁਖਾ ਰਗੜਨ ਆਲੇ ਕੂੰਡੇ ਘੋਟੇ ਅਤੇ ਹੋਰ ਛਿਛਪੱਤ।ਕੁਛ ਬੱਕਰੇ ਭੀ ਨਾਲ ਹੀ ਘੜੀਸੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਜੱਥੇਦਾਰ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਘੋੜਾ ਸਭ ਤੋਂ ਅੱਗੇ ਚਲ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਗੋਦ ਵਿਚ ਇਕ ਬੱਚਾ ਲਗਾਮ ਫੜੀ ਬੈਠਾ ਹੈ ਜਿਸਨੂੰ ਭੁਜੰਗੀ ਆਖ ਕੇ ਬੁਲਇਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ।ਜੱਥੇਦਾਰ ਜੀ ਅਤੇ ਭੁਜੰਗੀ ਵਿਚਾਲੇ ਵਾਰਤਾਲਾਪ ਜਾਰੀ ਹੈ। "ਅਸੀਂ ਕਿੱਥੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਾਂ ਜੱਥੇਦਾਰ ਜੀ?" " ਬੁੱਢਾਜੋਹੜ ਜਾ ਰਹੇ ਹਾਂ ਸਿੰਘ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ।" ਜੱਥੇਦਾਰ ਸਾਹਿਬ ਭੁਜੰਗੀ ਨਾਲ ਬੜੇ ਪਿਆਰ ਨਾਲ ਪੇਸ਼ ਆ ਰਹੇ ਹਨ । "ਬੁੱਢਾ ਜੋਹੜ ਕਿੰਨੀ ਦੂਰ ਹੈ ਜੱਥੇਦਾਰ ਜੀ ?"ਭੁਜੰਗੀ ਉਹਨਾਂ ਵੱਲ ਦੇਖਕੇ ਸਵਾਲ ਪੁੱਛਦਾ ਹੈ । "ਅਸੀਂ ਰਾਜਪੂਤਾਨਾ ਦੀ ਵੀਰ ਭੋਮ ਪਹੁੰਚ ਗਏ ਹਾਂ ,ਹੁਣ ਜਿਆਦਾ ਦੂਰ ਨਹੀਂ ਸਾਡੀ ਮੰਜਲ ।"ਜੱਥੇਦਾਰ ਜੀ ਸਾਮਣੇ ਦੇਖਦੇ ਹੋਏ ਬੋਲੇ । "ਅਸੀਂ ਉੱਥੇ ਕਿਉ ਜਾ ਰਹੇ ਹਾਂ ਜੀ " ਭੁਜੰਗੀ ਨੇ ਇੱਕ ਹੋਰ ਸਵਾਲ ਕੀਤਾ ।" ਅਸੀਂ ਸਾਡੇ ਵੱਡ- ਵਡੇਰੇ ਭਾਈ ਸੁੱਖਾਸਿੰਘ ਮਹਿਤਾਬ ਸਿੰਘ ਹੋਰਾਂ ਦੀ ਬਰਸੀ ਮਨਾਉਣ ਉਥੇ ਜਾ ਰਿਹੇ ਹਾਂ ਸਿੰਘ ਸਾਹਿਬ ਜੀਉ ।"ਜੱਥੇਦਾਰ ਜੀ ਦਾ ਘੋੜਾ ਹਵਾ ਨਾਲ ਗੱਲਾਂ ਕਰਦਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਸੀ ।ਭਾਈ ਸੁੱਖਾਸਿੰਘ ਮਹਿਤਾਬ ਸਿੰਘ ਕੌਣ ਸਨ ।"ਭੁਜੰਗੀ ਦੀ ਜਿਗਿਆਸਾ ਵੱਧਦੀ ਜਾ ਰਹੀ ਸੀ।"ਉਹਨਾਂ ਝੁਝਾਰੂ ਸਿੰਘਾਂ ਨੇ ਸਿੱਖ ਕੌਮ ਦੇ ਦੋਸ਼ੀ ਮੱਸਾ ਰੰਘੜ ਦਾ ਸਿਰ ਵੱਡ ਕੇ ਬੁੱਢਾ ਜੋਹੜ ਲਿਆਂਦਾ ਸੀ ।""ਮੱਸਾ ਰੰਘੜ ਕੌਣ ਸੀ "ਭੁਜੰਗੀ ਸਵਾਲ ਤੇ ਸਵਾਲ ਪੁੱਛ ਰਿਹਾ ਸੀ ।ਜੱਥੇਦਾਰ ਜੀ ਸਿਆਣੇ ਟੀਚਰ ਵਾਂਗ ਉੱਤਰ ਦੇ ਰਹੇ ਹਨ ।"ਸਿੱਖ ਕੌਮ ਨੇ ਆਪਣੇ ਵਜੂਦ ਵਿਚ ਆਉਣ ਤੋੰ ਕੁਛ ਸਮੇ ਬਾਅਦ ਹੀ ਵਥੇਰੀਆਂ ਔਕੜਾਂ ਝੱਲੀਆਂ ।ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਜਾਨ ਮਾਲ ਤੇ ਹਮਲੇ ਹੋਣ ਲਗ ਪਏ ।ਇਹ ਸਮਝੋ ਬੀਜ ਨਾਸ ਦੀ ਨੌਬਤ ਆ ਗਈ ਸੀ ।ਤੱਦ ਧੁਰ ਪੰਜਾਬ ਤੋਂ ਖਾਲਸੇ ਮਾਰੂਥਲਾਂ ਵਿੱਚ ਆਕੇ ਰਹਿਣ ਲੱਗ ਪਏ ।ਦਸ਼ਮੇਸ਼ ਪਿਤਾਜੀ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਮੁਗਲੀਆ ਸਲਤਨਤ ਨੂੰ ਸਿੰਘਾਂ ਦੀ ਵਧਦੀ ਤਾਕਤ ਦਾ ਡਰ ਸਤਾਉਣ ਲੱਗਾ ਸੀ ਕਿ ਸਾਨੂੰ ਸਿੰਘ ਹੀ ਸ਼ਿਕਸਤ ਦੇ ਸਕਦੇ ਹਨ ਹੋਰ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ।ਸਰਕਾਰੀ ਹੁਕਮ ਹੋ ਗਿਆ ਕਿ ਕਿਸੇ ਸਿੰਘ ਦਾ ਸਿਰ ਵੱਡ ਲਿਆਉ ਤੇ ਭਾਰੀ ਇਨਾਮ ਪਾਓ ।ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅੱਸੀ ਰੁਪਈਏ ਸਿੱਖ ਦੇ ਸਿਰ ਦੇ ਕੀਮਤ ਹੋ ਗਈ ਸੀ ।ਗੈਰ ਸਿਖਾਂ ਨੂੰ ਕਾਰੋਬਾਰ ਮਿਲ ਗਿਆ ।ਸਿਖਾਂ ਦੀ ਪਹਿਚਾਣ ਕੇਸ ਦਾੜੀ ਕਾਰਣ ਛੇਤੀ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।ਬੁਹੁਤੇਰੇ ਬੇਦੋਸ਼ੇ ਸਿੰਘ ਮੌਤਦੇ ਘਾਟ ਉਤਾਰ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ।ਜੋ ਬਚ ਗਏ ਉਹ ਘਰਤੋਂ ਸੈਂਕੜੇ ਕੋਹਾਂ ਦੂਰ ਮਾਰੂਥਲ ਵਿੱਚ ਬੁੱਢਾ ਜੋਹੜ ਕੋਲ ਆਕੇ ਰਹਿਣ ਲੱਗ ਪਏ ।ਇੱਥੇ ਪੀਣ ਨੂੰ ਪਾਣੀ ਅਤੇ ਲੁੱਕਣ ਲਈ ਬੀਆਬਾਨ ਸੀ ।ਘੋੜਿਆਂ ਦੀ ਪਿੱਠ ਤੇ ਹੀ ਘਰ ਬਣਾ ਲਏ। ਉਸ ਵਕਤ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਹੁਕਮਰਾਨ ਮੱਸਾ ਰੰਘੜ ਬੜਾ ਜਾਲਮ ਕਿਸਮ ਦਾ ਬੰਦਾ ਸੀ ਜੋ ਸਿੱਖਾਂ ਤੇ ਬਹੁਤ ਜ਼ੁਲਮ ਕਰਦਾ ਸੀ ।ਉਸਨੇ ਅਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਪਵਿਤਰ ਹਰਿਮੰਦਿਰ ਸਾਹਿਬ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਐਸ਼ਗਾਹ ਬਣਾ ਲਿਆ ਜਿੱਥੇ ਬੈਠਕੇ ਉਹ ਸ਼ਰਾਬਾਂ ਪੀਂਦਾ,ਕੰਜਰੀਆਂ ਦੇ ਨਾਚ ਦੇਖਦਾ ।ਉਸਨੇ ਪਾਵਨ ਸਰੋਵਰ ਨੂੰ ਭੀ ਮਿੱਟੀ ਨਾਲ ਭਰ ਦਿੱਤਾ।ਉਸਨੂੰ ਸ਼ੱਕ ਸੀ ਕਿ ਇਸ ਪਾਣੀ ਨਾਲ ਇਸ਼ਨਾਨ ਕਰਕੇ ਸਿੰਘ ਤਾਕਤਵਰ ਬਣਦੇ ਹਨ ।ਪੂਜਾ ਪਾਠ ਬੰਦ ਕਰਵਾ ਦਿੱਤਾ ।ਜਦੋੰ ਸਾਰੇ ਹਾਲਾਤ ਦੀ ਇਤਲਾਹ ਬੁੱਢਾ ਜੋਹੜ ਰਹਿਣ ਆਲੇ ਸਿੰਘਾਂ ਨੂੰ ਮਿਲੀ ਤਾਂ ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਖੂਨ ਉਬਾਲੇ ਮਾਰਨ ਲੱਗਾ। ਭਾਈ ਸੁੱਖਾਸਿੰਘ ਮਹਿਤਾਬ ਸਿੰਘ ਇਹ ਕਸਮ ਖਾ ਕੇ ਉਥੋਂ ਚੱਲੇ ਕਿ ਅਸੀਂ ਮੱਸੇ ਦਾ ਸਿਰ ਵੱਡ ਕੇ ਲਿਆਵਾਂਗੇ ਜਾਂ ਮਰ ਜਾਵਾਂਗੇ । ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਬੜੀ ਬਹਾਦਰੀ ਨਾਲ ਉਸਦਾ ਸਿਰ ਵਡਿਆ ਉਸਦੇ ਸਿਪਾਹੀਆਂ ਦਾ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਓਹ ਬਾਪਿਸ ਬੁੱਢਾ ਜੋਹੜ ਪਰਤ ਆਏ ।ਓਹਨਾ ਵੀਰ ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਦੀ ਯਾਦ ਵਿਚ ਸ਼ਹੀਦੀ ਜੋੜ ਮੇਲਾ ਹਰ ਸਾਲ ਭਰਦਾ ਹੈ ਅਸੀਂ ਉੱਥੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਾਂ ।" ਜਥੇਦਾਰ ਜੀ ਨੇ ਖੁਲਾਸੇ ਨਾਲ ਵਿਓਰਾ ਦਿੱਤਾ।ਭੁਜੰਗੀ ਨੂੰ ਨਵਾਂ ਗਿਆਨ ਮਿਲਿਆ ।ਉਸਦੀਆਂ ਸਬ ਜਿਗਿਆਸਾਵਾਂ ਸ਼ਾਂਤ ਹੋ ਗਈਆਂ ।ਕਾਫਲਾ ਅੱਗੇ ਵਧਦਾ ਰਿਹਾ । **** ******* /*******ਸਰਦਾਰ ਸੁਦਾਗਰ ਸਿੰਘ ਕਿਸੇ ਸਿਆਸੀ ਪਾਰਟੀ ਦਾ ਆਗੂ ਤਾਂ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਰ ਸਬ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਬੰਦੇ ਉਸ ਕੋਲ ਆਉਂਦੇ ਜਾਂਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਸਨ ।ਇਲਾਕੇ ਵਿੱਚ ਬਡ਼ਾ ਮਾਨ ਸਨਮਾਨ ਸੀ ।ਅੱਠ ਮੁਰੱਬੇ ਜਮੀਨ ਦਾ ਮਾਲਕ ਹੋਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਘਮੰਡ ਰੱਤੀ ਭਰ ਭੀ ਨਾ ਸੀ ।ਹਰ ਲੋੜਵੰਦ ਦੀ ਮਦਦ ਕਰਨੀ,ਸਬ ਨਾਲ ਖਿੜੇ ਮੱਥੇ ਮਿਲਣਾ ਅਤੇ ਨਿਮਰਤਾ ਨਾਲ ਪੇਸ਼ ਆਉਣਾ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਆਦਤ ਸੀ ।ਸੱਠ ਸਾਲ ਦੀ ਉਮਰ ਹੈ ਪਰ ਜਵਾਨਾਂ ਵਰਗਾ ਜੋਸ਼ ਸੀ ।ਤੰਦਰੁਸਤੀ ਵਿਚ ਕੋਈ ਕਮੀ ਨਹੀਂ ਹੈ ।ਦੋਨਾਂ ਪੁਤਰਾਂ ਨੇ ਕੱਮ ਕਾਰ ਸਾਂਭ ਰਖਿਆ ਹੈ ਫੇਰ ਭੀ ਖੇਤੀ ਦੀ ਨਿਗਰਾਨੀ ਆਪ ਕਰਦੇ ਹਨ ।ਉਹ ਇਲਾਕੇ ਦੇ ਨਾਮੀ ਜਗੀਰਦਾਰ ਹਨ ।ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਧਰਮਪਤਨੀ ਭੀ ਧਾਰਮਿਕ ਖਿਆਲਾਂ ਦੀ ਸਿਆਣੀ ਔਰਤ ਹਨ।ਰੋਜ ਗੁਰਦਵਾਰੇ ਜਾਕੇ ਮੱਥਾ ਟੇਕਕੇ ਘਰ ਦੇ ਕੰਮਾਂ ਨੂੰ ਹੱਥ ਲਾਉਂਦੇ ਹਨ ।।ਸਰਦਾਰਨੀ ਜੀ ਭੀ ਬੜੇ ਚੰਗੇ ਸੁਭਾਅ ਵਾਲੇ ਹਨ ।ਉਹ ਦੋਨੇ ਜੀਅ ਹਰ ਸਾਲ ਤੀਰਥ ਯਾਤਰਾ ਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਪਿੱਛੇ ਬੇਟੇ ,ਬਹੂਆਂ ਪੋਤੇ ਪੋਤੀਆਂ ਹੀ ਘਰ ਵਿਚ ਰਹਿ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ।ਸੁਦਾਗਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸਹੁਰਾ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਅਕਾਲ ਚਲਾਣੇ ਪਿੱਛੋਂ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਸੱਸ ਕੱਲੀ ਰਹਿ ਗਈ ਹੈ ਉਹ ਭੀ ਵੱਡੀ ਸਰਦਾਰਨੀ ਅਤੇ ਚਾਰ ਮੁਰੱਬਿਆਂ ਦੀ ਮਾਲਕ ਹੈ।ਸਰਦਾਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਘਰਵਾਲੀ ਹੀ ਉਸ ਜਾਇਦਾਦ ਦੀ ਇਕੱਲੀ ਵਾਰਸ ਹੈ ।ਸਬ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ ਵੱਡੇ ਮਾਤਾ ਜੀ ਇਨ੍ਹਾ ਕੋਲ ਆਕੇ ਰਹਿਣ ,ਪਰ ਪੁਰਾਣੇ ਖਿਆਲਾਂ ਵਾਲੀ ਵਿਰਦ ਮਾਤਾ ਧੀ ਦੇ ਘਰ ਬੈਠਣ ਲਈ ਤਿਆਰ ਨਾ ਹੋਈ ।ਦੇਰ ਸਵੇਰ ਸਹੁਰਿਆਂ ਦੀ ਸੌ ਘੁਮਾ ਭੀ ਉਜਾਗਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਹੀ ਮਿਲਣੀ ਸੀ।ਸੱਸ ਦੇ ਕਹਿਣ ਤੇ ਹੀ ਸਰਦਾਰ ਸਾਹਿਬ ਹੀ ਉਸ ਪੈਲੀ ਨੂੰ ਸਮ੍ਹਾਲ ਰਹੇ ਹਨ ।ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਦੋ ਪੁੱਤਰ ਹਨ ਸੋਹਨ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਮੋਹਨ ਸਿੰਘ । ਵੱਡਾ ਪੁੱਤਰ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਆਪਣਾ ਪਰਿਵਾਰ ਨਾਲ ਰੱਖਕੇ ਨਾਨੀ ਅਤੇ ਉਸਦੀ ਜਮੀਨ ਦੀ ਸਮ੍ਹਾਲ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ ।ਦੋਨੇ ਥਾਈਂ ਸਰਦਾਰ ਸਾਹਿਬ ਨਿਗਾਹ ਰੱਖਦੇ ਹਨ ।ਭਰਵੀਂ ਫਸਲ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਖੁਲਾ ਪੈਸਾ ਆ ਰਿਹਾ ਹੈ ।ਤਾਂ ਹੀ ਉਹ ਗਊਸ਼ਾਲਾ,ਗੁਰੂਘਰ ਲੰਗਰ ਅਤੇ ਹੋਰ ਧਾਰਮਿਕ ਸਮਾਜਿਕ ਕੰਮਾਂ ਲਈ ਦਿਲ ਖੋਲ ਕੇ ਦਾਨ ਕਰਦੇ ਹਨ ।ਸਰਦਾਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਦੋਨੇ ਬੇਟੇ ਬੜੇ ਲਾਇਕ ਅਤੇ ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਹਨ ।ਪਿਤਾ ਤੋਂ ਚੰਗੇ ਸੰਸਕਾਰ ਮਿਲੇ ਹਨ। ਵੱਡਾ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਸਮਝਦਾਰ ਤਾਂ ਬਹੁਤ ਹੈ ਪਰ ਉਸਨੂੰ ਗੁੱਸਾ ਬਹੁਤ ਆਉਂਦਾ ਹੈ ।ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਚਾਲੀ ਵਿਆਲੀ ਸਾਲਾਂ ਦਾ ਹੈ। ਦੋ ਸੋਹਣੇ ਬੱਚੇ ਹਨ ।ਵੱਡੀ ਪੁੱਤਰੀ ਹੈ ਸਿਮਰਨ ਕੌਰ ਜੋ ਅਠਾਰਾਂ ਸਾਲਾਂ ਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਸ਼ਹਿਰ ਦੇ ਕਾਲਿਜ ਸਕੂਟਰੀ ਤੇ ਪੜਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।ਉਹ ਭੀ ਆਪਣੀ ਮਾਂ ਤੇ ਗਈ ਹੈ ।ਸ਼ਕਲ ਸੂਰਤ ਅਤੇ ਸੁਭਾਅ ਬੜਾ ਨਿੱਘਾ ਹੈ ।ਮਾਂ ਜਿਹੇ ਨੈਣ ਨਕਸ਼ ,ਰੰਗ ਅਤੇ ਕੱਦ ਕਾਠੀ ਪੱਖੋਂ ਦੋਵੇਂ ਭੈਣਾਂ ਲਗਦੀਆਂ ਹਨ ।ਕੁੜੀ ਦੇ ਲੰਮੇਂ ਵਾਲ ਉਸਦੀਆਂ ਸਹੇਲੀਆਂ ਚ ਈਰਖਾ ਦਾ ਕਾਰਨ ਬਣਦੇ ਹਨ ।ਮੋਟੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਚ ਸ਼ਰਮੋ- ਹਆ ਝਲਕਦਾ ਹੈ ।ਚੁੰਨੀ ਹਮੇਸ਼ਾ ਸਿਰ ਤੇ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ ।ਮੁੰਡਾ ਛੋਟਾ ਹੈ ਨਾਂਓਂ ਹੈ ਪਾਲ ਸਿੰਘ। ਓਹ ਗਿਆਰਵੀਂ ਚ ਪਿੰਡ ਦੇ ਹੀ ਪ੍ਰਾਈਵੇਟ ਸਕੂਲ ਚ ਪੜਦਾ ਹੈ ।ਦੋਵੇਂ ਬੱਚੇ ਪਿਤਾ ਦੀ ਨਾਨੀ ਦੀ ਬੜੀ ਸੇਵਾ ਕਰਦੇ ਹਨ।ਖੇਤ ਅਤੇ ਘਰ ਦੇ ਕੱਮ ਕਰਨ ਲਈ ਕਈ ਨੌਕਰ ਰੱਖੇ ਹਨ ।ਉਹ ਸਾਰੇ ਇਸੇ ਪਿੰਡ ਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਜੀ ਲਾਕੇ ਕੱਮ ਕਰਦੇ ਹਨ ।ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਿਰ ਤੇ ਖੜੇ ਰਹਿਕੇ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਕੱਮ ਕਰਵਾਉਂਦਾ ਹੈ ।ਟਰੈਕਟਰ ਚਲਾਉਣਾ ਅਤੇ ਸ਼ਹਿਰੋਂ ਸਮਾਨ ਲਿਆਉਣ ਦਾ ਕੱਮ ਉਹੀ ਕਰਦਾ ਹੈ ।ਪੈਸੇ ਦਾ ਦੇਣ ਲੈਣ ਅਜੇ ਭੀ ਸੁਦਾਗਰਸਿੰਘ ਦੇ ਹੱਥ ਚ ਹੈ ।ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਹਰ ਮਾਮਲੇ ਚ ਉਹਨਾਂ ਤੋਂ ਫੋਨ ਤੇ ਸਲਾਹ ਲੈਂਦਾ ਹੈ । ਖੇਤ ਚ ਕੱਮ ਕਰਨ ਆਲੇ ਸਾਰੇ ਸੀਰੀ ਅਤੇ ਮਜਦੂਰਾਂ ਦੀ ਰੋਟੀ ਘਰੋਂ ਇਕ ਨੌਕਰ ਖੇਤ ਲੈਕੇ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਆਥਣੇ ਉਹ ਖੁਦ ਲੈਕੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ।ਸਾਰੇ ਨੌਕਰ ਸਰਦਾਰ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਬੜਾ ਆਦਰ ਕਰਦੇ ਹਨ ।ਉਹ ਜਦੋਂ ਭੀ ਆਉਂਦੇ ਹਨ ਸਬ ਨਾਲ ਘਰ ਦੇ ਜੀਆਂ ਵਾਂਗ ਮਿਲਦੇ ਹਨ ,ਘਰ ਪਰਿਵਾਰ ਦੀ ਰਾਜੀ ਖੁਸ਼ੀ ਪੁੱਛਦੇ ਹਨ ।ਹਰ ਇਮਦਾਦ ਕਰਦੇ ਹਨ ।ਵਾਰ ਤਿਹਾਰ ਉਹਨਾਂ ਲਈ ਮਠਿਆਈ ,ਕਪੜੇ ਆਦਿਕ ਲਿਆਉਂਦੇ ਹਨ । ਮਾੜੂ ਇਹਨਾਂ ਦੇ ਦੋ ਸਾਲ ਤੋਂ ਸੀਰੀ ਹੈ।ਤਕੜੇ ਭਰਵੇਂ ਸ਼ਰੀਰ ਆਲਾ ਅਤੇ ਕੱਮ ਦਾ ਜਾਣਕਾਰ ਹੈ ਉਹ ।ਉਂਝ ਤਾਂ ਉਸਦਾ ਨਾਂਓਂ ਨਛੱਤਰ ਹੈ ਪਰ ਉਹ ਤਿੱਤਰ ਬੜੇ ਮਾਰਦਾ ਹੈ ਪਿੰਡ ਵਾਲੇ ਓਹਨੂੰ ਟੋਕਦੇ ਹਨ ਕਿ ਮਾੜਾ ਕੰਮ ਨਾ ਕਰਿਆ ਕਰ ।ਬਸ ਓਥੋਂ ਮਾੜਾ ਫੇਰ ਮਾੜੂ ਨਾਂਓਂ ਪੈ ਗਿਆ ।ਪਿੰਡਾਂ ਵਿਚ ਇੰਝ ਹੀ ਨਾਂਓਂ ਟਿਕ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ।ਉਹ ਛੱਬੀ ਸਾਲ ਦਾ ਕਾਮਾ ਗਬਰੂ ਹੈ ।ਸਕੂਲ ਦਾ ਮੂੰਹ ਨਹੀਂ ਦੇਖਿਆ ਬਸ ਸਰਦਾਰਾਂ ਦੇ ਘਰਾਂ ਵਿਚ ਪਸ਼ੂ ਪਾਲਣ ਅਤੇ ਖੇਤੀ ਦਾ ਕੱਮ ਬਾਲਪਣੇ ਤੋਂ ਕਰਦਾ ਆ ਰਿਹਾ ਹੈ ।ਦੋ ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂਵਿਆਹ ਹੋ ਗਿਆ ਇਕ ਮੁੰਡਾ ਭੀ ਹੋ ਗਿਆ,ਹੁਣ ਛੀ ਮਹੀਨਿਆਂ ਤੋਂ ਘਰਵਾਲੀ ਰੁੱਸਕੇ ਪੇਕੇ ਬੈਠੀ ਹੈ ।ਉਸਨੇ ਮਾਰਕੁਟ ਕਰਕੇ ਦਾਜ ਮੰਗਣ ਦਾ ਕੇਸ ਭੀ ਕਰਵਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ।ਇਸ ਗੱਲੋਂ ਮਾੜੂ ਪ੍ਰੇਸ਼ਾਨ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਸ਼ਰਾਬ ਪੀ ਰਖਦਾ ਹੈ।ਹੁਣ ਉਹ ਮਨ ਲਾਕੇ ਖੇਤ ਵਿਚ ਕੱਮ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ ।ਜਦੋਂ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਆਉਂਦਾ ਦਿਸਦਾ ਤਾਂ ਕੱਮ ਤੇ ਲਗ ਜਾਂਦਾ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਪਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ।ਉਸਨੇ ਸਰਦਾਰ ਜੀ ਤੋਂ ਕੇਸ ਵਾਸਤੇ ਬੀਹ ਹਜਾਰ ਰੁਪਿਆ ਉਧਾਰ ਭੀ ਲੈ ਰੱਖਿਆ ਸੀ ।ਉਸਦੀ ਭੀ ਚਿੰਤਾ ਸੀ ।ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਦੇ ਘਰ ਰਾਤ ਦੀ ਰੋਟੀ ਲੈਕੇ ਠੇਕੇ ਜਰੂਰ ਜਾਂਦਾ ।ਉਸ ਦਿਨ ਰਾਤ ਨੂੰ ਮਾੜੂ ਸਾਰੇ ਸੀਰੀਆਂ ਦੇ ਜਾਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਹਨੇਰਾ ਹੋਇਆਂ ਰੋਟੀ ਲਿਜਾਣ ਆਇਆ।ਉਦੋਂ ਤਕ ਬੁੱਢੀ ਨਾਨੀ ਸੌਂ ਚੁੱਕੀ ਸੀ ।ਬੱਚੇ ਪੜਨ ਬੈਠ ਗਏ ਸਨ ।ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਮੱਮੀ ਰਸੋਈ ਦਾ ਕੱਮ ਮੁਕਾ ਰਹੀ ਸੀ ।ਸੋਹਣ ਭੀ ਉਸ ਦਿਨ ਪਿੰਡ ਗਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ ।ਮਾੜੂ ਸ਼ਰਾਬ ਨਾਲ ਰੱਜ ਕੇ ਆਇਆ ਸੀ ।ਉਹ ਆਪਣੀ ਰੋਜ ਵਾਲੀ ਥਾਂ ਤੇ ਬੈਠਾ ਝੂਲਦਾ ਰਿਹਾ ।ਫੇਰ ਉਸਨੇ ਭਾਂਡੇ ਖੜਕਾਏ ।"ਚਾਚੀ--ਰੋਟੀ--।"ਉਹ ਉੱਚੀ ਆਵਾਜ ਚ ਬੋਲਿਆ ।"ਅੱਜ ਇੰਨੀ ਦੇਰ ਕਰਤੀ ਮਾੜੂ ?"ਰਸੋਈ ਚੋਂ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸਰਦਾਰਨੀ ਬੋਲੀ ।"ਉਹ--ਉਹ-ਅੱਜ ਖੇਤ ਚ ਕੱਮ ਜਿਆਦਾ ਸੀ ।ਮੈਂ ਹੁਣ ਆਇਆਂ ਹਾਂ।"ਬੜਾ ਸੰਭਲ ਕੇ ਬੋਲਿਆ ਉਹ ।ਸਰਦਾਰਨੀ ਨੇ ਪੁੱਤਰ ਪਾਲੀ ਨੂੰ ਸੱਦ ਮਾਰੀ ਪਰ ਉਹ ਪੜਨ ਦਾ ਬਹਾਨਾ ਕਰਕੇ ਆਉਣ ਤੋਂ ਸਾਫ ਮੁੱਕਰ ਗਿਆ ਤਾਂ ਸਿਮਰਨ ਆ ਗਈ।ਮਾੜੂ ਹਨੇਰੇ ਚ ਬੈਠਾ ਸੀ ।ਕੁੜੀ ਝੁੱਕਕੇ ਦਾਲ ਕੌਲੇ ਚ ਪਾਉਣ ਲੱਗੀ ਤਾਂ ਮਾੜੂ ਦੇ ਅੰਦਰਲਾ ਸ਼ੈਤਾਨ ਜਾਗ ਗਿਆ ।ਉਹ ਅੱਜ ਭੀ ਮਾੜੇ ਕੱਮ ਨੂੰ ਤਿਆਰ ਹੋ ਗਿਆ ।ਸ਼ਰਾਬ ਦੇ ਨਸ਼ੇ ਚ ਹਵਸ ਜੋਰ ਮਾਰਨ ਲੱਗੀ ।ਉਸਨੇ ਇਕ ਹੱਥ ਨਾਲ ਕੁੜੀ ਦਾ ਹੱਥ ਅਤੇ ਦੂਜੇ ਨਾਲ ਉਸਦੀ ਗੱਲ ਤੇ ਚੂੰਡੀ ਭਰ ਲਈ ।ਸਿਮਰਨ ਨੂੰ ਇਸ ਨੀਚ ਹਰਕਤ ਦੀ ਰੱਤਾ ਭੀ ਉਮੀਦ ਨਹੀਂ ਸੀ ।ਉਹ ਗੁੱਸੇ ਨਾਲ ਭਰ ਗਈ।ਉਸਨੇ ਭਰਵੀਂ ਲੱਤ ਮਾੜੂ ਦੇ ਬੁਥਾੜ ਤੇ ਮਾਰੀ ।ਇੱਕੇ ਨਾਲ ਉਹ ਪਿਛਾਂ ਡਿੱਗ ਪਿਆ ਅਤੇ ਕਾਹਲੀ ਨਾਲ ਉੱਠਕੇ ਭੱਜ ਗਿਆ ।ਖੜਕਾ ਸੁਣਕੇ ਸਰਦਾਰਨੀ ਅਤੇ ਪਾਲੀ ਭੀ ਕਾਹਲੀ ਨਾਲ ਆ ਗਏ । ਸਿਮਰਨ ਮਾਂ ਨਾਲ ਚਿੰਬੜ ਗਈ ।ਰੋ ਕੇ ਸਾਰੀ ਗੱਲ ਦੱਸੀ ।ਰਾਤ ਨੂੰ ਮਾਂ ਨੇ ਉਸਨੂੰ ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਪਾਇਆ ਅਤੇ ਸਮਝਾਇਆ ਕਿ ਇਹ ਗੱਲ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਦੱਸਣੀ।ਡੈਡੀ ਜਾਂ ਦਾਦਾਜ਼ੀ ਨੂੰ ਭੀ ਨਹੀਂ ।ਜਵਾਨ ਕੁੜੀਆਂ ਦੀ ਝੂਠੀ ਬਦਨਾਮੀ ਸੱਚ ਮੰਨ ਲਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।ਪਰਿਵਾਰ ਦੇ ਲੋਕ ਸਿਰ ਚੁੱਕ ਕੇ ਚੱਲਣ ਲਾਇਕ ਨਹੀਂ ਰਹਿੰਦੇ ।ਮਰਨ ਮਾਰਨ ਦੀ ਨੌਬਤ ਆ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।ਸਾਡੇ ਆਦਮੀ ਮਰਨ ਜਾਂ ਜੇਲ ਜਾਣ ਦੋਨਾਂ ਹਾਲਾਤਾਂ ਤੋਂ ਅਸੀਂ ਹੀ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਬਚਾਉਣਾ ਹੈ ।ਕੁੜੀ ਨੇ ਮਾਂ ਨੂੰ ਭਰੋਸਾ ਦਿੱਤਾ ਪਰ ਉਸਦੀ ਭੁੱਬ ਨਿਕਲ ਗਈ ।ਉਸਦੇ ਕਾਲਿਜ ਚ ਕਿੰਨੇ ਬਦਮਾਸ਼ ਮੁੰਡੇ ਕੁੜੀਆਂ ਨੂੰ ਤੰਗ ਕਰਦੇ ਹਨ ।ਗਰੀਬ ਕੁੜੀਆਂ ਡਰਦਿਆਂ ਬੋਲਦੀਆਂ ਨਹੀਂ ਪਰ ਕਿਸੇ ਨੇ ਮੇਰਾ ਰਾਹ ਅੱਜ ਤਕ ਨਹੀ ਰੋਕਿਆ ।ਉਹ ਜਾਣਦੇ ਹਨ ਵੱਡੇ ਸਰਦਾਰਾਂ ਦੀ ਧੀ ਹੈ ਅਗਲੇ ਟੋਟੇ ਕਰ ਦੇਣਗੇ।ਸਾਰੇ ਮੇਰੀ ਰਿਸਪੇਕਟ ਕਰਦੇ ਹਨ ਪਰ ਇਸ ਧੇਲੇ ਦੇ ਆਦਮੀਂ ਨੇਂ ਮੇਰੀ ਇੱਜਤ ਤੇ ਹੱਥ ਪਾ ਦਿੱਤਾ ।ਅਗਲੇ ਦਿਨ ਤੋੰ ਮਾੜੂ ਨੇਂ ਆਥਣੇ ਇਹਨਾਂ ਦੇ ਘਰ ਆਉਣਾ ਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।ਦੋ ਤਿੰਨ ਦਿਨਾਂ ਬਾਅਦ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਭੀ ਆ ਗਿਆ ।ਘਰ ਦਾ ਮਾਹੌਲ ਆਮ ਵਾਂਗ ਸੀ ।ਪਰ ਉਸਨੇ ਨੋਟ ਕੀਤਾ ਮਾੜੂ ਘਰ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ ।ਦੂਜੇ ਸੀਰੀਆਂ ਤੋੰ ਭੀ ਪੁੱਛਿਆ ਸਾਰੇ ਗੱਲ ਟਾਲ ਗਏ।ਪਰ ਬੇਟੇ ਪਾਲ ਸਿੰਘ ਨੇ ਸਾਰੀ ਗੱਲ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਦੱਸ ਦਿੱਤੀ ।ਅੰਦਰ ਬੈਠੀ ਸਿਮਰਨ ਨੇਂ ਚਾਂਗ ਮਾਰੀ । ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਦਾ ਪਾਰਾ ਸੱਤਵੇਂ ਅਸਮਾਨ ਤੇ ਜਾ ਚੜਿਆ ।"ਮੈਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਨੀਂ ਦੱਸਿਆ ?---ਮੇਰੇ ਸਾਲੇ ਨੀਚ ਦੀ ਐਨੀ ਹਿੰਮਤ ?"ਉਸਦੀਆਂ ਨਾਸਾਂ ਫੁੱਲੀਆਂ ਪਈਆਂ ਸਨ ।ਅੰਦਰ ਜਾਕੇ ਬੰਦੂਖ ਚੁੱਕ ਲਈ ਅਤੇ ਬਾਹਰ ਨੂੰ ਜਾਣ ਨੂੰ ਔਲਇਆ ਤਾਂ ਸਾਰਿਆਂ ਨੇਂ ਕਮਰੇ ਵਿਚ ਖਿੱਚ ਲਿਆ ।ਸਰਦਾਰਨੀ ਨੇ ਪੈਰ ਫੜ ਲਏ ।" ਹਾੜੇ ,ਧੀ ਦੇ ਭਵਿੱਖ ਲਈ ,ਪਾਪਾਜੀ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕਰ ਲਓ।""ਮੇਰੀ ਪੱਗ ਨੂੰ ਹੱਥ ਪਾਇਆ ਹੈ ਉਸਨੇ ।ਮੈਂ ਉਸਨੂੰ ਜਿਉਂਦਾ ਨਹੀਂ ਛਡੂੰਗਾ ।"ਉਹ ਬਾਰ ਬਾਰ ਬਾਹਰ ਜਾਣ ਦੀ ਜਿੱਦ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ ।"ਪੁੱਤ ਮੇਰੇ ਸਰੀਕ ਤਾਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਤੇਰੇ ਤੇ ਮੱਚਦੇ ਹਨ ,ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ਗੱਲ ਪਤਾ ਚਲੂ ਤਾਂ ਮੇਹਣੇ ਮਾਰ ਕੇ ਹੀ ਮੈਨੂੰ ਮਾਰ ਦੇਣਗੇ । ਗ਼ੁੱਸਾ ਥੁੱਕ ਦੇ ।"ਨਾਨੀ ਨੇ ਭੀ ਹੱਥ ਬੰਨੇ ।ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਕਮਰੇ ਵਿਚ ਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਸਰਦਾਰਨੀ ਨੇ ਸੁਦਾਗਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਫੋਨ ਕਰਕੇ ਰਾਤ ਨੂੰ ਹੀ ਬੁਲਾ ਲਿਆਂ ।ਸਰਦਾਰ ਨੇ ਆਉਂਦਿਆਂ ਹੀ ਹਾਲਾਤ ਸੰਭਾਲ ਲਏ।ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਘਰ ਦੀ ਇੱਜਤ ਅਤੇ ਅਪਨੇ ਮਾਨ ਸਨਮਾਨ ਦਾ ਵਾਸਤਾ ਦਿੱਤਾ ।ਉਸਨੂੰ ਸਮਝਾਇਆ । "ਨੀਚ ਨਾਲ ਨੀਚ ਹੋਣ ਵਿੱਚ ਕੀ ਸਿਆਣਪ ਹੈ ? ਉਸਨੂੰ ਮਾਰਨਾ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਨਹੀਂ, ਪਰ ਧੀ ਦੀ ਬਦਨਾਮੀ ਦਾ ਬੋਝਾ ਮੈਂ ਝੱਲ ਨਾ ਸਕਾਂਗਾ।ਦੁਨੀਆਂ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਜੀਣ ਨਾ ਦੇਵੇਗੀ ।" ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਤੇ ਸਰਦਾਰ ਜੀ ਦੀ ਸਮਝਾਉਣੀ ਦਾ ਅਸਰ ਹੋਇਆ।ਉਹ ਚੁਪ ਰਹਿਣ ਤੇ ਰਾਜੀ ਹੋ ਗਿਆ ।ਸਰਦਾਰ ਹੋਰਾਂ ਨੇ ਇੱਥੇ ਹੀ ਡੇਰਾ ਲਾ ਲਿਆ ।ਸਾਰੇ ਟੱਬਰ ਨੂੰ ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਬੜਾ ਹੌਂਸਲਾ ਸੀ । ਹਫਤੇ ਤਕ ਮਾੜੂ ਦੇ ਖਿਲਾਫ ਕੋਈ ਕਾਰਵਾਈ ਨਾ ਹੋਈ ਤਾਂ ਉਸਨੇ ਸਮਝ ਲਿਆ ਸਿਮਰਨ ਨੇਂ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਦੱਸਿਆ ਨਹੀਂ ।ਉਹ ਦੋਬਾਰਾ ਘਰ ਆਉਣ ਲੱਗ ਪਿਆ ।ਕਿਸੇ ਨੇ ਕੁਛ ਨਹੀਂ ਆਖਿਆ ।ਉਹ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਦੇ ਗੁੱਸੇ ਤੋੰ ਡਰਦਾ ਸੀ ਪਰ ਉਸਨੂੰ ਭੀ ਚੁਪ ਦੇਖਕੇ ਬੇਫਿਕਰ ਹੋ ਗਿਆ ।ਹੁਣ ਫੇਰ ਉਹ ਖੇਤ ਸ਼ਰਾਬ ਪੀਣ ਲੱਗ ਪਿਆ ।ਦੂਜੇ ਸੀਰੀਆਂ ਅੱਗੇ ਬਕਵਾਸ ਕਰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ "ਦੇਖ ਲਿਓ ਸੋਹਣੇ ਦੀ ਕੁੜੀ ਨੂੰ ਘਰ ਆਲੀ ਬਣਾ ਕੇ ਛਡੂੰਗਾ ।"ਦੂਜੇ ਸੀਰੀ ਸ਼ਰਾਬੀ ਦੀ ਬਕਚਾਲ ਸਮਝਕੇ ਚੁਪ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ।ਸਰਦਾਰ ਜਾਂ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਆਉਂਦਾ ਦਿਸਦਾ ਤਾਂ ਕੱਮ ਲੱਗ ਜਾਂਦਾ । ਇੱਕ ਦਿਨ ਤਾਂ ਉਸਨੇ ਹੱਦ ਈ ਕਰਤੀ ।ਖੇਤ ਜਾਕੇ ਦਾਰੂ ਪੀਕੇ ਊਲ ਜਲੂਲ ਬਕਣ ਲੱਗਾ ।ਨਰਮੇ ਵਿੱਚ ਗੋਡੀ ਹੋ ਰਹੀ ਸੀ ।ਉਹ ਕਸੀਆ ਸਿੱਧਾ ਜੜ ਚ ਮਾਰਦਾ । ਨਰਮਾ ਪੱਟਣ ਲੱਗ ਗਿਆ ।ਦੂਜੇ ਸੀਰੀਆਂ ਨੇ ਬਹੁਤ ਸਮਝਾਇਆ ਤਾਂ ਓਹਨਾ ਨਾਲ ਲੜਨ ਲੱਗਾ । ਸੀਰੀ ਡਰਕੇ ਘਰ ਆ ਗਏ।ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਸਰਦਾਰ ਨੂੰ ਸਬ ਕੁਛ ਦੱਸਿਆ ,ਸੁਣਕੇ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸੱਤੀਂ ਕੱਪੜੀਂ ਅੱਗ ਲੱਗ ਗਈ । "ਪਾਪਾ ਜੀ, ਮੈਨੂੰ ਹੁਣ ਨਾ ਰੋਕਿਉ ।"ਉਸਨੇ ਭੱਜਕੇ ਬੰਦੂਖ ਚੁੱਕ ਲਈ ਅਤੇ ਘੋੜੀ ਦੇ ਲਗਾਮ ਪਾਉਣ ਲੱਗਾ । ਸਰਦਾਰ ਨੇ ਅੱਗੇ ਆ ਕੇ ਬੰਦੂਖ ਫੜ ਲਈ ਅਤੇ ਸ਼ਾਂਤ ਭਾਵ ਨਾਲ ਆਖਿਆ । "ਬੇਟਾ ਗੁੱਸੇ ਤੇ ਕਾਬੂ ਪਾਓ।ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਭਲੀ ਕਰਨਗੇ ।ਘਰ ਬੈਠੋ ।" "ਪਾਪਾ ਜੀ, ਉਹ ਸਿਰ ਤੇ ਚੜਕੇ ਨੱਚ ਰਿਹੈ ,ਤੁਸੀਂ ਸ਼ਾਂਤੀ ਦਾ ਉਪਦੇਸ਼ ਦੇ ਰਹੇ ਹੋਂ ?"ਉਹ ਬੰਦੂਖ ਖੋਹਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਬੋਲਿਆ । "ਮੇਰਾ ਬੇਟਾ ਹੈਂ ਤਾਂ ਕਿਤੇ ਨਹੀਂ ਜਾਣਾ ।"ਸਰਦਾਰ ਵਿਚ ਅਥਾਹ ਸਬਰ ਸੀ । "ਪਰ ਪਾਪਾਜੀ ਉਹ ਸਾਨੂੰ ਲਲਕਾਰ ਰਿਹੈ ,ਸਾਡੀ ਫਸਲ ਉਜਾੜ ਰਿਹੈ।ਅਸੀਂ ਪਿੱਠ ਦਿਖਾ ਰਹੇ ਹਾਂ ।"ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਦਾ ਗੁੱਸਾ ਬੋਲ ਰਿਹਾ ਸੀ । "ਮੇਰਾ ਮਾਨ ਰੱਖ ਲੈ ਪੁੱਤਰ ।ਰੱਬ ਤੇ ਭਰੋਸਾ ਰੱਖ ।ਫਸਲ ਹੱਥ ।ਦੀ ਮੈਲ ਹੈ ,ਫੇਰ ਹੋ ਜਾਵੇਗੀ ਆਦਮੀਆਂ ਦਾ ਨੁਕਸਾਨ ਨਹੀਂ ਸਹਿਨ ਹੁੰਦਾ ।" ਸੁਦਾਗਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਘੋੜੀ ਪੁੱਠੀ ਬਨ੍ਹਾਂ ਦਿੱਤੀ ਅਤੇ ਘਰ ਦੇ ਗੇਟ ਨੂੰ ਤਾਲਾ ਲਗਵਾ ਲਿਆ ।ਖੁਦ ਵੇਹੜੇ ਚ ਬੈਠਕੇ ਗੁਟਕਾ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਪਾਠ ਕਰਨ ਲੱਗ ਪਏ । ਖੇਤ ਮਾੜੂ ਨੇ ਕਰੀਬ ਦੋ ਬਿਘੇ ਨਰਮਾ ਲੰਮਾਂ ਪਾ ਦਿੱਤਾ।ਜਦੋਂ ਥੱਕ ਜਾਂਦਾ ਸ਼ਰਾਬ ਪੀ ਲੈਂਦਾ। ਗੰਡਾਸਾ ਹੋਰ ਤਿੱਖਾ ਕਰਕੇ ਪਿੰਡ ਵੱਲ ਤਕਣ ਲੱਗ ਜਾਂਦਾ ।ਉਹ ਮਨ ਵਿਚ ਧਾਰ ਚੁੱਕਾ ਸੀ ਕਿ ਜੇ ਸੋਹਣ ਸਿੰਘ ਆਇਆ ਤਾਂ ਅੱਜ ਉਸਦੇ ਡੱਕਰੇ ਕਰ ਦੇਊਂਗਾ ਫੇਰ ਸਿਮਰਨ ਨੂੰ ਬਾਹੋਂ ਫੜਕੇ ਧੂਹ ਕੇ ਪਿੰਡ ਵਿਚਾਲ ਦੀ ਮੇਰੇ ਘਰ ਲੈਕੇ ਜਾਵਾਂਗਾ । ਆਥਣ ਦੇ ਚਾਰ ਵੱਜ ਗਏ ।ਪਿੰਡੋਂ ਕੋਈ ਨਾ ਆਇਆ ।ਚਾਣਚੱਕ ਪਹਾੜ ਆਲੇ ਪਾਸਿਉਂ ਘੋੜਿਆਂ ਦੀਆਂ ਆਵਾਜ਼ਾਂ ਆਈਆਂ ਅਤੇ ਧੂੜ ਉੱਡਦੀ ਦਿਸੀ ।ਬੇਹਿਸਾਬ ਹਿਣਕਦੇ ਘੋੜੇ ਉਸਦੇ ਉੱਪਰ ਚੜੇ ਆ ਰਹੇ ਸਨ ।ਘੋੜੇ ਫਸਲ ਮਿੱਧ ਰਹੇ ਸਨ ।ਨਹਿੰਗ ਸਿੰਘਾਂ ਦਾ ਕਾਫਲਾ ਆ ਗਿਆ ਸੀ ।ਮਾੜੂ ਨੇ ਗੰਡਾਸਾ ਹੱਥ ਚ ਲਿਆ ਅਤੇ ਤਣ ਕੇ ਅੱਗੇ ਖੜ੍ਹੋ ਗਿਆ । "ਕਿੱਧਰ ਮੂੰਹ ਚੱਕਿਆ ਆ ਕਮਲੇ ਟੋਲੇ ਨੇ ?"" ਮੂੰਹ ਸਮਾਲਕੇ ਗੱਲ ਕਰ ਓਏ ਮਲੇਛਾ ।"ਇੱਕ ਨਹਿੰਗ ਨੇ ਅੱਗੇ ਵਧਕੇ ਆਖਿਆ ।"ਮਲੇਛ ਹੋਊਗਾ ਤੇਰਾ ਪਿਓ ਮੈਂ ਤਾਂ ਖੇਤ ਦਾ ਮਾਲਕ ਹਾਂ ।ਪੁੱਠੇ ਮੁੜ ਜਾਓ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਇੱਕ ਇੱਕ ਦਾ ਕਛਹਿਰਾ ਪਾੜ ਦੂੰਗਾ ।ਕੜਾਹਖਾਣੈ ਨਾ ਹੋਣ ਤਾਂ ।"ਉਸਨੇ ਗੰਡਾਸਾ ਉੱਚਾ ਚੁੱਕ ਲਿਆ ।"ਇਹਨੂੰ ਤਾਂ ਸੋਧਣਾ ਪਏਗਾ ਜਥੇਦਾਰ ਜੀ"ਨਹਿੰਗ ਜਥੇਦਾਰ ਜੀ ਦੇ ਘੋੜੇ ਅੱਗੇ ਖੜ੍ਹੋ ਗਿਆ ।"ਪਾਗਲ ਲਗਦਾ ਹੈ ,ਛੱਡੋ ਪਰੇ ।"ਜਥੇਦਾਰ ਜੀ ਨੇ ਘੋੜਾ ਅੱਗੇ ਤੋਰਿਆ।"ਡਰ ਗਿਆ ਜਮਾਈ ਤੋਂ ?ਵੱਡਾ ਜਥੇਦਾਰ ।"ਮਾੜੂ ਹੱਸਿਆ ।ਹੁਣ ਨਹਿੰਗਾਂ ਨੇ ਇਜਾਜਤ ਲੈਣੀ ਜਰੂਰੀ ਨਾ ਸਮਝੀ ਅਤੇ ਉਸਤੇ ਹੱਲਾ ਬੋਲ ਦਿੱਤਾ ।ਚਾਰ ਜਵਾਨ ਨਹਿੰਗਾਂ ਨੇਂ ਤਲਵਾਰਾਂ ਨਾਲ ਵਿੰਨ੍ਹ ਦਿੱਤਾ ਫੇਰ ਦੋ ਧਾਰੇ ਖੰਡੇ ਨਾਲ ਸਿਰ ਧੜ ਤੋਂ ਵੱਖ ਕਰਕੇ ਨੇਜ਼ੇ ਤੇ ਟੰਗ ਲਿਆ ।ਕਾਫਲਾ ਫੇਰ ਚੱਲ ਪਿਆ ਜਿਵੇਂ ਕੁਛ ਹੋਇਆ ਹੀ ਨਹੀਂ ।"ਉਸ ਪਾਪੀ ਮੱਸੇ ਰੰਘੜ ਦਾ ਸਿਰ ਭੀ ਭਾਈ ਸੁੱਖਾਸਿੰਘ ਮਹਿਤਾਬ ਸਿੰਘ ਇੱਸੇ ਤਰਾਂ ਵਰਛੇ ਤੇ ਟੰਗਕੇ ਲੈ ਆਏ ਸਨ।" ਸਹਮੇਂ ਬੈਠੇ ਭੁਜੰਗੀ ਨੂੰ ਜਥੇਦਾਰ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਦਸਿਆ। ਇਹ ਕੌਣ ਸੀ ਜਥੇਦਾਰ ਜੀ ?" ਭੁਜੰਗੀ ਨੇ ਪੁੱਛਿਆ। "ਦੂਜਾ ਮੱਸਾ ਰੰਘੜ "। ਕਹਿਕੇ ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਘੋੜੇ ਨੂੰ ਅੱਡੀ ਲਾਈ ।
(कहानी ) "अरे सुरेंद्र बेटा, एक सौ आठ पर फोन कर, राधे की पत्नी प्रसव वेदना में तड़प रही है. तेरी माँ भी घबरा रही है." गाड़ी ठीक कर रहे बेटे से सरपँच साहब ने कहा. "तीन बार कर लिया पिताजी, उधर से यही उत्तर मिलता है कि दो घंटे से पहले कोई एम्बूलेंस ना मिल सकती. सब कोरोना में लग रही हैं. अपना एरिया रेड जोन में आ गया, धड़ा धड़ मरीज मिल रहे हैं, उन्हें बड़े शहर ले जाना पड़ता है. संदिग्ध मरीजों की रिपोर्ट भी दिन में दो बार भेजनी होती है, सरकारी गाड़ी ना मिल सकेगी, अपनी भी खराब है. " सुरेंद्र गांव में सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा युवक है जो बी. ए. कर चुका है और शहर से लौटा है. उसकी समझदारी और प्रगतिशील विचारों के कारण युवा पीढ़ी उसे भावी सरपंच के रूप में देखने लगी है. सरपंच साहब बोले. "किसी की मांग कर ले जाते हैं, जाना तो जरूर है. " "लॉक डाउन में तो घर से बाहर पाँव भी ना धर सकते. पुलिस वाले मजबूरी ना देखते सीधे लट्ठ जमाते हैं, कोई सरपंच मिल जाये तो शायद ऊठक बैठक से ही काम चल जाये. " सुरेंद्र ने बाप को छेड़ा. यह वक़्त मजाक का ना है कमीन. यह बता बहु की डिलिवरी कैसे होगी? " सरपंच साहब को वास्तव में चिंता हो रही थी. "आपके बारात घर में ले जाकर बिठा देते हैं.एक करोड़ रूपये फूंक रखे हैं ना वहां. " बेटे ने मौका देखकर बाप के हाड़ पर मार दी. बेटे के व्यंग्य बाण से तिलमिलाये सरपंच साहब ने ऊँचा स्वर पकड़ लिया. "कोई शौक से ना बनाया हमने बारात घर, तू क्या जाने, तू तो तब पैदा भी ना हुआ था, जब तेरी बड़ी भुआ रामवती का विवाह हुआ था. पूरे पांच सौ बाराती आये थे, उन दिनों बारात चार दिन रुका करती थी. सभी बाराती एक जगह रुकने की जिद पकड़ गए. कहां ठहराते. बात बिगड़ गयी. तू तू, मैं मैं से बढ़ कर मारपीट तक पहुंच गयी. बेचारी रामवती फेरों के बाद भी छह महीनों तक पीहर बैठी रही. बड़े बुजुर्गों ने जाकर पाँव पकड़े तो छोरी की विदाई हो सकी. तब पूरे गांव ने निश्चय किया कि आलीशान बारात घर बनवाया जाये. पच्चीस कमरों का बारात घर आसपास के गांवों में कहीं ना है.यह गांव का स्वभिमान तो है ही, कितने काम आता है चुनाव के दिनों में पोलिंग पार्टियां यहां ठहरती हैं. पटवारी जी आते हैं तो उनका दरबार यहीं लगता है. वृद्ध जन ताश खेल कर मन बहलाव करते हैं. औसर -मौसर यहीं होते हैं. ठाठ ना बन रही है, और तू कहता है करोड़ रुपया बर्बाद कर दिया? " सरपंच जी ने एक ही सांस में सारी गाथा कह सुनाई. "फिर भी चार कमरों की एक डिस्पेंसरी बनवा देते तो गांव में नर्स रहती, रात- बिरात इमरजेंसी में सहारा बनती. पचास वर्ष पहले का प्राईमरी स्कूल है, उसमें कमरे बनवा देते, उसे क्रमोन्नत करवा लेते तो हो सकता था गांव का कोई छोरा पढ़ लिख कर डॉक्टर ही बन जाता. चालीस साल से तो आप ही सरपंच हैं. बताओ क्या किया गांव के लिए? " सुरेंद्र ने भड़ास निकाल ली. " हिसाब बाद में लेना मैंने क्या क्या किया है, पहले तेरी भाभी के प्रसव का सोच. " सरपंच साहब को बेटे पर गर्व हुआ. वो मैं संभाल लूँगा. शहर में मेरे दोस्त की मां डाक्टरनी थी, वो हमें डिलीवरी में लगने वाले टीकों के बारे में बताती रहती थीं. मैंने सब कुछ सीख लिया था. भाभी की हालत के बारे में मुझे पता था, सब दवाइयां साथ लाया हूं, इसकी चिंता मुझ पर छोड़ दें, आप तो यह मनन करें कि गांव में अस्पताल जरूरी है या बारात घर. " कहते हुए सुरेंद्र सिरिंज में दवाई भरने लगा. सरपंच साहब भी निश्चय कर चुके थे, बोले - मैं कल ही सरकार के पास प्रस्ताव भेजता हूं कि बारात घर में अस्पताल खोल दिया जाए. " भीतर जाते सुरेन्द्र ने अदा के साथ सेल्यूट किया, सरपंच साहब मुस्कराते हुए हुक्का गुड़गुड़ाने लगे. ---रूप सिंह राजपुरी मुकाम पोस्ट -रावतसर जिला -हनुमानगढ़ 335524फोन नंबर 9928331870रचना मौलिक, अप्रकाशित है, अन्यत्र प्रकाशनार्थ कहीं नहीं भेज रखी. -लेखक
श्री गंगानगर में अनूठा शैक्षिक कल्प वृक्ष उगाने वाले पद्मश्री श्यामसुंदर महेश्वरी जी का देहावसान अपूरणीय क्षति: रूप सिंह राजपुरी मुझे अकस्मात एक शानदार भारी बंद लिफाफा एक परिचित ने घर बैठे बिठाये लाकर दिया । प्रेषक का नाम देखा तो विद्यार्थी शिक्षा सहयोग समिति श्री गंगानगर लिखा था । इस परोपकारी संस्था का नाम सुना हुआ था कभी जा कर देखने की साध मन में आज भी है । बस अखबारों में पढ़ा था इससे ज्यादा कोई जानकारी नहीं थी । संस्था की नींव रखने में महत्ती भूमिका निभाने वाले कर्मयोगी पद्मश्री श्याम सुंदर महेश्वरी जी के बारे में भी सुन रखा था कि वे इस संस्था के लिये प्राणपण और जनून के साथ जुटे हुए हैं । लिफाफा खोलकर देखा तो भीतर से नयनाभिराम छवि धारे चमचमाते रंगीन ग्लेज कागज पर छपी संस्था की स्मारिका "समर्पण 2021" निकली । देखते ही मन बाग बाग हो गया । स्मारिकाएँ उपलब्ध होती रहती हैं लेकिन इतनी श्रम साध्य ,रोचक, विषय विविधता व 31 वर्षों का विगत स्वयं में समेटे एक संग्रहनीय ऐतिहासिक दस्तावेज मेरे हाथों में था ।भीतर के पृष्ठों पर रचनाकारों ने विद्वता पूर्ण प्रेरक आलेखों के माध्यम से मानव कल्याणार्थ योगदान पाया हुआ मिला ।वहीं अब समाज में प्रतिष्ठित पदों पर आसीन पूर्व विधार्थियों के लेखों से लगा उनमें किसी तरह संस्था के उपकारी ऋण से उऋण होने की उत्कंठा हिलोरें ले रही है । उन्होंने संस्था सहयोग को जीवन धारा परिवर्तन का नियामक माना है । वे श्री श्याम सुंदर महेश्वरी जी व अन्य संचालकों को भगवान का दर्जा देते हैं । संस्था से जुड़े विद्वान शिक्षाविदों ,भामाशाहों ,सदस्यों ने भी अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त किये हैं वहीं देश, राज्य व समाज के अग्रज राजनीतिज्ञों ,अधिकारियों ,व्यापारियों व समाजसेवियों ने शुभ कामना संदेशों के माध्यम से अपना आशीर्वाद संस्था को भेजा है । श्री गंगानगर में 23 अक्टूबर 1988 से निरन्तर संचालित विद्यार्थी शिक्षा सहयोग समिति ने अनूठा भागीरथी कार्य अपने कन्धों पर ले रखा है । श्याम नगर पुलिया ,पदमपुर मार्ग स्थित यह संस्था उन विद्यार्थियों को हर प्रकार की वह शिक्षण सहगामी सहायता प्रदान कर रही है जो वे स्वयं अफोर्ड नहीं कर सकते । उच्च कक्षाओं तक फीस ,हॉस्टल ख़र्च, किताबें, स्टेशनरी, पोशाक सहित वह सब कुछ जो एक आर्थिक रूप से कमजोर जरूरतमंद लेकिन प्रतिभाशाली विद्यार्थी को चाहिए होता है । हिंदी ,अंग्रेजी व संस्कृत भाषा में छपी रचनाओं में रचनाकारों ने कलेजा निकाल कर कागज पर रख छोड़ा है । अनेक सफल लोग भी अपने अतीत में झांकने से डरते हैं वे केवल उजलेपन का ही जिक्र करते हैं । अपने जीवन की पुस्तक के स्याह पन्नों को किसी के आगे नहीं खोलते । उन्हें डर होता है कहीं समाज में छवि धूमल न हो जाये । लेकिन स्मारिका में कभी पैसों के लिये मोहताज रहे लेकिन आज सफल अधिकारियों ने बड़ी ईमानदारी के साथ संस्था में आने व यहां मिले सहयोग का जिक्र किया है । इस तरह की बेबाकी भी निसन्देह उन्हें संस्था के कर्णधारों के व्यक्तित्व को देख कर मिली होगी । स्मारिका में विगत का सम्पूर्ण ब्यौरा है वहीं भविष्य की योजनाओं का खाका भी है । हर पन्ने पर की गई मेहनत स्पष्ट दिखाई दे रही है । इतनी बड़ी कृति में लेखन त्रुटियां होना स्वभाविक होता है लेकिन यहां ढूंढते ही रह जाओगे वाली स्थिति है । विज्ञापन दाताओं नें अपनी नेक कमाई को एक सद्कर्म में आहूत किया है । उन्हें पता है हमारा एक एक पैसा सार्थक होकर पुण्य से नहलाया है । पारदर्शिता भी संस्थाओं के सफल होने की कुंजी होती है । स्मारिका के सम्पादक मंडल में गुणी जन शामिल हैं सबने रचना चयन करके उसे यथास्थान लगाने में अपने अनुभव का प्रयोग किया है । मैं अब हतप्रभ हूं जब सुना कि पदम् श्री श्याम सुंदर महेश्वरी जी अब इस संसार में नहीं हैं उनकी पावन समृति को कोटिशःनमन अर्पित करता हूँ जिन्होंने 32 वर्ष पूर्व ऐसा पौधारोपण किया जो उसी वर्ष से मीठे शैक्षिक फल दे रहा है । ईश्वर आपको अपने चरणों में निवास दें परिवार व संस्था पदाधिकारियों को विछोह सहन करने की शक्ति प्रदान करें उनके बाद उन द्वारा अपने हाथों लगाये इस वृक्ष को सिंचित कर फलदायी बनाये रखें । रूपसिंह राजपुरी साहित्यकार रावतसर, जिला हनुमानगढ़ राजस्थान 335524 फोन न. 9928331870
ਗੀਤਸਾਥੋਂ ਰੁਸ ਗਏ, ਖੁਸ਼ੀਆਂ ਤੇ ਹਾਸੇ।ਜਿਸ ਦਿਨ ਤੋੰ ਸੱਜਣ ਹੋਏ ਪਾਸੇ।ਗਮਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਹੋਈ ਦੋਸਤੀ....ਕੌੜੇ ਹੋ ਗਏ ,ਚਾਵਾਂ ਦੇ ਪਤਾਸੇ ।ਸਾਡੇ ਨੈਣਾਂ ਵਿਚ,ਵਸਦੇ ਚਮਾਸੇ।ਗਮਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਹੋਈ ਦੋਸਤੀ....ਸਾਥੋਂ ਰੁਸਉਹਦਾ ਆਉਣਾ ਸਾਡੀ ਈਦ,ਉਹਦਾ ਜਾਣਾ ਕਾਲੀ ਰਾਤ ।ਅਸੀਂ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਤਾਰਿਆਂ ਦੇ ਨਾਲ ਗਲਬਾਤ ।ਏਸ ਰਾਤ ਦੀ ਨਾ ਹੋਣੀ,ਹੁਣ ਕੋਈ ਪ੍ਰਭਾਤ ਕੋਈ ਵੈਦ ਨਾ ਦਵਾਵੇ,ਏਸ ਰੋਗ ਤੋੰ ਨਿਜਾਤ।ਰਹਿ ਗਏ ਦਿਲਾਂ ਵਿੱਚ ਦਿਲਾਂ ਦੇ ਖੁਲਾਸੇ।ਦੁਖ ਵਧੀ ਜਾਵੇ,ਹੋਕੇ ਤੋਲੇ ਮਾਸੇ।ਗਮਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਹੌਈ ਦੋਸਤੀ..ਸਾਥੋਂ ਰੁਸ ਗਏ.....ਨਿੱਖਰੀ ਸਵੇਰ ਜੇਹੀ ,ਖਿੜਿਆ ਗੁਲਾਬ ਸੀ।ਪਰੀਆਂ ਤੋੰ ਸੋਹਣਾ ਉਹਦਾ ਰੂਪ ਤੇ ਸ਼ਬਾਬ ਸੀ।ਮੇਰਾ ਦਿਲ ਓਹਦੇ ਅੱਗੇ ਖੁੱਲੀ ਹੋਈ ਕਿਤਾਬ ਸੀ ।ਸਾਰਿਆਂ ਸਵਾਲਾਂ ਦਾ ਉਹ ਇਕੋ ਹੀ ਜਬਾਬ ਸੀ।ਅਸੀਂ ਵਿਛੜੇ ਤੇ ਹੋ ਗਏ ਨਰਾਸੇ।'ਰਾਜਪੁਰੀ' ਹੁਣ ਦੇ ਨਾ ਦਲਾਸੇ ।ਗਮਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਹੋਈ ਦੋਸਤੀ----ਸਾਥੋਂ ਰੁਸ ਗਏ ਖੁਸ਼ੀਆਂ ਤੇ ਹਾਸੇ।ਜਿਸ ਦਿਨ ਤੋਂ ਸੱਜਣ ਹੋਏ ਪਾਸੇ।ਗਮਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਹੋਈ ਦੋਸਤੀ..... .......ਰੂਪਸਿੰਘ ਰਾਜਪੁਰੀ 9928331870
*स्मरण रहे ~* *22 दिसम्बर 1666 को**गुरु गोबिंदसिंह जी का जन्म हुआ था,* *और इस सप्ताह में ही**गुरु गोबिंदसिंह जी का पूरा परिवार* *देश-धर्म के लिए शहीद हो गया था.* *22 दिसम्बर 1704 को हुआ* *विश्व के इतिहास का अकल्पनीय* *चमकोर धर्मयुद्ध* *जिसमें 40 सिक्ख योद्धा लड़े* *हजारों मुगल वहशी दरिंदो से.**23 दिसम्बर 1704 बाबा अजीत सिंह* *शहीदी दिवस चमकोर साहिब,* *उम्र 17 वर्ष.**24 दिसम्बर 1704 बाबा जुझार सिंह* *शहीदी दिवस चमकोर साहिब,* *उम्र 15 वर्ष ।**25 दिसम्बर* *1704 बाबा जोरावर सिंह उम्र 9 वर्ष ,* *बाबा फतेह सिंह उम्र 5 वर्ष* *शहीदी दिवस , सरहिंद , पंजाब.**26 दिसम्बर मध्यरात्रि माता गुजरी* *गुरु माँ पंचतत्व में विलीन.**इन पाँच दिनों में दशमेस पिता ने* *अपना सारा वंश देश-धर्म परबलिदान कर दिया और उस वंशदानी ,* *कलगीधर की भूमि पर हम उन दिव्य आत्मा के बलिदान को भुलाकर* *विदेशी सेंटा-घंटा और न्यू ईयर में खोऐ हैं.* *धिक्कार है हमें.**कोटि-२ नमन गुरु प्यारयां नुं ते* *चार शाहिबजादेयां न्नुं.**आज से 14 वे दिन मकर सक्रांति त्यौहार है इसको धूमधाम से मनाना* *बारम्बार प्रणाम. 🙏**जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल* *वाहे गुरु जी दा खालसा ,* *वाहे गुरु जी दी फतेह*.
इत तो चमकै बिजली उत बरसै है मेह।भीगी पाघ पधारज्यो जद मानू ला नेह ।
पंजाबी गीतसाथों रुस गये खुशियां ते हासे।जिस दिन तों सजन होए पासे।गमां दे नाल होई दोस्ती.....कौड़े हो गये ,चावां दे पतासे।साडे नैना विच वसदे चमासे।गमां दे नाल होई दोस्ती ....साथों रुस गये....ओदा औना साडी ईद,ओदा जाना काली रात ।ऐस रात दी ना होनी हुन कदे प्रभात।असीं करदे हां तारयां दे नाल गल बात।कोई वैद ना दबावे इस रोग तों निजात ।रह गए दिलां विच दिलां दे खुलासे।दुख वधी जावे होके तोले जगमां दे नाल होई दोस्ती..साथों रुस गये.....निखरी सबेर जेही,खिड़या गुलाब सी।परियां तो सोना ओदा रूप ते शबाब सी।मेरा दिल ओदे अगे खुली होई किताब सी ।सारयां सवालां दा ओह इक ही जबाब सी।असीं विछड़े ते हो गये नरासे।'राजपुरी' हुन ना दे दलासे ।गमां दे नाल होई दोस्ती....साथों रुस गये खुशियां ते हासे।गमां दे नाल हो गयी दोस्ती..रूपसिंह राजपुरीरावतसर9928331870
कोझली कीकर जैसे आदमीलोक मानस में एक पुरानी लोकोक्ति अभी भी अस्तित्व से जूझ रही है - मकोड़ा, टांटिया अर जूं ,भूल हुई करतार सयूँ ,ऐ बनाया क्यूं ? इस सूची में और बहुत कुछ जोड़ा जा सकता है जिनकी किसी को भी जरूरत नहीं । सांप, बिच्छु,गोयरा कौन मांगता है कि घर की शोभा बढ़ाएं।मच्छर, मक्खी, कसारी, घुन,फंफून्द किसे पसंद हैं। हिड़के कुत्ते को रोटी खिलाने के पुण्य प्रताप से भी सब बचना चाहते हैं ।कौन चाहता है पागल या खाऊ यार पड़ोसी से पाला पड़े । आंधी, तूफान, अतिवृष्टि, ओला वृष्टि, भूकम्प, अकाल,खेती में सुंडी , बीमारी या करजाऊ होने की मांग भगवान जी को ज्ञापन दे कर कौन करता है । कोई नहीं चाहता जलदाय विभाग हमारे घरों में बदबूदार पानी भेजे या पुलिस व कोर्ट कचहरी से वास्ता पड़े। फिर भी ये मारक अनसर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा जाते हैं । सर्दी की आधी रात को पांच चार दूर के रिश्तेदार आ जायें तो शहरदारी में कैसा महसूस होता है ? हर शहरी बन्दा इस बिन मांगी मुराद से कन्नी काटना चाहता है । अब आप कोझली कीकर को ले लें किसने चाहा था कि यह जी का जंजाल हमारे पर्यावरण में घी खिचड़ी सा एक मेक हो जाये । कहीं भी चले जाओ यह आपको आगे तैयार मिलेगी । गांव, शहर, खेत, मैदान, सड़क, पहाड़, नदी, नहर किनारे आपके स्वागत में पलक पावड़े बिछाये दिखती है ।अलग अलग जगह इसके नाम भी अलग हो सकते हैं पर पहाड़ी कीकर और गुण के आधार पर स्थानीय लोग इसे कोझली कीकर कहते हैं, यानी गन्दी, बेकार, बदसूरत, और दुःखदेनी कह कर इससे नफरत करते हैं, क्योंकि यह किसी भी काम नहीं आती ।काटते हैं तो जहरीले कांटे बलत लगा देते हैं । हाथ लगाते हैं तो बदबू आती है ।दातुन मंजन इससे कोई करता नहीं । जलाऊ ईंधन भी इसे नहीं कहा जा सकता ।जब तक सूखती है तब तक दीमक लग जाती है । इमारती लकड़ी तो इसे कहा ही नहीं जा सकता । कस्सी कुल्हाड़ी के डंडा डालने के काम भी नहीं आती । इसकी छाया में भी कोई नहीं बैठता । सत्तर के दशक तक हमारे यहां देसी बबूल की चौधर हुआ करती थी। सब उसी की दातुन करते । दोपहर को उसके नीचे चारपाई ढालकर सोया जाता ।लड़कियां सावन के झूले उन्हीं कीकरों पर झूलतीं ।यहीं पशु बंधते । किशोर लड़के खेल खेलते । पक्की लकड़ी होने के कारण खेजड़ी के बाद कीकर ही खेती किसानी के व घरेलू औजार बनाने के काम आती थी ।घर की छत और किवाड़, खिड़कियां, बच्चों के पालने खिलोने इसे से बनते थे । इसकी पातड़ी यानी तुक्कों का अचार बड़ा गुणकारी होता था । लग गया तीर नहीं तो तुक्का कीकर बिना यह कहावत कैसे बनती । हथकढ़ के शौकीन इसकी छाल का इस्तेमाल करते और पीले फूलों को अर्क निकालते समय ड्रम में डालते तो स्वाद में इजाफा हो जाता था । कीकर की गोंद से किताबें कॉपियां चिपकाई जातीं । अब देसी कीकर समूल नष्ट होने के कगार पर है । वजूद बचाने की जद्दोजहद में लगी है जैसे टीवी और मोबाइल आने के बाद पुरातन संस्कृति के पांव उखड़े पड़े हैं । बताया जाता है हरियाली दिखाने के लिये हैलीकॉप्टरों से कोझली कीकर के बीज पूरे देश में बिखरा दीये जो शीघ्र ही अपने कांटों के साथ उग गये और जीवन का हिस्सा बन गये ।इन्हें न ट्री गार्ड लगा कर बचाया गया न किसी जानवर ने खाया । इन्हें पानी से सींचा भी नहीं गया फिर भी दिन दुगनी बढ़वार हुई आज सर्वत्र इसी का बोलबाला है ,जड़ से खोदने पर भी उग आती है । न चाहते हुए भी इसे झेलना पड़ रहा है ।अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो बहुत सारे आदमी भी कोझली कीकर जैसे दिखेंगे जो किसी के काम तो आते नहीं बाधा जरूर बनते हैं । दूसरों की तरक्की देखकर जलते हैं । रास्ते का कांटा बनते हैं ।
हर इच्छा मेरी सपना बनके, रही अधूरी बाला जी ।इच्छा पूर्ण नाम तिहारो कर दो पूरी बाला जी ।भक्तों के तुम रक्षक बनकर सदा सहाई होते हो ।सच्चे की तुम बांह पकड़ते पाप की नाव डुबोते हो।संकट मोचक बन कर आओ क्या मजबूरी बाला जी------हर इच्छा मेरीतुम तो सब के मन की जानों तुम से बात छुपाएं क्या ।तेरे दर को छोड़ पवनसुत और के दर पे जाएं क्या ।अपनी शरण में ले लो हमको अब क्यों दूरी बाला जी ----हर इच्छा मेरीमन का पंछी भटकन में है उसे सहारा मिल जाये ।उजड़ा चमन उम्मीदों का है, अब यह बगिया खिल जाये।आस अधूरी, प्यास अधूरी, मिले सबूरी बाला जी____हर इच्छा मेरीतेरे होते एक बेचारा, कितने दुखड़े सहता है।रावतसर में राजपुरी तेरा भगत निराला रहता है ।तन मन उसका फीका पड़ गया, करो सिंधुरी बाला जी ।।।।।।।।।16-4-2022
रसिया निम्बू लयादे रे आम आदमी को महंगाई का पता तब चलता है जब खाने पीने की चीजें उसके बूते से बाहर होने लगती हैं । हवाई जहाज की टिकिट कितनी महंगी हो गई उसकी बला से, लेकिन जब एक निम्बू पन्द्रह रुपये का सुनने को मिलता है तब कानों पर विश्वास नहीं होता । कल परसों तक बीस तीस के भाव बिकने वाला निम्बू साढ़े तीन सौ से चार सौ तक किलो पहुंच जाए तो मुंह से यही निकलता है 'मर तेरी मा नै--- तू भी।' निम्बू की गिनती अब तक तीन में न तेरह में वाली ही रही थी । वह न कभी प्याज जैसा वी. आई. पी . रुतबा पा सका न घीया कद्दू सी मन से उतरी उपेक्षित सब्जी सा दुत्कारा गया । बस हरी मिर्च के साथ नजरबट्टू बनकर मकानों ,दुकानों,गाड़ियों पर लटकता रहा । अब इस पर महंगाई की नजर पड़ गयी तो गीदड़ की तरह पहाड़ पर बसेरा कर लिया । इसे रसीला होने और आयुर्वेद में विशेषताओं का वर्णन होने के कारण लोकगीतों में जगह मिली थी । निम्बूड़ा निम्बूड़ा और रसिया नींबू लयादे वे मेरे उठी कलेजे पीड़ वगैरा ।अब तो करोना से भी ज्यादा निम्बू का जिक्र हो रहा है । सोना चौबन हजारी हो रहा है उसकी इतनी इज्जत नहीं हो रही जितनी निम्बू की । डीजल पेट्रोल के नखरे के कारण आये दिन धीमा झटका जोर से लगता देखते हैं, कुछ पैसे बढ़ा कर न मारते हैं न रोने देते हैं। लेकिन क्या पिद्दी क्या पिद्दी का शोरबा निम्बू आंख दिखाये तो चर्चा करनी लाज़िमी हो जाती है । प्याज ने सब्जियों के साम्राज्य में जो धाक जमायी और अपने अस्तित्व का एहसास करवाया वैसा न सेब संतरे कर सके न फलों का राजा आम । फलों के भाव हमेशा आम आदमी की जेब के लिये भारी ही रहे । उनके अंगूर खट्टे से मीठे हुए ही नहीं । लेकिन प्याज और पिछले दिनों टमाटर ने जब शतक पार किया तब लगा सेब सस्ता है इससे यारी गाँठनी चाहिये । केले दर्जन के भाव मिला करते थे उन्होंने किलो में तुलना शुरू कर दिया फिर भी आम आदमी के बजट में ही रहे हैं । तीस रुपये पर काफी समय से भाव टिका है । परिवार के लिये एक किलो ही खरीदा जाता है जिसमें छह सात आ जाते हैं । सबको एक एक मिल जाता है। रिश्तेदारों के यहां जाते समय भी केले ही फायदेमंद रहते हैं । कुछ ले कर जाने की फारमल्टी भी पूरी हो जाती है और अधिक खर्च का गिरगिराट भी नहीं रहता । यूं घर फूंक तमाशा देखना हो तो काजू बादाम और बर्फी कतली ले जाने से कौन मना करता है । निम्बू भोजन की थाली की अनिवार्यता कभी नहीं रहा । यह स्वाद बढ़ाने वाला गैर जरूरी आइटम रहा है । दही जमाने के लिये जावण न मिले तो दो बूंद नींबू चाहिए होता है बस । गर्मी में सकंजी पीने की इच्छा हो तो इसकी याद आती है । अनेक घरों में महीनों तक निम्बू का प्रवेश नहीं होता । इसकी खटास भी कई लोगों को नहीं सुहाती । पैदावार में कमी आई तो निम्बू के भाव ने राकेट गति पकड़ ली । जिन दिनों फसलों पर कीटनाशक छिड़काव किया जाता है स्थानीय स्तर पर निम्बू का भाव कुछ ऊंचा उठता रहा है अभी वह सीजन भी नहीं बस मनमर्जी से भाव बढा कर आसमान में टांग दिया । पैदावार में कमी अन्य फसलों में भी होती आईं है उनके भाव आसमान क्यों नहीं छूते । जिस फ्रिज में दो चार निम्बू पड़े होते हैं वह आजकल खुद को रईस समझने लगता है । यूपी के शाहजहांपुर से खबर आई है कि सब्जी मंडी की एक दुकान से कोई चोर साठ किलो निम्बू चुरा कर ले गया। पुलिस मुस्तैदी के साथ चोर की तलाश में जुटी है ।शायद पर्चे में पहली बार निम्बू का मुख्य वस्तु के रूप में उल्लेख हुआ होगा । आज से पहले तेजी के दौर में प्याज और ग्वार के ट्रक चोरी होने के समाचार ही सुना करते थे। पहली बार निम्बू चोरी सुनी है । निम्बू पहलवान की मूंछ पर जा टिका है । भाव बढाने वाले भी कमाल के अर्थ शास्त्री होते हैं दैनिक उपयोग की किसी ऐसी वस्तु का महत्व बढ़ा देते हैं जिसके बारे में सोचा भी नहीं होता । दालें,चीनी,गुड़, खाद्य तेल आदि के रेट बढ़ते हैं तो मन दुखता है । दालचीनी या लोंग इलायची का भाव नहीं अखरता । नमक सौ रुपये किलो हो जाये तो कम इस्तेमाल करके संतुलन बनाया जा सकता है । वैसे भी डॉक्टर कम खाने की सलाह देते हैं । कभी चाय पत्ती चालीस रुपये से कुछ ही दिनों में एक सौ बीस रुपये हुई और बाद में साढ़े तीन सौ । जब कोई ग्राहक चाय की तेजी का रोना रोता है तो दुकानदार पुराना अखबार निकाल कर दिखाता है 'लो पढ़ लो भाई जी,अपने देश में ही अमीर लोग अस्सी हजार रुपये किलो की चाय भी पीते हैं । 'पढ़कर ग्राहक की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती है वह सौदा लेकर जाने में ही भलाई समझता है । एक बूझबुझाकड़ ने निम्बू महंगा होने के पीछे रहस्यवादी कारण खोजा है कि निम्बू तस्करी के जरिये पाकिस्तान चले गये हैं ,वहां एक निम्बू सौ का मिल रहा है ,कारण वहां सरकार की डावांडोल स्थिति के बीच लोगों को अजीब डर सताने लगा है कि जैसे पुतिन ने यूक्रेन पर हमला बोल रखा है कहीं मोदी जी पाकिस्तान पर न चढ़ दौड़ें । इस भय के कारण उन्हें दस्त लग रहे हैं ।वैद्य हकीमों के पास इसी मर्ज के मरीज पहुंच रहे हैं । गांव का अनपढ़ मरीज एक परिचित हकीम के पास आया । चेहरा देखते ही हकीम बोला 'निम्बु इस्तेमाल करो ।' दो घण्टे बाद हकीम ने खुद मरीज को फोन करके पूछा 'मीयां वशीर हुण तेरे दस्तां दा की हाल ए ।'अग्गों मरीज बोल्या 'दस्त नूं ते अराम ए पर हिक मुसीबत डाढी आण खलोती ए ,जदों नेम्बू कढ़ लैना वां दोबारा शुरू हो जांदे ने ।'
गांवों में खेल, खेल में खिलवाड़हमारी उम्र के लोग उन दिनों को याद करके खुश हो लेते होंगे जब उनके बचपन में आधी रात तक गांव के बाहर खेल होते रहते थे । कोई कबड्डी तो कोई कुश्ती खेल रहा होता,कोई ऊठक बैठक कर पसीना निकाल रहा होता । बीस बीस साल की लड़कियां भी लड़कों के साथ आती पाती या लुका मीची खेलती थीं किसी के मन में बुराई सिर न उठाती न घरवालों को एतराज होता । छोटे बच्चे लालालिगतर खेलते । कहीं सक्कर भीजी और लूनिया घाटी हो रही होती दूसरी तरफ आंधा झोटा खेलकर चतुराई का परिचय दिया जा रहा होता। बदमाश लड़के मुर्चा पीछाण भी खेलते । दिन में कांच की गोलियां और मारदड़ी में हाथ आजमाते । स्कूल की छुटियों में वहां के नीम और टालियों पर क्रां डंडा का रोमांच खत्म ही न होता । स्कूल के खेल अलग होते पशु चराते खेलने वाले अलग । देवर भाभी वाली ताश छिप कर खेलने का आनंद शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता । होली पर गांव में मेहरी का नाच कई मजे देता । गांव में राम लीला आ जाती तो कई दिनों का मनोरंजन साथ लाती । किसे मलाल होता कि गांव में बिजली नहीं है। पढ़े लिखे बॉलीवाल खेलते, जो साइकिल चलाना जानता वो तो सुपर हीरो होता । हाड़ी की फसल में ज्यादा पान्त लगाना भी कम्पीटीशन हो जाता । वजन उठाना,चिटकी खाना या घी पीने का मुकाबला कितना रोचक होता होगा । इन दिनों फिर से गांवों में खेलों की चहल पहल हो रही है । राजीव गांधी ग्रामीण ओलम्पिक खेल महाकुंभ चल रहा है ।प्रतिक्रियावादी पूछते हैं राजीव गांधी किस खेल के खिलाड़ी थे जो उनके नाम से इतना बड़ा आयोजन हो रहा है । कहने को कहा जा सकता है इंदिरा रसोई में सस्ता खाना मिलता है इंदिरा जी कब रसोई में गई होंगी । महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन से यह सरकारी सिलसिला शुरू हुआ है तो उन्हीं के नाम पर रख देते। ध्यानचंद जैसा समर्पित खिलाड़ी दोबारा नहीं जन्मा । वे हॉकी के जादूगर थे । खेल उनकी नस नस में बसा था । हॉकी खेलते हुए उनके कौशल के जादू और हिटलर द्वारा उन्हें अपने देश में बसने का आग्रह करने के किस्से आज भी किवदन्ती हैं । नीयती यह रही वे जीवन की अंतिम बेला में आंखों से अंधे हो गए थे और उसी बुरी अवस्था में नश्वर संसार को अलविदा कह गए । अब उनके नाम पर खेल रत्न पुरस्कार दिए जाते हैं । अभी अभी पंचायत स्तर पर खेल सम्पन्न हुए हैं ब्लॉक, जिला, राज्य फिर राष्ट्रीय स्तर पर चलेंगे । खेल प्रतिभाऐं सामने आयेंगीं । जैसा कि गांवों का स्वरूप बदला है खेल भी अब प्रीति बढाने का साधन नहीं रहे बल्कि कटुता बढ़ रही है । अब त्योंहार पर बच्चों को घर में ही रोक कर रखा जाता है कहीं बाहर जा कर कहीं लड़ाई न कर लें । खेल खेल में कोई जानबूझ कर चोट न मार दे । बच्चे शारीरिक मानसिक उन्नयन व खेल भावना हेतु कम और प्रमाण पत्र हासिल करने के उद्देश्य से ज्यादा खेलने लगे हैं । क्रिकेट खिलाड़ियों की विलासता और ग्लैमर को अनुकरणीय व आदर्श मानकर चलते हैं । खेलों से नौकरी और पैसा ध्येय हो गया । प्रतिस्पर्धा बढ़ गयी । खिलाड़ी बेईमानी करके भी जीतना चाहते हैं, खेलकर जीतना नहीं । शक्तिवर्धक दवाइयों का सेवन कतिपय बड़े खिलाड़ी करते रहे हैं लेकिन छोटे खिलाड़ियों की भी नशे की डोज लेकर खेलने की खबरें आती रहती हैं । चिंता जनक बात है अच्छे खिलाड़ी बाद में नशेड़ी और असमाजिक तत्व बनते देखे गए हैं । ग्रामीण खेलों के दौरान हमारे जिले में ही खुइयां थाने में खिलवाड़ का वाद आया है । सरदारगढ़िया गांव के स्कूल में ढाणी बेरवाल के खिलाड़ियों ने मेजवान गांव को हरा दिया तो गांव के लोगों को हार हजम नहीं हुई जीतने वालों को पीट दिया । मामला थाने आ गया । चारणवासी गांव व मलवानी गांव के बीच मैच के दौरान विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों गांवों ने भविष्य में साथ न खेलने की कसम खा ली । वहीं 25 आर डब्ल्यू डी गांधीनगर व लालपुरा के बीच हुए महिला खो खो के मैच पर भी विवाद एस डी एम तक पहुंचा । होना यह चाहिए था- "खेल खिलाड़ी खेल जीत सके तो जीत। हार में मत हार मान, पाल खेल की प्रीत।"
काले कपड़े से बिदकते नेता काला रंग पता नहीं क्यों बुराई और बदी का प्रतीक मान लिया गया है । रावण काले कपड़े पहनता था शायद इसलिये ।बाकी यह रंग इतना बुरा नहीं है । काली कम्बली वाले की कितनी महिमा है । दरवेश सन्त काले कपड़े ही पहनते हैं । काले पर कोई दूजा रंग नहीं चढ़ता । हमारे धार्मिक ग्रन्थों की स्याही काली ही है ,मूंछ काली सबको पसंद है । काले बाल जवानी का सबूत हैं । शायर काली आंखों और जुल्फों के बेशुमार कसीदे लिख चुके हैं ,लोगों ने कहा मजनू को 'तेरी लैला रंग दी काली । मजनू ने फिर हंसके कहा तेरी अख ना देखन वाली ।।' उदाहरण के तौर पर नेताओं को ही ले लें । उन्हें जनता का हर विरोध स्वीकार्य होता है चाहे गाली निकाले, भृष्ट कहे, निकम्मा बोले । यह भी कहे कि अगले चुनाव में वोट नहीं देगें तो भी वह मुस्करा कर सुनता है । वह जानता है जनता विरोध करना ही जानती है और मेरा क्या बिगाड़ लेगी । वोट तो उसे झख मराकर देना ही पड़ेगा । घर पर रख कर क्या अचार डालेगी । ले दे कर एक वोट ही तो जनता के पास है उसे देने में हमेशा की तरह जल्दबाजी करेगी ही । नेता को कोफ्त तब होती है जब जनता मुर्दाबाद के नारों से आगे बढ़कर पुतला जलाने तक चली जाती है , तब उसे लगता है यह जनता का काम नहीं यह हमारे विरोधियों की कारस्तानी है ।कोई मुझसे जलने वाला नेता यह सब करवा रहा है वरना आग से खेलने का काम जनता का थोड़ी ना है । नेता से भी ज्यादा उसका पुतला जलाना उसके चमचों को अखरता है वे जानते हैं अगर सचमुच भैयाजी की अंत्येष्ठि हो गई तो हम किसकी जेब में रहेंगे । उनके साथ हाइवे के ढाबों पर मुर्ग मुसल्लम का जो भोग लगाते रहे हैं वह कहां से लगाया करेंगे । उनके नाम पर अधिकारियों को धमका लेते हैं ,कई भृष्ट अधिकारी तो हमें ही बंद लिफाफे में नकद नारायण थमा देते हैं कि भैया जी की कृपा दृष्टि बनवाने में सहायता करना । वे लिफाफे हजम करने को कहां से मिलेंगे ।पुतला जलाना सबसे ज्यादा उसकी पत्नी को नागवार गुजरता है कितना भी काइंया है, है तो उस भारतीय नारी का सुहाग । जीते जी उसका पुतला जलाया जाये पत्नी कैसे बर्दाश्त कर सकती है । आजकल नेता जी पुतला जलाऊ कार्यवाही से भी ज्यादा आतंकित हैं काले झंडों से । उन्हें लगता है नारेबाजी से हमारी मोटी चमड़ी का कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन काले झंडों से वोटों की फसल को पाला मार जायेगा । हमें हैरानी होती है भीतरघात से न डरने वाले मुख्यमंत्री जी भी काले कपड़ों से भयभीत रहते हैं जैसे किसी जमाने में हथोड़ा मार या काले कच्छे वालों से डर लगता था। कामरेड लाल झंडे दिखा कर सत्ता की झाग गिरा देते हैं उनके एक अदद विधायक की सत्ताधारियों से ज्यादा चलने लगती है । मुख्यमंत्री पिछले दिनों ब्लॉक स्तरीय खेल ओलंपिक का उद्घाटन करने आये तो काला कपड़ा फोबिया सामने आ गया । कोई विरोध नहीं था झंडे नहीं थे बस वहम खोपड़ी में घुस गया था । जब आका किसी बात पर थोड़ा सा भी नापसंदगी का इशारा करदे तो उसके मुख्य सहायक अधिकारियों को उस बात का मुद्दा ही खत्म कर देने का आदेश दे देते हैं । आदेश को इम्प्लीमेंट करने वाली चेन आगे से आगे जल्दी पूरा करने और श्रेय लेने के चक्कर में अति करने तक उतर आती है । वहां उपस्थित बच्चों तक की काली टी शर्ट,टोपी, काली जिल्द वाली कॉपी -किताब, बैग, रुमाल, पेन तक को हटवाया गया । काले अंडरवियर वालों को वहां से भगा दिया । लड़कों को डर सताया कि हमारे सिर पर काले बाल हैं कहीं पुलिस वाले झींटे न खोस लें । स्वयं भीड़ कम करवा ली लेकिन काले कपड़े वाले सहन नहीं हुए । अभिनेता देवानन्द पर मुम्बई में काले कपड़े पहनने पर बेन लग गया था वे उन कपड़ों में जानलेवा लगते थे उन्हें जाता देख कर कई बेवकूफ लड़कियां छतों से कूद जाती थीं ।पहले वाले नेता काले कपड़े से नहीं डरते थे । शायद भैंस खुद का रंग नहीं देखती काले कपड़े से बिदकती है । जो अपने काले कारनामों से नहीं डरते, जिन्हें काली कमाई और काला धन हजम हो रहा है उन्हें काले रुमाल से पसीना आ जाता है । हरियाणा के एक पुराने दबंग नेता के आगे काले झंडे लहरा कर विरोध किया गया तो वे बोले मेरी मां बीस गज का काला घाघरा पहना करती थी काले झंडों से मुझे क्या डराओगे। कुछ इस तरह का बेइज्जती प्रूफ नेता बना जाये तो डर कुछ कम होगा वरना हर नेता को हर जगह काले झंडे मिलेंगे । हारने के बाद लगने वाले ऐसे नारों से तो काले झंडे ही अच्छे है कि "काली कुतिया कान कटी ,नेता तेरी रान्द कटी।"